बिहार से आई यह खबर सिर्फ चौंकाने वाली नहीं, बल्कि लोकतंत्र और सरकारी धन के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल खड़े करती है। बिहार राज्य ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समर्पित मंदिर बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है और खबर के मुताबिक इस मंदिर का पूरा खर्च बिहार सरकार उठाएगी। यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है कि सरकारी खजाने से किसी जीवित प्रधानमंत्री का मंदिर आखिर कैसे बनाया जा सकता है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं, किसी रियासत के राजा या धार्मिक अवतार नहीं। सरकार का काम नागरिकों के लिए स्कूल, अस्पताल, रोजगार, आवास और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना है, किसी राजनीतिक व्यक्ति की पूजा के लिए मंदिर बनाना नहीं।
सरकारी पैसा मंदिर के लिए या ट्रांसजेंडर समुदाय के कल्याण के लिए?
ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड का उद्देश्य इस समुदाय को अधिकार, सम्मान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा दिलाना है। तो फिर सवाल है कि क्या ट्रांसजेंडर समुदाय की सबसे बड़ी समस्या मंदिर की कमी है? अगर सरकार के पास पैसा है तो ट्रांसजेंडर लोगों के लिए रोजगार केंद्र क्यों नहीं बनाए जाते? छात्रवृत्ति क्यों नहीं दी जाती? स्वास्थ्य और आवास की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर क्यों नहीं बढ़ाए जाते? प्रधानमंत्री का मंदिर बनाना आखिर ट्रांसजेंडर समुदाय की किस वास्तविक समस्या का समाधान करता है? क्या कल मुख्यमंत्री और मंत्रियों के भी सरकारी मंदिर बनेंगे? मान लीजिए कल किसी राज्य सरकार को लगे कि मुख्यमंत्री ने जनता के लिए बहुत अच्छा काम किया है। क्या फिर सरकारी धन से मुख्यमंत्री का मंदिर बनाया जा सकता है? फिर किसी मंत्री का? किसी सांसद का? अगर इसका जवाब ‘नहीं’ है, तो प्रधानमंत्री के मामले में अलग नियम क्यों? लोकतंत्र में नेता का सम्मान हो सकता है, लेकिन सरकारी संस्था द्वारा व्यक्ति-पूजा की परंपरा शुरू करना बेहद खतरनाक मिसाल बन सकती है।
संविधान और सरकारी धन का सवाल
यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह फैसला सीधे संविधान का उल्लंघन साबित हो चुका है। लेकिन सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि किस कानून और किस बजट प्रावधान के तहत एक कल्याणकारी सरकारी बोर्ड किसी जीवित प्रधानमंत्री को समर्पित मंदिर के निर्माण पर सार्वजनिक धन खर्च कर सकता है।
क्या कैबिनेट ने मंजूरी दी? क्या वित्त विभाग की अनुमति है? किस बजट मद से पैसा आएगा? क्या सरकारी जमीन दी जाएगी? क्या विधि विभाग से राय ली गई? और क्या कैग इस खर्च का ऑडिट करेगा? इन सवालों का जवाब बिहार सरकार को देना चाहिए।
श्रद्धा है तो निजी चंदे से मंदिर बनाइए
अगर ट्रांसजेंडर समुदाय के कुछ लोग नरेंद्र मोदी को सम्मान देने के लिए मंदिर बनाना चाहते हैं, तो वे निजी चंदे से ऐसा कर सकते हैं। लेकिन सरकारी खजाना किसी व्यक्ति की निजी श्रद्धा के लिए नहीं होता। प्रधानमंत्री ने समुदाय के लिए अच्छा काम किया है तो उनका सम्मान कीजिए, उपलब्धियां गिनाइए, सरकारी योजनाओं के आंकड़े सामने रखिए। लेकिन सम्मान और व्यक्ति-पूजा के बीच फर्क क्यों मिटाया जा रहा है?
मोदी पर लगे आरोपों का सवाल भी क्यों उठता है?
नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन को लेकर गुजरात दंगों सहित कई गंभीर राजनीतिक आरोप और विवाद रहे हैं। हालांकि इन आरोपों को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य बताना उचित नहीं होगा; गुजरात दंगों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में SIT की क्लीन चिट को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की थी। इसी तरह किसी व्यक्ति का नाम एपस्टीन से जुड़े दस्तावेजों में आना अपने आप में किसी अपराध में उसकी संलिप्तता साबित नहीं करता। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि मोदी पर क्या-क्या आरोप हैं। असली सवाल यह है कि आरोप किसी भी व्यक्ति पर हों या न हों-क्या किसी जीवित प्रधानमंत्री का मंदिर सरकारी पैसे से बनाया जाना चाहिए?
अगर यही मंदिर किसी विपक्षी नेता का होता तो?
अगर किसी सरकारी बोर्ड ने राहुल गांधी, अखिलेश यादव या किसी दूसरे विपक्षी नेता का मंदिर बनाने का प्रस्ताव रखा होता और सरकार उसका खर्च उठाती, तो क्या आज सत्ता पक्ष इसे स्वीकार करता? शायद नहीं। तो फिर लोकतंत्र में सिद्धांत व्यक्ति देखकर क्यों बदले? जो नियम विपक्ष के लिए गलत है, वही सत्ता पक्ष के लिए भी गलत होना चाहिए। ट्रांसजेंडर समुदाय को मंदिर नहीं, अधिकार चाहिए ट्रांसजेंडर समाज को प्रतीकात्मक सम्मान से ज्यादा जरूरत है रोजगार की, शिक्षा की, स्वास्थ्य की, सुरक्षित आवास की और सम्मानजनक जीवन की। अगर सरकार वास्तव में इस समुदाय का सम्मान करना चाहती है तो ऐसी योजनाएं बनाए जिनसे उनका जीवन बदले। प्रधानमंत्री का मंदिर बनाकर किसी समुदाय का सशक्तिकरण नहीं होगा।
और आखिर में सबसे बड़ा सवाल
क्या भारत में लोकतंत्र धीरे-धीरे संस्थाओं से निकलकर व्यक्ति-पूजा की तरफ बढ़ रहा है? प्रधानमंत्री का सम्मान कीजिए, उनके काम की प्रशंसा कीजिए, लेकिन उन्हें राजा मत बनाइए। क्योंकि प्रधानमंत्री संविधान के अधीन होता है और सरकारी खजाना जनता का होता है, किसी नेता की भक्ति का नहीं।
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