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मेहंदी जिहाद और लव जिहाद: भड़काऊ मीडिया को चेतावनी नहीं, सबक चाहिए

adminBy adminOctober 7, 2025Updated:October 7, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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मेहंदी जिहाद
मेहंदी जिहाद
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एनबीडीएसए का झटका: ज़ी न्यूज़ और टाइम्स नाउ नवभारत पर कार्रवाई

एनबीडीएसए ने हाल ही में दो बड़े टीवी चैनलों — ज़ी न्यूज़ और टाइम्स नाउ नवभारत — को तगड़ा झटका दिया है। ‘मेहंदी जिहाद’ और ‘लव जिहाद’ जैसे सांप्रदायिक कार्यक्रमों पर कार्रवाई करते हुए संस्था ने कहा कि इन चैनलों ने तटस्थता, पत्रकारिता नैतिकता और आचार संहिता का उल्लंघन किया है।

  • ज़ी न्यूज़ को आदेश दिया गया है कि वह “मेहंदी जिहाद” पर प्रसारित अपने सभी वीडियो और लिंक हटा दे।
  • टाइम्स नाउ नवभारत को अपने “लव जिहाद” वाले दो प्रसारणों से उत्तेजक टिकर (स्लोगन) हटाने का निर्देश दिया गया है।

‘मेहंदी जिहाद’ का खेल: नफ़रत को न्यूज़ बना देना

शिकायत का मूल था नफ़रत को न्यूज़ बना देना। शिकायतकर्ता इंद्रजीत घोरपड़े ने बताया कि ज़ी न्यूज़ ने अक्टूबर 2024 में एक हिंदुत्व समूह के अभियान को बढ़ावा दिया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि “मुस्लिम मेहंदी कलाकार हिंदू महिलाओं पर लगाई जाने वाली मेहंदी में थूकते हैं और मांसाहारी चीज़ें मिलाते हैं।”

  • यह झूठा और सांप्रदायिक दावा केवल स्क्रीन पर सनसनी फैलाने के लिए था — बिना किसी प्रमाण, तथ्य या दूसरी राय के।
  • चैनल ने कार्यक्रमों में “मेहंदी जिहाद नया फसाद”, “डंडे मारो सालों को” और “लाठी मॉडल लॉन्च” जैसे उत्तेजक नारे दोहराए — मानो न्यूज़ डिबेट नहीं, किसी युद्ध की तैयारी हो रही हो।

जस्टिस एके सीकरी ने एनबीडीएसए के आदेश में लिखा, “प्रसारक ने किसी भी विरोधी दृष्टिकोण को जगह नहीं दी। सभी प्रभावित पक्षों के विचार प्रस्तुत न करना, तटस्थता के सिद्धांत का उल्लंघन है।”

‘लव जिहाद’ की फर्जी पटकथा: तथ्यों की अनदेखी

दूसरा मामला टाइम्स नाउ नवभारत का था। 2 अक्टूबर 2024 के उनके कार्यक्रमों में बरेली के एक केस को ‘लव जिहाद’ के रंग में पेश किया गया, जबकि शिकायतकर्ता ने बताया कि उस मामले में महिला ने बाद में बयान बदल दिया था और कहा कि उस पर दबाव डालकर आरोप लगवाए गए थे।

फिर भी चैनल ने टिकर चलाए:

  • “यूपी में लव जिहाद… टूलकिट पाकिस्तानी”
  • “आनंद निकला आलिम, फर्जी मोहब्बत वाला जालिम”

न्यायाधीश सीकरी ने माना कि चैनल ने अदालती फैसले से आगे जाकर अपनी कथा गढ़ी, जो पत्रकारिता नहीं, विचारधारा की सेवा थी। अगर यूँ कहा जाये तो भी गलत नहीं होगा कि भड़वागिरी थी।

सबसे बड़ा सवाल: सिर्फ चेतावनी क्यों?

लेकिन सवाल बाकी है: सिर्फ चेतावनी क्यों? एनबीडीएसए के पास 25 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाने का अधिकार है, फिर भी उसने सिर्फ चेतावनी देकर मामला निपटा दिया।

घोरपड़े ने एक्स (Twitter) पर प्रतिक्रिया दी — “चैनल से सिर्फ वीडियो हटवाए गए, जबकि मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ हिंसक धमकियों वाले कार्यक्रम टीवी पर एक साल पहले प्रसारित हो चुके हैं।”

यानी जब तक न्यायिक चेतावनी आई, तब तक नुकसान हो चुका था — समाज में ज़हर घुल चुका था, और न्यूज़ स्टूडियो अपनी टीआरपी गिन रहे थे।

मीडिया की असल बीमारी: नफ़रत की अर्थव्यवस्था

‘ग़ोडी मीडिया’ की पहचान अब किसी परिचय की मोहताज नहीं।

  • जहाँ पत्रकारिता का काम सवाल उठाना था, वहाँ आज सवाल पूछने वालों को “देशद्रोही” कहा जाता है।
  • जहाँ सच्चाई दिखानी थी, वहाँ “थूक”, “जिहाद”, “मांसाहार” जैसे शब्दों से साम्प्रदायिक हाइप बनायी जाती है।

इन कार्यक्रमों का मकसद न तो समाज में शांति है, न सच्चाई की तलाश — मकसद है डर और विभाजन की राजनीति को टीआरपी की रोटी पर सेंकना।

निष्कर्ष: अब जनता को तय करना है

एनबीडीएसए का आदेश एक छोटा पर ज़रूरी कदम है — पर असली सवाल यह है कि क्या यह देश अब भी मीडिया से सच्चाई की उम्मीद करता है या केवल तमाशे की?

जब तक जनता नफ़रत के इस कारोबार को पहचानकर “न्यूज़” और “प्रोपेगैंडा” के बीच फ़र्क़ नहीं समझेगी, तब तक स्टूडियो में चींखते एंकर और झूठ की बुनावट में फँसा लोकतंत्र, दोनों ही सच्ची पत्रकारिता के क़ातिल बने रहेंगे।

Mehendi jihad’, ‘garba jihad’: News TV’s endless jihad playbook faces another rebuke


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