सैनिक स्कूलों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े संगठनों की कथित बढ़ती भूमिका को लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा उठाया गया सवाल केवल किसी एक संस्था या कुछ स्कूलों के संचालन का सवाल नहीं है। इसके पीछे देश की शिक्षा व्यवस्था, राष्ट्रवाद की परिभाषा, सैन्य प्रशिक्षण और सरकारी संस्थानों की वैचारिक निष्पक्षता से जुड़े कई गंभीर प्रश्न छिपे हुए हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
4 अगस्त को रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति की बैठक में राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि RSS से जुड़े निजी संगठन देश के कई सैनिक स्कूल चला रहे हैं और कुछ स्कूल ऐसे लोगों या संस्थाओं को दिए गए हैं जिनके संबंध सत्तारूढ़ भाजपा के करीब माने जाते हैं। समिति के अध्यक्ष राधा मोहन सिंह ने उनसे इन आरोपों के समर्थन में दस्तावेज मांगे।
यानी फिलहाल इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोप राजनीतिक बहस का विषय हैं, लेकिन उनकी पुष्टि दस्तावेजी जांच से होनी बाकी है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर सैनिक स्कूलों में निजी और वैचारिक रूप से पहचाने जाने वाले संगठनों की भागीदारी को लेकर इतनी चिंता क्यों पैदा हो रही है?
सैनिक स्कूलों की मूल भावना क्या है?
सैनिक स्कूलों की स्थापना का मूल उद्देश्य केवल बच्चों को सैन्य प्रशिक्षण देना नहीं था। इन संस्थानों का लक्ष्य अनुशासन, नेतृत्व, शारीरिक क्षमता, राष्ट्रीय कर्तव्य और ऐसी शिक्षा देना था जिससे विद्यार्थी आगे चलकर सशस्त्र बलों के साथ-साथ प्रशासन, विज्ञान, तकनीक और अन्य क्षेत्रों में भी योगदान दे सकें। सरकार ने 2022 में सैनिक स्कूलों के विस्तार के लिए एक नया पार्टनरशिप मॉडल शुरू किया। इसके तहत सरकारी स्कूलों के अलावा निजी स्कूलों, ट्रस्टों, सोसायटियों और NGOs को भी सैनिक स्कूल सोसाइटी के साथ जुड़ने का अवसर दिया गया।
सरकार का तर्क था कि इससे कम लागत में देश के अधिक हिस्सों तक सैनिक स्कूल जैसी शिक्षा पहुंचाई जा सकेगी। यहीं से असली बहस शुरू होती है। अगर सरकार निजी संस्थाओं को सैनिक स्कूल चलाने की अनुमति देती है तो सवाल यह होना चाहिए कि इन संस्थाओं की वैचारिक पृष्ठभूमि क्या है, उनका चयन किस प्रक्रिया से हुआ, पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धति पर उनका कितना प्रभाव है और क्या सभी संस्थाओं पर समान निगरानी लागू है?
RSS से जुड़े संगठनों का सवाल क्यों महत्वपूर्ण है?
RSS भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन में एक अत्यंत प्रभावशाली संगठन है। उससे जुड़े विभिन्न संगठनों का शिक्षा क्षेत्र में भी लंबे समय से नेटवर्क रहा है। उदाहरण के लिए, विद्या भारती का शिक्षा क्षेत्र में बड़ा नेटवर्क है और उसके अंतर्गत सरस्वती शिशु मंदिर तथा सरस्वती विद्या मंदिर जैसे स्कूल संचालित होते हैं। इसलिए यदि ऐसे संगठनों से जुड़े स्कूलों को सैनिक स्कूल के पार्टनरशिप मॉडल में बड़ी संख्या में जगह मिलती है, तो इसकी पारदर्शी जांच होना स्वाभाविक मांग है।
सरकारी रिकॉर्ड में पार्टनरशिप मॉडल के तहत ऐसे स्कूलों के उदाहरण भी मौजूद हैं। 2022 में जारी रक्षा मंत्रालय की सूची में Sundari Devi Saraswati Vidya Mandir और Vidya Bharati Gujarat Pradesh से जुड़े संस्थानों के नाम शामिल थे। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। किसी संस्था का RSS से वैचारिक या संगठनात्मक संबंध होना अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि वह संस्था सैनिक स्कूल में सैन्य शिक्षा या सरकारी पाठ्यक्रम के नियमों का उल्लंघन कर रही है।
इसीलिए राहुल गांधी के आरोपों को अंतिम सत्य मान लेना भी उचित नहीं होगा और उन्हें केवल राजनीतिक बयान कहकर खारिज कर देना भी। असल सवाल दस्तावेजों का है।
70 से ज्यादा स्कूलों का दावा कितना गंभीर है?
मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से 70 से अधिक सैनिक स्कूलों को RSS से जुड़े संगठनों, विशेषकर विद्या भारती और सरस्वती शिशु मंदिर नेटवर्क से जोड़े जाने का दावा सामने आया है। यह संख्या यदि आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्ट होती है तो मामला निश्चित रूप से गंभीर हो जाता है। क्योंकि तब सवाल केवल एक-दो संस्थानों का नहीं रहेगा, बल्कि सैनिक स्कूलों के विस्तार की पूरी नीति की जांच का विषय बन जाएगा। हालांकि यहां यह अंतर समझना बेहद जरूरी है कि “RSS से जुड़े संगठन द्वारा संचालित स्कूल” और “RSS द्वारा सीधे संचालित सैनिक स्कूल” एक ही बात नहीं हैं।
इसलिए संसदीय समिति को प्रत्येक स्कूल के मामले में यह देखना चाहिए कि: स्कूल का वास्तविक संचालक कौन है? ट्रस्ट या सोसायटी के पदाधिकारी कौन हैं? उसका RSS या उसके सहयोगी संगठनों से संबंध किस प्रकृति का है? स्कूल को सैनिक स्कूल का दर्जा किस प्रक्रिया से मिला? चयन के लिए कौन-कौन से मानदंड अपनाए गए? रक्षा मंत्रालय की निगरानी कितनी है? पाठ्यक्रम और शिक्षकों की नियुक्ति पर किसका नियंत्रण है? विद्यार्थियों को दी जाने वाली नागरिक और संवैधानिक शिक्षा की क्या व्यवस्था है? यही जांच इस पूरे विवाद को राजनीतिक आरोप से तथ्यात्मक बहस में बदल सकती है।
राष्ट्रवाद और विचारधारा में अंतर करना होगा
इस बहस का सबसे संवेदनशील हिस्सा “राष्ट्रवाद” है। सैनिक स्कूलों में देशभक्ति, अनुशासन और राष्ट्रीय कर्तव्य की भावना होना बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन राष्ट्रभक्ति और किसी एक राजनीतिक या वैचारिक संगठन की विचारधारा को एक मान लेना खतरनाक हो सकता है। भारत का संविधान किसी एक संगठन, धर्म या राजनीतिक विचारधारा को राष्ट्र की आधिकारिक विचारधारा नहीं बनाता। सैनिक स्कूल में बच्चे केवल सैनिक बनने की तैयारी नहीं करते; वे भविष्य के नागरिक भी बनते हैं। इसलिए उन्हें देश के संविधान, लोकतंत्र, विविधता, समानता, नागरिक अधिकार और कर्तव्यों की समझ भी मिलनी चाहिए।
अगर किसी स्कूल में राष्ट्रवाद का अर्थ केवल एक विशेष राजनीतिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण बन जाए, तो यह शिक्षा के व्यापक उद्देश्य पर बहस पैदा कर सकता है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी गलत होगा कि किसी राष्ट्रवादी या सांस्कृतिक संगठन से जुड़ी हर संस्था को स्वतः संदिग्ध मान लिया जाए। समाधान संगठन की पहचान पर नहीं, बल्कि उसके काम और उस पर लागू नियमों की पारदर्शिता पर आधारित होना चाहिए।
भाजपा का जवाब भी जांच के दायरे में होना चाहिए
भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने समिति में यह सुझाव दिया कि यह भी देखा जाना चाहिए कि NDA सरकार के सत्ता में आने से पहले सैनिक स्कूलों का संचालन किस तरह होता था। यह सवाल भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि यदि निजी भागीदारी को लेकर आज सवाल उठ रहे हैं, तो पूरी व्यवस्था की तुलना पुराने मॉडल से की जानी चाहिए।
क्या पुराने सरकारी मॉडल में गुणवत्ता बेहतर थी? क्या नए मॉडल से छात्रों की संख्या बढ़ी? क्या खर्च कम हुआ? क्या प्रवेश के अवसर बढ़े? क्या सैन्य प्रशिक्षण की गुणवत्ता बनी रही? यदि पार्टनरशिप मॉडल वास्तव में शिक्षा का विस्तार करने के लिए बनाया गया था, तो सरकार को उसके परिणामों का पूरा डेटा सार्वजनिक करने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।
असली खतरा “कौन चला रहा है” से ज्यादा “किस नियम पर चला रहा है” का है
इस मामले में बहस को केवल RSS बनाम कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई बना देना सबसे आसान रास्ता होगा। लेकिन इससे असली सवाल दब जाएगा। असल प्रश्न यह है कि सरकारी महत्व वाली संस्था का संचालन करने वाले निजी संगठन पर सार्वजनिक जवाबदेही कितनी है? यदि कोई निजी संस्था सैनिक स्कूल चलाती है, तो उसे सरकार के निर्धारित पाठ्यक्रम, प्रवेश नियम, सैन्य प्रशिक्षण, शिक्षक नियुक्ति, वित्तीय पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। और यही नियम किसी भी विचारधारा से जुड़े संगठन पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
रक्षा क्षेत्र में निजी भागीदारी का दूसरा सवाल
बैठक में विपक्षी सदस्यों ने रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों में निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी का मुद्दा भी उठाया। सरकार की तरफ से कहा गया कि घरेलू कंपनियों और MSMEs को बढ़ावा देना जरूरी है। यह तर्क अपने आप में महत्वपूर्ण है। भारत को आधुनिक रक्षा उद्योग के लिए निजी क्षेत्र और MSMEs की क्षमता का उपयोग करना पड़ सकता है। लेकिन रक्षा क्षेत्र में निजी भागीदारी के साथ भी वही सिद्धांत लागू होता है—पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हित।
विपक्षी सदस्यों की यह चिंता कि रक्षा सचिव की मौजूदगी में MSME प्रतिनिधि खुलकर अपनी बात नहीं रख पाएंगे, संसदीय निगरानी की गुणवत्ता से जुड़ा प्रश्न है। अगर समिति वास्तव में निजी क्षेत्र की समस्याएं सुनना चाहती है, तो ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें अधिकारी और उद्योग प्रतिनिधि दोनों स्वतंत्र रूप से अपनी बात रख सकें।
राहुल गांधी के आरोप की सबसे बड़ी परीक्षा अब शुरू होगी
राहुल गांधी ने आरोप लगा दिया है। समिति अध्यक्ष ने उनसे सबूत मांग लिया है। अब गेंद राहुल गांधी के पाले में है। यदि उनके पास दस्तावेज हैं तो उन्हें समिति के सामने रखना चाहिए। और यदि दस्तावेज सामने आते हैं तो रक्षा मंत्रालय को उनकी निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। साथ ही सरकार को भी केवल यह कहकर मामले को खारिज नहीं करना चाहिए कि यह विपक्ष का राजनीतिक आरोप है। क्योंकि सैनिक स्कूल कोई सामान्य निजी स्कूल नहीं है। वे रक्षा मंत्रालय से जुड़े संस्थान हैं और वहां पढ़ने वाले बच्चे भविष्य में देश की सेना, प्रशासन और सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन सकते हैं। इसलिए यहां वैचारिक निष्पक्षता का सवाल राजनीतिक सुविधा से कहीं बड़ा है।
सैनिक स्कूलों को राजनीतिक प्रयोगशाला नहीं बनना चाहिए
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में शिक्षा का उद्देश्य केवल अच्छे विद्यार्थी या अच्छे सैनिक तैयार करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार और संवैधानिक नागरिक तैयार करना भी है। RSS से जुड़े संगठनों को यदि सैनिक स्कूल चलाने की अनुमति नियमों के तहत मिली है, तो उसे केवल उनकी वैचारिक पहचान के आधार पर गलत नहीं कहा जा सकता। लेकिन यदि किसी संस्था को उसकी राजनीतिक पहुंच, सत्ता से नजदीकी या वैचारिक संबंध के कारण अनुचित लाभ मिला है, तो उसकी जांच अवश्य होनी चाहिए।
इसी तरह यदि राहुल गांधी ने 70 से अधिक स्कूलों में RSS संबंध का दावा किया है, तो उस दावे की भी दस्तावेजों के आधार पर पुष्टि होनी चाहिए। इस पूरे विवाद का सबसे उचित रास्ता न आरोप है, न बचाव—बल्कि पारदर्शी जांच है। क्योंकि सैनिक स्कूलों में पढ़ने वाला बच्चा किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता बनने के लिए नहीं, बल्कि देश का नागरिक और संभवतः देश की रक्षा करने वाला भविष्य का सैनिक बनने के लिए शिक्षा प्राप्त करता है। इसलिए सैनिक स्कूलों का सबसे पहला रिश्ता RSS से नहीं, BJP से नहीं, कांग्रेस से नहीं—बल्कि भारत के संविधान और देश के नागरिकों से होना चाहिए।
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