झारखंड के चतरा जिले में मोहम्मद इमरोज़ की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या की घटना सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं है। यह उस खतरनाक मानसिकता पर सवाल खड़ा करती है जिसमें किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगते ही जांच, पुलिस, मेडिकल रिपोर्ट और अदालत की प्रक्रिया को किनारे कर दिया जाता है और भीड़ खुद ही जज, जूरी और जल्लाद बन बैठती है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
सबसे गंभीर बात यह है कि इस मामले में नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के आरोप की अभी पुष्टि नहीं हुई थी। प्रशासन ने खुद कहा है कि लड़की को मेडिकल जांच के लिए भेजा गया है और रिपोर्ट आने के बाद ही आरोपों के संबंध में निष्कर्ष निकाला जा सकेगा। लेकिन फैसला पहले ही सुना दिया गया। वह भी अदालत ने नहीं—भीड़ ने।
आरोप लगा और सजा भी दे दी गई
घटना के अनुसार एक नाबालिग लड़की के लापता होने के बाद उसके मिलने पर कथित तौर पर उसने इमरोज़ पर उसे अपने घर में बंधक बनाकर रखने और बलात्कार का आरोप लगाया। इसके बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण इमरोज़ के घर पहुंचे। इमरोज़ के पिता की शिकायत के मुताबिक भीड़ ने उनके माता-पिता को बांधा और मारपीट की। जब इमरोज़ उन्हें बचाने के लिए सामने आया तो उस पर लाठी और पत्थरों से हमला किया गया। गंभीर रूप से घायल होने के बाद अस्पताल में उसकी मौत हो गई।
यहां एक बुनियादी सवाल है: अगर इमरोज़ पर लगे आरोप सही भी साबित होते, तब भी क्या उसे मार डालने का अधिकार उस भीड़ को था? जवाब बिल्कुल स्पष्ट है—नहीं। बलात्कार का आरोपी हो या हत्या का आरोपी, चोरी का आरोपी हो या आतंकवाद का आरोपी—भारत में किसी आरोपी को सजा देने का अधिकार भीड़ को नहीं दिया गया है।
अगर वह मुसलमान है तो क्या कानून की जरूरत नहीं?
इस घटना की सबसे परेशान करने वाली परत यही है कि मृतक का नाम मोहम्मद इमरोज़ है। यहीं से एक बेहद खतरनाक सवाल सामने आता है—क्या समाज में ऐसी मानसिकता मजबूत हो रही है कि आरोपी मुसलमान हो तो पहले उसे भीड़ के हवाले करो, बाद में जांच की जरूरत समझो?
अगर यही सोच विकसित हो रही है तो यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि कानून के शासन पर हमला है। किसी व्यक्ति का मुसलमान होना उसके खिलाफ लगे आरोप को स्वतः सही साबित नहीं करता। और किसी व्यक्ति का मुसलमान होना उसे अपराध करने का लाइसेंस भी नहीं देता। दोनों बातें एक साथ सच हैं। यदि इमरोज़ ने अपराध किया है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए थी। लेकिन कार्रवाई कानून के तहत होनी चाहिए थी, भीड़ के हाथों नहीं।
पुलिस, मेडिकल जांच और अदालत क्यों हैं?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब पुलिस मौजूद है, जांच एजेंसियां मौजूद हैं, मेडिकल जांच की व्यवस्था है और अदालत मौजूद है तो फिर भीड़ को फैसला करने की जरूरत क्यों पड़ी? एक लोकतांत्रिक देश में आपराधिक न्याय व्यवस्था का एक निर्धारित क्रम है— आरोप → पुलिस जांच → सबूत → गिरफ्तारी → मेडिकल और फोरेंसिक जांच → चार्जशीट → अदालत → फैसला → सजा। इस पूरी प्रक्रिया को हटाकर अगर व्यवस्था यह बन जाए कि— आरोप → भीड़ → हत्या।
तो फिर पुलिस, अदालत और संविधान की जरूरत ही क्या रह जाती है? आज किसी पर बलात्कार का आरोप लगाकर भीड़ उसे मार देगी। कल किसी पर चोरी का आरोप लगाकर दूसरी भीड़ हत्या कर देगी। परसों किसी राजनीतिक विरोधी पर देशद्रोह का आरोप लगाकर तीसरी भीड़ फैसला सुना देगी। फिर कानून की किताबें केवल सजावट बनकर रह जाएंगी।
इस मामले में दो FIR होना बहुत महत्वपूर्ण है
रिपोर्ट के अनुसार पुलिस ने दो अलग-अलग FIR दर्ज की हैं। एक मृतक के पिता की शिकायत पर मॉब लिंचिंग से संबंधित धाराओं में और दूसरी नाबालिग लड़की की शिकायत पर POCSO कानून के तहत। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था का सही रास्ता है। लड़की के आरोप की जांच होनी चाहिए।
अगर उसके साथ अपराध हुआ है तो आरोपी के खिलाफ कठोरतम कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। और इमरोज़ की हत्या में शामिल लोगों की भी जांच होनी चाहिए। एक अपराध दूसरे अपराध को सही नहीं बना सकता। अगर लड़की के साथ बलात्कार हुआ है तो वह गंभीर अपराध है। अगर इमरोज़ को भीड़ ने पीटकर मार डाला है तो वह भी गंभीर अपराध है। न्याय का अर्थ यह नहीं कि एक अपराधी को दूसरे अपराधी के हवाले कर दिया जाए।
“लेकिन वह पहले भी आरोपी था”—यह तर्क भी खतरनाक है
कुछ रिपोर्टों में इमरोज़ के 2023 के एक पुराने बलात्कार मामले में जेल जाने की बात सामने आई है। मान लीजिए यह तथ्य सही है। तो भी सवाल समाप्त नहीं होता। किसी व्यक्ति का पिछला आपराधिक रिकॉर्ड किसी नए आरोप को स्वतः सिद्ध नहीं करता। अगर पुराने मामले में वह दोषी ठहराया गया था, तो उसकी सजा कानून के मुताबिक हुई होगी। अगर नया आरोप है तो उसकी भी जांच और मुकदमा होना चाहिए। किसी व्यक्ति का पुराना रिकॉर्ड यह अधिकार किसी भीड़ को नहीं देता कि वह उसे सड़क पर मार डाले। आरोपी और दोषी के बीच का अंतर लोकतंत्र की बुनियादी समझ है।
असली परीक्षा पुलिस और प्रशासन की है
इस मामले में यह आरोप भी सामने आया है कि घटना के समय कुछ पुलिसकर्मी मौजूद थे। पुलिस अधिकारी ने इस दावे से इनकार करते हुए कहा कि पुलिस के पहुंचने से पहले ही हमला शुरू हो चुका था। यह तथ्य जांच का विषय है। अगर पुलिस समय पर पहुंची थी तो उसकी भूमिका क्या थी? अगर पुलिस देर से पहुंची तो क्यों? अगर भीड़ 100-150 लोगों की थी तो उसे नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त पुलिस बल क्यों नहीं था? क्या पुलिस को पहले से तनाव की जानकारी थी?
क्या किसी ने प्रशासन को सूचना दी थी? और सबसे महत्वपूर्ण—अगर वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया, तो वीडियो बनाने और उसे प्रसारित करने वालों की भी पहचान होगी या नहीं? इन सवालों के जवाब जरूरी हैं।
बच्ची को न्याय चाहिए, लेकिन आरोपी की हत्या करके नहीं
इस पूरी घटना में नाबालिग लड़की को भी नहीं भूलना चाहिए।अगर वह वास्तव में यौन अपराध की शिकार हुई है तो उसके साथ न्याय होना चाहिए। उसकी सुरक्षा, मेडिकल जांच, मनोवैज्ञानिक सहायता और कानूनी संरक्षण सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन किसी पीड़ित के न्याय के नाम पर किसी आरोपी की हत्या कर देना न्याय नहीं है। बल्कि इससे न्याय व्यवस्था कमजोर होती है।
क्योंकि तब अगली बार किसी लड़की या महिला के साथ अपराध होने पर भीड़ यह मान सकती है कि पुलिस और अदालत तक जाने की जरूरत नहीं—बस आरोपी को पकड़ो और मार डालो। यह सोच अंततः पीड़ितों के लिए भी खतरनाक है, क्योंकि गलत व्यक्ति को आरोपी बनाकर मार डालने की संभावना बढ़ जाती है।
आज इमरोज़ है, कल कोई और हो सकता है
मॉब लिंचिंग का सबसे खतरनाक पहलू यही है कि भीड़ को एक बार कानून से ऊपर खड़ा कर दिया जाए तो वह किसी के लिए सुरक्षित नहीं रहती। आज किसी मुसलमान पर आरोप लगा है। कल किसी दलित पर लग सकता है। परसों किसी आदिवासी पर। किसी प्रवासी मजदूर पर। किसी राजनीतिक कार्यकर्ता पर। किसी प्रेमी युवक पर। किसी पत्रकार पर। अगर समाज ने यह स्वीकार कर लिया कि आरोप लगना ही सजा का आधार है, तो फिर किसी निर्दोष व्यक्ति की जिंदगी भीड़ की अफवाह के भरोसे होगी।
कानून सबके लिए एक होना चाहिए
इस घटना की सबसे बड़ी सीख यही है कि अपराध के खिलाफ कठोरता और कानून के शासन की रक्षा—दोनों एक साथ संभव हैं। यदि इमरोज़ पर लगे आरोप सही हैं तो उसे कानून के अनुसार कठोरतम सजा मिलनी चाहिए थी। लेकिन यदि वह दोषी साबित नहीं हुआ था, तो उसे मार डालने वाली भीड़ ने न केवल एक इंसान की जान ली, बल्कि न्याय व्यवस्था को भी चुनौती दी। और यदि वह दोषी था, तब भी उसकी हत्या को न्याय नहीं कहा जा सकता।
क्योंकि सभ्य समाज में यह फैसला अदालत करती है कि कौन अपराधी है और कौन निर्दोष। अगर मुसलमान होने की वजह से किसी आरोपी के लिए पुलिस जांच, मेडिकल रिपोर्ट, सबूत और अदालत की जरूरत ही नहीं समझी जाएगी, तो यह केवल मुस्लिम समुदाय के लिए खतरा नहीं है—यह पूरे लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। कानून की असली ताकत यही है कि वह आरोपी का नाम, धर्म और पहचान देखकर नहीं बदलता। अपराधी को सजा चाहिए—लेकिन सजा कानून देगा, भीड़ नहीं।
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