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Home»विदेश

ग़ाज़ा में भूख और बम — इंसानियत के लिए सबसे बड़ा इम्तिहान

adminBy adminAugust 8, 2025 विदेश No Comments4 Mins Read
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ग़ाज़ा में भूख और बमबारी के बीच मलबे में खेलता बच्चा, UN क्लिनिक पर हमला, कुपोषण से जूझते लोग।
image credit : bbc.com
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ग़ाज़ा में फिलहाल जो हो रहा है, वह किसी राजनीतिक लड़ाई से कहीं ज़्यादा एक इंसानियत की खुली हार है। बम बरसते हैं, भूख से बच्चे तड़पते हैं, और दुनिया की बड़ी ताक़तें बैठकर सिर्फ़ बयानबाज़ी करती हैं।

भूख से मरता ग़ाज़ा: अकाल नहीं, नरसंहार:- संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें चीख-चीखकर कह रही हैं कि ग़ाज़ा में “अकाल की सबसे बुरी स्थिति” पैदा हो गई है। 5 साल की बच्ची का वज़न सिर्फ़ 11 किलो! 7 बार विस्थापित हुए परिवार दाल और पानी से दिन काट रहे हैं। खाने की लाइन में जाने की हिम्मत नहीं बची — और जो जाते हैं, वो कभी-कभी लौटते नहीं। क्या इस दौर में, 21वीं सदी में, भूख से मरना जायज़ है?

हमास नहीं झुका, इज़रायल नहीं रुका:- एक तरफ़ हमास है जो साफ कह चुका है — “जब तक फ़िलिस्तीनी देश नहीं बनता, हम हथियार नहीं डालेंगे।”

दूसरी तरफ़ इज़रायल है, जो कहता है — “हथियार डालो, फिर बात करेंगे।”

लेकिन असली सवाल ये है कि इस राजनीतिक रस्साकशी का खामियाज़ा कौन भुगत रहा है? जवाब सीधा है: ग़ाज़ा का आम नागरिक, भूखा, बेघर और टूटा हुआ।

नेतन्याहू की ज़िद या सुरक्षा का नाम पर सियासत?:- इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू कह रहे हैं — “फ़िलिस्तीनी राज्य हमारी सुरक्षा के लिए ख़तरा है।” लेकिन सवाल उठता है: किसकी सुरक्षा? वो बच्चों से, बूढ़ों से, दवा ढोते ट्रकों से खतरा है? अगर यह सुरक्षा है, तो इंसानियत की परिभाषा ही बदलनी पड़ेगी।

 दुनिया क्यों खामोश है?:- जब एक जानवर को नुकसान होता है, तो दुनियाभर के संगठन चीख उठते हैं। लेकिन जब 60,000 से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी मारे गए, तो वैश्विक नेता क्या कर रहे हैं? एक ग़ाज़ावासी ने ताना मारते हुए कहा — “अगर हम जानवर होते, तो शायद हमारी ज़िंदगी की कोई क़ीमत होती।” क्या ये तंज नहीं, सच्चाई है?

 शांति चाहिए या सरेंडर?:- जब कतर, मिस्र और फ्रांस जैसे देश मिलकर समझौते की बात करते हैं, तो उसमें शर्तें होती हैं — हथियार डालो, आत्मसमर्पण करो।

लेकिन कोई ये नहीं पूछता कि क्या फ़िलिस्तीनियों को सम्मान से जीने का हक़ है? क्या उनकी ज़मीन पर उनका हक़ नहीं? अगर “शांति” का मतलब आत्मसमर्पण है, तो ये न्याय नहीं, दमन है।

ये युद्ध नहीं, इंसानों पर हमला है:- यह लड़ाई ज़मीन की नहीं रही — ये लड़ाई इंसान की गरिमा, भूख और ज़िंदगी पर है। जब बच्चे रोटियों की जगह मलबा खाते हैं, जब मां अपने बेटे को खाने की लाइन में नहीं भेज सकती, जब लोग चक्कर खाकर गिर रहे हैं — तो ये “सामरिक रणनीति” नहीं, सीधा अपराध है। दुनिया को अब सोचना होगा: क्या चुप रहना अब भी विकल्प है?

 इज़राइल ने संयुक्त राष्ट्र के क्लिनिक पर भी हमला किया, गाजा सहायता स्थलों पर इजरायली बलों द्वारा 50 से अधिक फिलिस्तीनियों की हत्या, भूख संकट गहराया.

 अल जज़ीरा की जमीनी टीम के अनुसार, इजरायली बलों ने सुबह से अब तक गाजा में कम से कम 23 फिलिस्तीनियों को मार डाला है, जिनमें से एक हमला गाजा शहर में विस्थापित लोगों को आश्रय देने वाले संयुक्त राष्ट्र क्लिनिक को निशाना बनाकर किया गया। संयुक्त राष्ट्र के सहायक महासचिव मिरोस्लाव जेंका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को बताया कि इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा गाज़ा पर पूरी तरह से कब्ज़ा करने की कथित कोशिश “बेहद चिंताजनक” है। यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष टेरेसा रिबेरा ने भी इस योजना को “अस्वीकार्य उकसावे” की कार्रवाई बताया। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि यह निर्णय लेना “काफी हद तक इजरायल पर निर्भर है” कि वह आगे बढ़ना चाहता है या नहीं। गाजा पर इज़राइल के युद्ध में कम से कम 61,020 लोग मारे गए हैं और 150,671 घायल हुए हैं। 7 अक्टूबर, 2023 को हुए हमलों में इज़राइल में अनुमानित 1,139 लोग मारे गए और 200 से ज़्यादा लोगों को बंदी बना लिया गया।

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