भारत को “नरक” कहने वाली भाषा केवल एक विदेशी नेता या रेडियो होस्ट की बदजुबानी नहीं है; यह उस साम्राज्यवादी मानसिकता की बदबू है, जो आज भी दुनिया को अपने तराजू पर तौलती है। भारत को “हेलहोल” कहने वाली टिप्पणी केवल एक अपमानजनक शब्द नहीं, बल्कि उस पश्चिमी श्रेष्ठताबोध की अभिव्यक्ति है, जो आज भी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को बराबरी की नज़र से देखने को तैयार नहीं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
जिस देश ने विश्व को शून्य, योग, आयुर्वेद, बुद्ध, पाणिनि और लोकतांत्रिक बहुलता की अद्भुत परंपरा दी, उसे “नरक” कहना न केवल अज्ञान है, बल्कि सभ्यता के इतिहास के प्रति घोर निरक्षरता भी है। भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में है, चंद्रमा तक पहुंच चुका है, डिजिटल क्रांति का नेतृत्व कर रहा है, वैश्विक वैक्सीन आपूर्ति का केंद्र है और अमेरिकी तकनीक, चिकित्सा, शिक्षा तथा उद्योग जगत में भारतीय मूल के लोग उसकी प्रगति की रीढ़ बने हुए हैं।
सुंदर पिचाई, सत्य नडेला, अरविंद कृष्ण और लाखों भारतीय-अमेरिकी इस बात का जीवित प्रमाण हैं कि भारत प्रतिभा, परिश्रम और बौद्धिक क्षमता का अक्षय स्रोत है। मित्रता का अर्थ यह नहीं कि भारत किसी विदेशी राजनीतिक उन्माद या नस्लवादी भाषा को चुपचाप सहन करता रहे; भारत अमेरिका का साझेदार है, अधीनस्थ नहीं। लेकिन इस पूरे विवाद का दूसरा और अधिक असहज प्रश्न यह है कि आखिर भारत के बारे में ऐसी भाषा बोलने का साहस पैदा क्यों होता है? आखिर ऐसी टिप्पणी को जमीन कौन देता है? कौन-सी तस्वीर है जो भारत को लेकर दुनिया के सामने बन रही है?
भारत कोई “हेलहोल” नहीं है। यह बुद्ध, कबीर, गांधी, अंबेडकर,कलाम, टैगोर और नेहरू की धरती है। यह विविधताओं, संघर्षों, उपलब्धियों और लोकतांत्रिक चेतना से भरा हुआ राष्ट्र है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि आज भारत की छवि को सबसे ज्यादा नुकसान किसी विदेशी ने नहीं, बल्कि अपने ही सत्ताधारियों और नफरत की राजनीति ने पहुंचाया है। जब किसी देश में अल्पसंख्यक अपने ही वतन में असुरक्षित महसूस करने लगें, जब उनके घरों पर बुलडोजर चलें, जब उनकी मस्जिदों पर हमले हों, जब भीड़ खुलेआम लिंचिंग करे और अपराधियों के गले में मालाएं डाली जाएं, तो दुनिया सवाल पूछती है।
जब किसी नागरिक का बहिष्कार उसके नाम, खानपान या पहनावे के कारण होने लगे, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उस देश की छवि धूमिल होती है। जब सरकार से सवाल पूछने वाले पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और विपक्षी नेताओं के पीछे ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग लगा दिए जाएं, जब असहमति को देशद्रोह और आलोचना को षड्यंत्र बना दिया जाए, तो लोकतंत्र की साख कमजोर होती है। जब जेलें विचारों से भरने लगें और संसद में बहस की जगह शोर लेने लगे, तब दुनिया नोटिस लेती है। यह केवल छवि का संकट नहीं है; यह आत्मा का संकट है।
आज भारत को “नरक” कहने की हिम्मत इसलिए पैदा होती है क्योंकि देश के भीतर नफरत का कारोबार करने वालों ने भारत की आत्मा को घायल किया है। हिंदुत्व की राजनीति ने राष्ट्रवाद को उन्माद में बदल दिया है। सत्ता बचाने के लिए समाज को बांटा गया, चुनाव जीतने के लिए समुदायों को लड़ाया गया, और राजनीतिक लाभ के लिए संविधान की आत्मा को चुनौती दी गई। तो सवाल उठता है—अगर दुनिया में भारत की छवि धूमिल हुई है, तो उसका जिम्मेदार कौन है? क्या वह आम भारतीय है, जो आज भी मेहनत, ईमानदारी और भाईचारे से देश को आगे बढ़ा रहा है? नहीं।
क्या वह किसान है, जो खेत में पसीना बहा रहा है? नहीं। क्या वह वैज्ञानिक है, जो चंद्रयान बना रहा है? नहीं। जिम्मेदारी उन लोगों पर है, जिन्होंने सत्ता को सेवा नहीं, वर्चस्व का माध्यम बना दिया। जिन्होंने भारत को विकास से ज्यादा विभाजन की राजनीति में झोंक दिया। जिन्होंने नागरिकों को बराबरी के अधिकार से ज्यादा पहचान की खाइयों में धकेला। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भाजपा ने सत्ता को स्थायी बनाने के लिए देश के सामाजिक ताने-बाने को गहरी चोट पहुंचाई है।
नफरत को सामान्य बनाया गया, हिंसा को राजनीतिक संरक्षण मिला, और संविधान के मूल्यों को बार-बार कठघरे में खड़ा किया गया। भारत को किसी विदेशी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं। लेकिन अगर आज कोई भारत पर उंगली उठाने की हिम्मत करता है, तो हमें आईने में झांकने का साहस भी रखना होगा। भारत नरक नहीं है। लेकिन अगर कहीं नरक जैसी स्थितियां पैदा हुई हैं, तो उसके पीछे वे शक्तियां हैं जिन्होंने लोकतंत्र को भीड़तंत्र, राष्ट्रवाद को घृणा और शासन को प्रतिशोध में बदलने की कोशिश की है।
भारत की महानता उसकी बहुलता में है, उसकी असहमति में है, उसके संविधान में है। जो लोग इस बहुलता को कुचलते हैं, वे भारत को मजबूत नहीं, कमजोर करते हैं। इसलिए आज लड़ाई केवल एक विदेशी अपमान के खिलाफ नहीं है। लड़ाई उस घरेलू राजनीति के खिलाफ भी है, जिसने भारत को दुनिया की नजरों में कटघरे में खड़ा कर दिया। भारत को “नरक” किसी माइकल सैवेज ने नहीं बनाया। अगर कहीं यह खतरा पैदा हुआ है, तो वह नफरत, विभाजन और सत्ता की अंधी भूख से पैदा हुआ है। और इतिहास यह जरूर पूछेगा कि जब भारत की आत्मा पर हमला हो रहा था, तब जिम्मेदार कौन था?