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Home»भारत

चुनाव आयोग पर सबसे बड़ा हमला या लोकतंत्र की सबसे बड़ी पुकार?

adminBy adminApril 30, 2026 भारत No Comments3 Mins Read
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भारतीय लोकतंत्र में शायद ही कभी ऐसा क्षण आया हो, जब मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ विपक्ष को इतने गंभीर आरोपों के साथ संसद का दरवाजा खटखटाना पड़ा हो। राज्यसभा के 73 विपक्षी सांसदों द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए दिया गया नया नोटिस केवल एक संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता, विश्वसनीयता और संवैधानिक गरिमा पर उठे अभूतपूर्व सवालों का दस्तावेज है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

आदर्श आचार संहिता के कथित पक्षपातपूर्ण पालन से लेकर, आधिकारिक सोशल मीडिया मंचों के राजनीतिक इस्तेमाल, करोड़ों मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने के आरोप, न्यायपालिका की प्रतिकूल टिप्पणियां और नौकरशाहों के तबादलों में कथित हस्तक्षेप-ये आरोप मामूली नहीं हैं। यदि चुनाव कराने वाली संस्था पर ही पक्षपात का संदेह गहराने लगे, तो लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ भी डगमगाने लगता है।

यही कारण है कि यह मामला किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का प्रश्न बन चुका है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर देश को यहां तक पहुंचाया किसने? जिस चुनाव आयोग को कभी उसकी स्वायत्तता और सख्ती के लिए जाना जाता था, आज उसी पर सत्ताधारी दल के प्रति झुकाव के आरोप लग रहे हैं।

विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कथित आचार संहिता उल्लंघन पर चुप्पी और विपक्षी नेताओं पर त्वरित कार्रवाई, संस्थागत निष्पक्षता पर गहरी चोट है। अगर चुनाव आयोग सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाता हुआ दिखाई देता है, तो यह केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संकट है। चुनाव लोकतंत्र का उत्सव होते हैं, लेकिन जब रेफरी पर ही पक्षपात के आरोप लगने लगें, तो मैच की वैधता ही कटघरे में खड़ी हो जाती है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि संसद, न्यायपालिका और स्वयं चुनाव आयोग इन आरोपों का सामना कैसे करते हैं।

क्योंकि सवाल केवल एक अधिकारी के पद पर बने रहने का नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के उस भरोसे का है, जो हर चुनाव में ईवीएम का बटन दबाते समय लोकतंत्र पर जताते हैं। गौरतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान तरीके और समान आधारों पर ही पद से हटाया जा सकता है.

न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के अनुसार, संसद के किसी भी सदन में महाभियोग नोटिस दिए जाने पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जा सकता है. यदि नोटिस लोकसभा में दिया जाता है, तो उस पर कम से कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं, और यदि राज्यसभा में दिया जाता है, तो उस पर कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं. इसके बाद अध्यक्ष या सभापति यह निर्णय ले सकते हैं कि प्रस्ताव को स्वीकार किया जाए या अस्वीकार किया जाए.

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