वंदे मातरम भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत है। इसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन अब मोदी सरकार ने इसके गायन में बाधा डालने पर तीन साल तक जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान कर दिया है। सवाल यह है कि क्या देशभक्ति कानून के डंडे से साबित कराई जाएगी? क्या किसी गीत के सम्मान के लिए जेल की सजा जरूरी थी? क्या देश से प्रेम करने का प्रमाण यह होगा कि हर नागरिक एक खास गीत को अनिवार्य रूप से गाए? क्या असहमति भी अब अपराध होगी? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
किसी व्यक्ति को ‘वंदे मातरम’ पसंद हो सकता है और वह पूरे सम्मान से इसे गा सकता है। लेकिन अगर किसी नागरिक की धार्मिक मान्यता उसे इसके कुछ हिस्सों को गाने से रोकती है, तो क्या उसे अपराधी बना देना सही है? भारत का संविधान नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता देता है। किसी व्यक्ति को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आचरण करने का अधिकार है, हालांकि यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। तो सवाल है कि क्या किसी धार्मिक व्यक्ति को किसी गीत के उन अंशों को गाने के लिए मजबूर करना, जिनमें उसे धार्मिक आपत्ति है, उसकी संवैधानिक स्वतंत्रता से टकरा सकता है? और अगर टकराव है तो सरकार ने इसका संतुलन कैसे बनाया?
वंदे मातरम का सम्मान और उसे गाना-क्या दोनों एक ही बात हैं?
किसी राष्ट्रीय प्रतीक का सम्मान करना और उसे हर परिस्थिति में गाना, दो अलग बातें हैं। कोई नागरिक राष्ट्रगान का सम्मान कर सकता है, लेकिन हर नागरिक की धार्मिक या वैचारिक स्वतंत्रता को भी संविधान सुरक्षा देता है। यही भारत की खूबसूरती है। देशभक्ति एक भावना है, पुलिस केस नहीं। अगर कोई व्यक्ति हिंसा करता है, राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान करता है या किसी कार्यक्रम को जानबूझकर बाधित करता है, तो उसके खिलाफ कानून हो सकता है। लेकिन क्या हर असहमति को आपराधिक अपराध बना देना लोकतंत्र को मजबूत करेगा?
क्या निशाना मुसलमान हैं?
यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि वंदे मातरम के बाद के अंतरों में मौजूद कुछ हिंदू धार्मिक संदर्भों को लेकर मुस्लिम समुदाय सहित कुछ अल्पसंख्यक समुदायों की आपत्तियां पुरानी हैं। इतिहास बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में कांग्रेस ने पहले दो अंतरों तक सीमित रखने का फैसला इसी तरह की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए किया था। दूसरी तरफ मुस्लिम लीग पूरे गीत को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में हटाने की मांग कर रही थी।
इसलिए आज इस पुराने विवाद को फिर से राजनीतिक हथियार बनाना क्या जरूरी था? क्या सरकार का मकसद राष्ट्रीय एकता है या मुसलमानों को बार-बार यह साबित करने के लिए मजबूर करना कि वे कितने देशभक्त हैं? अगर किसी मुस्लिम नागरिक को धार्मिक कारण से किसी विशेष पंक्ति पर आपत्ति है तो क्या वह अचानक देशविरोधी हो जाता है? क्या भारत में मुसलमानों की देशभक्ति का पैमाना हमेशा दूसरों से ज्यादा कठिन रहेगा? क्या ‘वंदे मातरम’ गाने से ही देशभक्ति साबित होगी? देश के लिए सीमा पर लड़ने वाला सैनिक देशभक्त है।
ईमानदारी से टैक्स देने वाला नागरिक देशभक्त है। किसान जो देश का पेट भरता है, देशभक्त है। डॉक्टर, शिक्षक, मजदूर, वैज्ञानिक, पत्रकार और आम नागरिक-सब देश के निर्माण में योगदान देते हैं। तो फिर देशभक्ति की परीक्षा सिर्फ इस बात से क्यों हो कि आपने ‘वंदे मातरम’ कितनी बार गाया? क्या जो व्यक्ति गीत नहीं गाता, वह देश से प्रेम नहीं करता? और जो रोज ‘वंदे मातरम’ बोलता है लेकिन भ्रष्टाचार करता है, नफरत फैलाता है, हिंसा करता है क्या वह अपने आप देशभक्त हो जाता है?
सरकार को असली देशभक्ति पर ध्यान देना चाहिए
आज देश के सामने बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याएं और कानून-व्यवस्था जैसे गंभीर मुद्दे हैं। ऐसे समय में सरकार की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? रोजगार या राष्ट्रगीत पर जेल? बेहतर स्कूल या नारे की अनिवार्यता? महिलाओं की सुरक्षा या देशभक्ति की परीक्षा? गरीब की जिंदगी आसान करना या यह तय करना कि कौन कितना देशभक्त है? और सबसे बड़ा सवाल कि क्या देशभक्ति इतनी कमजोर चीज है कि उसे साबित कराने के लिए तीन साल की जेल का डर दिखाना पड़े?
देशभक्ति दिल से होती है, दबाव से नहीं
वंदे मातरम का सम्मान होना चाहिए। राष्ट्रगान का सम्मान होना चाहिए। तिरंगे का सम्मान होना चाहिए। लेकिन इन सबका सम्मान तभी और मजबूत होगा जब उसके साथ संविधान का सम्मान भी हो। किसी मुसलमान को अपने धर्म के खिलाफ जाने के लिए मजबूर करना देशभक्ति नहीं हो सकती। किसी हिंदू को भी उसकी धार्मिक मान्यता के खिलाफ मजबूर करना देशभक्ति नहीं हो सकती। देशभक्ति का मतलब संविधान के प्रति वफादारी है। सिर्फ किसी गीत या नारे के प्रति नहीं।
इसलिए सरकार को जवाब देना चाहिए कि क्या वंदे मातरम के सम्मान के लिए जेल जरूरी थी? क्या धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सम्मान के बीच बेहतर रास्ता नहीं निकाला जा सकता था? क्या हर नागरिक को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए सरकारी परीक्षा देनी होगी? और सबसे गंभीर सवाल-क्या कानून बनाने का असली उद्देश्य देश को जोड़ना है, या मुसलमानों को बार-बार कटघरे में खड़ा करके उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाना? भारत की ताकत यह नहीं कि यहां हर नागरिक एक जैसा सोचता है।
भारत की ताकत यह है कि अलग-अलग आस्था, भाषा और विचार रखने के बावजूद हम एक संविधान के नीचे बराबर नागरिक हैं। वंदे मातरम का सम्मान रहे, लेकिन संविधान की कीमत पर नहीं। देशभक्ति रहे, लेकिन डर के साथ नहीं। और राष्ट्रप्रेम हो, लेकिन किसी समुदाय को बार-बार कटघरे में खड़ा करके नहीं।
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