सुप्रीम कोर्ट जूता हमला केवल एक घटना नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर एक वकील द्वारा जूता फेंकने का यह सुप्रीम कोर्ट जूता हमला वास्तव में उस उग्र ऑनलाइन नफ़रत का भौतिक रूप था, जो हफ्तों से सोशल मीडिया पर पनप रही थी।
डिजिटल नफ़रत का ऑफ़लाइन परिणाम; एक जूते ने लोकतंत्र पर उठाया सवाल
सुप्रीम कोर्ट की चारदीवारी के भीतर गूंजे नारे, उड़ता जूता, और न्यायपालिका की गरिमा पर लगा दाग — यह महज़ एक सनकी वकील की हरकत नहीं, बल्कि उस उग्र और सुनियोजित ऑनलाइन नफ़रत का फिज़िकल रूप था, जो हफ्तों से सोशल मीडिया पर पनप रही थी।
हमला जो ‘ट्रेंड’ से निकला
6 अक्टूबर की सुबह जब सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही सामान्य ढंग से चल रही थी, कोर्ट नंबर 1 में बैठे देश के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर एक वकील ने जूता फेंकने की कोशिश की। वह सिर्फ़ नारे नहीं लगा रहा था — वह पिछले तीन हफ़्तों से भड़काई गई भीड़ मानसिकता का मुखर प्रतीक बन गया था।
- 71 वर्षीय अधिवक्ता राकेश किशोर — दिल्ली बार काउंसिल का पंजीकृत सदस्य — ने अपने जूते उतारकर सीजेआई की ओर निशाना साधा और नारा लगाया: “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे!”
- गनीमत रही कि सुरक्षाकर्मियों ने समय रहते उसे पकड़ लिया। लेकिन इस एक पल ने भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में भय, शर्म और सवाल — तीनों एक साथ दर्ज कर दिए।
जड़ें कहां हैं इस ‘हमले’ की?
सारा विवाद शुरू हुआ था 16 सितंबर को, जब जस्टिस गवई ने खजुराहो के जावरी मंदिर में विष्णु प्रतिमा की बहाली से जुड़ी एक याचिका को ‘पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन’ बताते हुए खारिज किया था। उन्होंने तंज़ भरे लेकिन हल्के लहजे में कहा था — “तुम भगवान विष्णु के भक्त हो, तो जाओ, उनसे ही कहो प्रतिमा को ठीक कर दें।” यहीं से आग भड़की।
- सोशल मीडिया पर #ImpeachCJI ट्रेंड करने लगा।
- हिंदू दक्षिणपंथी यूट्यूबर व संगठनों ने इसे “धर्म का अपमान” घोषित कर दिया।
‘हिंदू यूट्यूब’ पर अभियान
सबसे आगे थे अजीत भारती, जो अपने लाखों फॉलोअर्स वाले चैनल पर लगातार सीजेआई गवई को निशाना बनाते रहे। उनकी भाषा नफ़रत भरी थी —
- “यह आरंभ है… ऐसे कायर और हिन्दू विरोधी जजों को सड़कों पर भी सबक सिखाया जाएगा।”
- भारती के मंच पर हिंदू कैफे फाउंडेशन के संस्थापक कौशलेश राय ने खुलेआम हिंसा का आह्वान किया: “अगर मैं हिंसा का समर्थन करता, तो कहता कि गवई की मुंडी दीवार पर मारी जाए… लेकिन मैं तो गांधीवादी हूं!”
ऐसी ‘विडंबनापूर्ण शांति’ का संदेश सोशल मीडिया पर लाखों बार देखा गया। वीडियो का शीर्षक था — “CJI Gavai Vs Sleeping Hindus” — और यही स्लोगन अगले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट की दीवारों तक पहुँच गया।
न्याय की कुर्सी पर हमले का प्रतीक
हमले के वक्त जस्टिस गवई ने अविश्वसनीय संयम दिखाया। उन्होंने कहा — “इन बातों से विचलित न हों। हम प्रभावित नहीं होते।” लेकिन सवाल यह है कि क्या अब भारत का कोई न्यायाधीश अपने कोर्टरूम में भी सुरक्षित है?
- कानूनी हलकों में यह घटना “न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला” बताई जा रही है।
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने हमलावर राकेश किशोर का लाइसेंस तत्काल निलंबित कर दिया है।
- सुप्रीम कोर्ट ने इसे “क्रिमिनल कंटेम्प्ट” यानी अदालत की आपराधिक अवमानना का मामला बताया है।
ऑनलाइन ज़हर, ऑफलाइन हिंसा
यह घटना सिर्फ़ एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि एक डिजिटल उन्माद का ऑफलाइन परिणाम है। जब यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया अकाउंट ‘धार्मिक आस्था के नाम पर हिंसा’ का कारोबार करते हैं, तो उनका असर अदालतों तक पहुँचता है। सीजेआई की आलोचना से शुरू हुआ यह डिजिटल अभियान अब न्यायिक आतंक का रूप ले चुका है —जहाँ जजों को भीड़ की अदालत में पेश किया जा रहा है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
- टीएमसी सांसद सागरिका घोष ने कहा: “यह भाजपा की आईटी आर्मी द्वारा पाले गए उस ज़हर का परिणाम है जो लोगों को हिंसक बना रहा है।”
- कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने इसे “धर्मांधता नहीं, पागलपन” बताया — “जब सुप्रीम कोर्ट का सबसे वरिष्ठ जज निशाने पर हो, तो सोचिए बाकी संस्थाएँ कितनी सुरक्षित हैं।”
आंबेडकरवादी विरासत बनाम ‘सनातनी’ हमला
दिलचस्प यह है कि चीफ जस्टिस गवई, डॉ. भीमराव आंबेडकर की परंपरा से आते हैं। उनकी मां कमलताई गवई ने हाल ही में आरएसएस के कार्यक्रम में जाने से इनकार किया था और कहा था: “हम आंबेडकरवादी विचार को अंतिम सांस तक निभाएंगे।” क्या यही वैचारिक असहमति अब “धर्म के अपमान” का रूप ले चुकी है?
भारत के लोकतंत्र के लिए चेतावनी
यह हमला सिर्फ़ एक जूता नहीं —यह लोकतंत्र की नींव पर पड़ा वह पहला पत्थर है जो यह पूछता है: क्या न्यायाधीश अपने धर्म, जाति या विचार से ऊपर नहीं हो सकते? न्यायपालिका का डरना यानी संविधान का झुकना। और अगर न्याय की कुर्सी भी डरने लगे — तो बचा क्या?
अंतिम सवाल
अब जब बार काउंसिल ने लाइसेंस निलंबित कर दिया है और पुलिस ने गिरफ्तारी कर ली है, क्या सरकार उन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी कार्रवाई करेगी जिन्होंने यह नफ़रत पनपाई? या फिर एक और जूता किसी और कोर्ट में उड़ने तक देश इंतज़ार करेगा?
क्योंकि जब नफ़रत को ट्रेंड बना दिया जाए — तो कानून की किताबें भी कांप उठती हैं।
On social media these days…: CJI Gavai quips amid Lord Vishnu remark row
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