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Home»विदेश

विदेश नीति में भारत के यू-टर्न पर दुनिया हैरान

adminBy adminSeptember 4, 2025 विदेश No Comments4 Mins Read
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“India SCO Summit 2025: India condemns US-Israel attacks, signs Tianjin declaration with Russia China Iran”
2.5 महीने में बदला भारत का रुख – अब इज़रायल-अमेरिका पर कड़ा वार!”
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भारत की विदेश नीति में ढाई महीने के भीतर आया ये तेज़ यू-टर्न अब पूरी दुनिया का ध्यान खींच रहा है। जून 2025 में जब शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) ने ईरान पर इज़रायली हमलों की निंदा की थी, तब भारत ने उस बयान से खुद को अलग कर लिया था। लेकिन 1 सितंबर को तियानजिन में हुए एससीओ शिखर सम्मेलन में भारत ने वही काम किया, जिसकी उम्मीद कोई नहीं कर रहा था—भारत ने इज़रायल और अमेरिका दोनों की सैन्य कार्रवाई की कड़ी निंदा वाले घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।

भारत का दो टूक संदेश: अमेरिका-इज़रायल की दादागिरी नहीं चलेगी:- तियानजिन घोषणा पत्र में साफ लिखा गया: सदस्य देश इज़रायल और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा किए गए सैन्य हमलों की कड़ी निंदा करते हैं। ये बयान न सिर्फ़ ईरान की संप्रभुता पर हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का घोर उल्लंघन बताता है, बल्कि ये भी चेतावनी देता है कि नागरिकों की मौत और परमाणु प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है। यानी भारत ने पहली बार खुलकर वॉशिंगटन और तेल अवीव को ‘आग से खेलने’ का अपराधी करार दिया है।

जून 2025: जब भारत चुप रहा:- याद दिला दें—13 जून को इज़रायल ने ईरान पर बड़े हमले किए थे। 78 लोग मारे गए। ईरान के शीर्ष परमाणु वार्ताकार अली शमखानी भी मारे गए। नातांज़ परमाणु प्रतिष्ठान बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ। उस समय एससीओ ने बयान जारी कर हमलों की निंदा की थी, लेकिन भारत ने चौंकाने वाला कदम उठाते हुए उस बयान से खुद को अलग कर लिया। विदेश मंत्रालय ने केवल “गहरी चिंता” जताई और कूटनीति-बातचीत की रट लगाई।

सितंबर 2025: भारत का पलटवार क्यों?:- भारत ने इस नाटकीय बदलाव पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया है। लेकिन संकेत साफ हैं: ग़ाज़ा नरसंहार – अगस्त 2025 में संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक तौर पर ग़ाज़ा में अकाल घोषित किया। 63,000 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें अधिकांश नागरिक हैं।

वैश्विक दबाव – इज़रायल और अमेरिका की कार्रवाई पर रूस, चीन, ईरान, तुर्की समेत कई देश खुलकर हमलावर हैं। भारत अलग-थलग पड़ने का जोखिम नहीं उठा सकता।

ईरान-भारत रिश्ते – चाबहार पोर्ट और ऊर्जा साझेदारी भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। ईरान की नाराज़गी भारत को महँगी पड़ सकती थी।

तियानजिन घोषणापत्र में भारत की हामी – बड़े मायने। फिलिस्तीन-इज़रायल संघर्ष पर गहरी चिंता जताई गई। ग़ाज़ा की मानवीय तबाही की निंदा की गई। “तुरंत, पूर्ण और स्थायी युद्धविराम” की मांग उठाई गई। मानवीय राहत के लिए निर्बाध पहुंच की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया। यानी भारत अब इज़रायल-अमेरिका की खुली आलोचना कर रहा है और ग़ाज़ा में हो रही तबाही को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ खड़ा है।

लेकिन भारत ने यहाँ भी खींची लकीर। जहाँ राजनीतिक और सुरक्षा मामलों में भारत ने एससीओ का साथ दिया, वहीं आर्थिक मोर्चे पर उसने दूरी बनाए रखी।

चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) से भारत पहले ही दूर है। 2030 तक की आर्थिक विकास रणनीति और अन्य सहयोगात्मक योजनाओं को भारत ने “इच्छुक देशों” तक सीमित करने का विकल्प चुना। यानी संदेश साफ है—भारत सुरक्षा मामलों में रूस-चीन-ईरान के साथ है, लेकिन आर्थिक मामलों में चीन की अगुवाई वाली परियोजनाओं से अब भी दूरी बनाए रखेगा।

भारत की विदेश नीति का बड़ा संकेत:- भारत का यह रुख अब मोदी सरकार की विदेश नीति पर भी सवाल उठाता है। क्या जून में चुप रहना अमेरिका-इज़रायल को खुश करने के लिए था? और क्या अब ग़ाज़ा संकट और ईरान की नाराज़गी ने भारत को मजबूर किया कि वो पलटी मारे? क्या यह बदलती हुई वैश्विक ध्रुवीय राजनीति का हिस्सा है, जहाँ भारत पश्चिम के साथ-साथ पूर्वी धुरी (रूस-चीन-ईरान) में भी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है?

ढाई महीने पहले तक भारत का रवैया “नपे-तुले शब्दों में चिंता” जताने तक सीमित था। लेकिन ग़ाज़ा के नरसंहार, ईरान की रणनीतिक अहमियत और वैश्विक माहौल को देखते हुए भारत ने अब एकदम अलग रास्ता चुना है।

तियानजिन घोषणा पत्र पर भारत के हस्ताक्षर एक बड़ा भू-राजनीतिक संकेत हैं—भारत अब इज़रायल-अमेरिका की एकतरफ़ा दादागिरी का हिस्सा नहीं बनेगा। और अगर हालात ऐसे ही रहे, तो आने वाले महीनों में भारत का रुख और भी कड़ा हो सकता है।

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