पहले चाकू बनाया, अब चिल्ला रहे हैं कि इसका इस्तेमाल खतरनाक हो रहा है — क्या यही कांग्रेस की सियासी नैतिकता है? भारत का लोकतंत्र आज जिस काले अंधेरे में घिरा है, उसमें एक बड़ा योगदान उन कानूनों का है, जो पहले कांग्रेस की सत्ता-लालसा ने बनाए, और अब भाजपा की फासीवादी सोच ने उन्हें अस्त्र-शस्त्र बना लिया है। यूएपीए (UAPA) – Unlawful Activities (Prevention) Act – इसका ताज़ा उदाहरण है। कांग्रेस की सियासी नौटंकी: अब जागे जब खुद पर बीती!:- कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने यूएपीए के तहत छात्रों, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी और “2.55% ही सज़ा” की दर को लेकर मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला। लेकिन ज़रा रुकिए! क्या कांग्रेस यह भूल गई है कि –1967 में इस कानून को इंदिरा गांधी की सरकार ने संसद में पेश किया था? 2004 में मनमोहन सरकार ने इसमें पोटा जैसी कड़ी धाराएं जोड़ दीं? 2008 में 26/11 के बाद, ज़मानत तक लगभग नामुमकिन बना देने वाला धारा 43D(5) भी यूपीए सरकार ने जोड़ा था? यानी कांग्रेस ने पेट्रोल छिड़का, और अब शिकायत कर रही है कि मोदी आग लगा रहा है।
भाजपा का खेल:- कानून नहीं, लाठी है ये, असहमति की आवाज़ तोड़ने की। भाजपा ने तो इस कानून को ‘राजनीतिक आतंक’ का लाइसेंस बना दिया है। उमर खालिद, बिना ट्रायल के जेल में। देवांगना, नताशा, आसिफ़, महीनों जेल में — बाद में अदालत ने कहा: “विरोध प्रदर्शन आतंकवाद नहीं है।” स्टेन स्वामी, जिन्हें पानी पीने के लिए सिपर तक देने से इनकार कर दिया गया — न्यायिक हिरासत में मौत। मोहम्मद जुबैर, दिशा रवि, न्यूज़क्लिक पर छापा — सब यूएपीए का इस्तेमाल। 2014 से 2022 के बीच 8,719 यूएपीए मामलों में सिर्फ 2.55% सज़ा! यानी 97% निर्दोष लोग सालों तक जेल की यातना भुगतते हैं — सिर्फ इसलिए कि उन्होंने सरकार से सवाल किया।
विरोधियों को कुचलने की प्रयोगशाला बन चुका है UAPA:- आज का भारत यूएपीए की गिरफ्त से डरने वाला लोकतंत्र बन गया है। पत्रकार कलम उठाते हैं — UAPA, छात्र सवाल पूछते हैं — UAPA, अल्पसंख्यक अधिकार मांगते हैं — UAPA, आदिवासी ज़मीन बचाते हैं — UAPA, यह वही सरकार है जिसने संसद में कहा था: “UAPA का इस्तेमाल आतंकियों के ख़िलाफ़ होगा।” लेकिन सच्चाई ये है कि इसका सबसे ज़्यादा इस्तेमाल छात्रों, कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार संगठनों पर हो रहा है — आतंकी नहीं, असहमति वाले निशाने पर हैं।
कांग्रेस: जिसकी नींव में ही गड़बड़ी थी:- पवन खेड़ा और कांग्रेस आज यूएपीए को “क्रूर” और “संविधान विरोधी” बता रहे हैं — लेकिन यही पार्टी 2019 में भाजपा के संशोधनों को राज्यसभा में समर्थन देती है, ताकि उसकी छवि “आतंकवाद के खिलाफ़ मज़बूत पार्टी” बनी रहे। तो क्या कांग्रेस को नागरिक अधिकारों की कीमत पर “इमेज बिल्डिंग” ज़्यादा प्यारी है? क्या अब जब भाजपा उसी कानून से कांग्रेस के समर्थकों और आलोचकों को जेल में डाल रही है, तब कांग्रेस को लोकतंत्र की याद आ रही है?
सत्ता में हों तो क़ानून ‘ज़रूरी’, विपक्ष में आएं तो ‘दमनकारी’?:- 2008: UAPA में संशोधन के समय, खुद कांग्रेस ने कहा था: “यह आतंकवाद के खिलाफ़ हमारी प्रतिबद्धता का संकेत है।” लेकिन अब जब उमर खालिद जेल में हैं, स्टेन स्वामी मर गए, और हर हफ्ते नए पत्रकारों पर केस दर्ज हो रहे हैं, तब कांग्रेस कहती है: “ये दमन है, तानाशाही है, संविधान पर हमला है।” दोगलेपन की इससे बेहतर मिसाल क्या हो सकती है? सवाल सिर्फ भाजपा से नहीं, कांग्रेस से भी है, अगर कांग्रेस वाकई यूएपीए से चिंतित है, तो: क्या वह इस कानून को वापस लेने का संकल्प लेगी अगर सत्ता में आए? क्या वह यह मानेगी कि उसकी नीतियों ने भाजपा को दमन का हथियार सौंपा? क्या वह पीड़ितों — जैसे उमर खालिद, अमानतुल्ला, जुबैर, स्टेन स्वामी — से माफी मांगेगी? क्योंकि भारत में लोकतंत्र तब ही ज़िंदा रहेगा जब कोई भी सरकार कानूनों को हथियार नहीं, उत्तरदायित्व माने। अब वक्त है सवाल पूछने का — क्या आप सिर्फ़ भाजपा की तानाशाही से लड़ेंगे, या उस कांग्रेस की भी आलोचना करेंगे जिसने इन तानाशाही कानूनों की नींव रखी?