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Home»एलान विशेष

28% गरीबों वाला देश ‘दुनिया का चौथा सबसे समान देश’? — मोदी सरकार की बौद्धिक ठगी और ज़मीनी सच्चाई का भंडाफोड़”

adminBy adminJuly 11, 2025 एलान विशेष No Comments4 Mins Read
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image credit: ourworld.unu.edu
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एक देश जहां हर दिन मुसलमानों की दुकानों पर ताले लगते हैं, उनका बहिष्कार होता है, उनकी लिंचिंग होती है, दलितों को जिंदा जलाया जाता है, पिछड़े तबकों को ‘कौशलहीन’ कहकर अपमानित किया जाता है — वो देश मोदी सरकार की नज़र में दुनिया का चौथा सबसे समान देश है? अगर यह मज़ाक न होता, तो यह त्रासदी होती। लेकिन असल में ये दोनों है — एक भीषण मज़ाक और एक राष्ट्रीय त्रासदी।

28% गरीब, लेकिन ‘बराबरी’ में टॉप पर?:- केंद्र सरकार की 5 जुलाई की प्रेस विज्ञप्ति में भारत को ‘दुनिया का चौथा सबसे समानता वाला देश’ बताया गया — यह दावा न केवल तथ्यात्मक रूप से झूठ है, बल्कि बौद्धिक बेईमानी का नमूना है। कांग्रेस ने rightly इस बयान को “धोखाधड़ी”, और “जमीनी हकीकत से पूरी तरह कटा हुआ प्रचार” बताया। जयराम रमेश ने बिल्कुल सही कहा — आप क्रोनोलॉजी समझिए: अप्रैल 2025 में विश्व बैंक की रिपोर्ट आई, जिसमें भारत की 28.1% गरीब आबादी और वेतन में 13 गुना का फर्क उजागर किया गया। फिर जुलाई 2025 में सरकार ने उसी रिपोर्ट की आधी-अधूरी बातें लेकर उसे उपलब्धि की तरह पेश कर दिया। यानी आंकड़े वही, व्याख्या मनमर्ज़ी की!

सरकार की चाल: तुलना में धोखाधड़ी:- मोदी सरकार ने भारत की उपभोग आधारित असमानता को उठाया और उसे दुनिया के आय आधारित असमानता मापदंड से तुलना में पेश कर दिया। यानी सेब की तुलना आम से की गई। जबकि सच्चाई ये है कि उपभोग आधारित आंकड़े हमेशा असली असमानता को कम करके दिखाते हैं, क्योंकि अमीर लोग अपनी बड़ी आय को खर्च नहीं करते, बल्कि बचाते हैं। इसका मतलब है कि देश की असली आय असमानता कहीं ज़्यादा भयानक है।

असल सच्चाई: न न्याय है, न बराबरी:- भारत में आज किस तरह की ‘समानता’है? मुसलमानों को कभी पोस्टर लगाकर गांव से निकाला जाता है (पुणे), कभी मॉब लिंचिंग की जाती है, कभी आतंकवादी बताकर एनकाउंटर में मार दिया जाता है। दलितों को पानी भरने, मूंछ रखने, मंदिर में जाने, शादी बारात निकालने तक में मारा जा रहा है। ओबीसी और आदिवासियों को आरक्षण खत्म कर ‘योग्यता’ की आड़ में पीछे धकेला जा रहा है।

ये कैसी समानता है?:- क्या सरकार ने इन अत्याचारों का गिनी इंडेक्स निकाला है? झूठ के आंकड़ों से नहीं छुपती असमानता की बदबू, सरकार जिस रिपोर्ट को गले में तावीज़ बनाकर लटकाए घूम रही है, उसी विश्व बैंक की रिपोर्ट साफ़ कहती है: भारत में टॉप 10% लोग निचले 10% से 13 गुना ज़्यादा कमाते हैं। 2022 में भारत की गरीबी दर 28.1% थी — यानी लगभग हर तीन में से एक भारतीय गरीब है। सरकार ने पुराने सर्वे (2017-18) को दबा दिया, क्योंकि उसमें ग्रामीण भारत में खपत की गिरावट दिखाई गई थी। यानी आंख मूंद लो, तो गरीबी गायब समझो!

‘सबका साथ, पर अमीरों का विकास’?:- मोदी सरकार की नीतियां अब एकदम साफ़ हो चुकी हैं: गरीबों को राशन की लाइन में रखो। अमीरों को बैंक के लोन और कॉरपोरेट टैक्स कटौती दो। मुसलमानों और दलितों को ‘गद्दार’ और ‘अयोग्य’ बताकर हाशिए पर रखो। और ऊपर से दुनिया को दिखाओ — देखो! हम समानता में चौथे हैं! ‘समानता’ की आड़ में घिनौनी असमानता का खेल:- अगर यही समानता है, तो फिर: गौतम अडानी और अंबानी की दौलत हर साल 100% क्यों बढ़ रही है? भारत के Top 1% लोग देश की कुल संपत्ति का 40% से अधिक हिस्से पर क्यों काबिज़ हैं? 2024 के Oxfam रिपोर्ट के अनुसार 75% लोग तो बैंक में 10,000 रुपये भी नहीं रखते! क्या वो ‘बराबर’ हैं?

भारत को दुनिया से नहीं, खुद से तुलना करनी चाहिए:- भारत को स्लोवाकिया और बेलारूस से तुलना करने की ज़रूरत नहीं। भारत को खुद से पूछना चाहिए: क्या आज एक गरीब मुस्लिम लड़का IIT तक पहुंच सकता है? क्या एक दलित लड़की मेडिकल कॉलेज जा सकती है, बिना अपमान और भेदभाव के? क्या ओबीसी किसान का बेटा उद्योगपति बन सकता है, बिना कोई ‘गोत्र प्रमाणपत्र’ दिखाए? अगर नहीं — तो भारत ‘समानता’ में चौथे नहीं, बल्कि ढोंग में पहले नंबर पर है। ये देश प्रचार से नहीं, सच्चाई से चलेगा, कांग्रेस का ये विरोध, सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक है। क्योंकि अगर 28% गरीबी और 13 गुना वेतन का अंतर है, तो ये समानता नहीं — कब्रिस्तान की चुप्पी है। मोदी सरकार ने ‘न्यू इंडिया’ के नाम पर एक ऐसा देश बना दिया है, जहां समानता के नाम पर झूठ, न्याय के नाम पर साज़िश और आंकड़ों के नाम पर ठगी परोसी जाती है। अब फैसला जनता को करना है — आप आंकड़ों के नशे में रहना चाहते हैं या असल ज़िंदगी की हकीकत को पहचानना?

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