धर्मनिरपेक्ष” और “समाजवादी” यही दो शब्द आज उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की नजर में नासूर बन चुके हैं। 28 जून को The Tribune को दिए गए इंटरव्यू में उपराष्ट्रपति ने कहा कि ये शब्द आपातकाल के दौरान संविधान में जोड़े गए और “ये हमारे अस्तित्व पर संकट हैं, सभ्यता का अपमान हैं और सनातन की आत्मा का अपवित्रीकरण।”ध्यान देने वाली बात यह है कि धनखड़ का यह बयान ठीक उन्हीं दिनों आया जब आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने भी “धर्मनिरपेक्ष” और “समाजवादी” शब्दों की प्रस्तावना से समीक्षा की मांग उठाई। दोनों टिप्पणियां महज़ संयोग नहीं लगतीं बल्कि एक सुनियोजित वैचारिक आक्रमण प्रतीत होती हैं, जो भारत के संवैधानिक मूल्यों की नींव को ही हिला देना चाहती है।
धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद से डर क्यों?:- भारत का संविधान इन दोनों शब्दों के साथ 1976 में आपातकाल के दौरान संशोधित हुआ ये सच है। लेकिन इसका उद्देश्य भारत की बुनियादी भावना को स्पष्ट करना था। धर्मनिरपेक्षता (Secularism) का मतलब यह नहीं कि राज्य धर्म-विरोधी हो, बल्कि यह कि राज्य किसी एक धर्म का पक्ष न ले। समाजवाद (Socialism) का आशय है संसाधनों और अवसरों का न्यायसंगत वितरण — एक ऐसी व्यवस्था जिसमें सबसे वंचित व्यक्ति को भी गरिमा से जीने का अधिकार मिले। परंतु, संघ और उसके वैचारिक प्रतिनिधि इस बात से चिढ़ते हैं क्योंकि धर्मनिरपेक्षता उन्हें उनके हिन्दू राष्ट्र एजेंडे की राह में बाधा लगती है और समाजवाद उनके पूंजीवादी मित्रों अडानी-अंबानी की मुनाफाखोरी की राह में रोड़ा बनता है। यह कोई पहला मौका नहीं है जब उपराष्ट्रपति ने पद की गरिमा को ताक पर रखकर विवादास्पद बयान दिया हो:
2023 में, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को खुलेआम चेतावनी दी थी कि “ज्यूडिशियरी को संविधान की लक्ष्मण रेखा लांघने की इजाज़त नहीं दी जा सकती”, जब कोर्ट ने संसद द्वारा पारित कानूनों पर सवाल उठाए। उन्होंने कई बार विश्वविद्यालयों में जाकर सरकार की आलोचना करने वाले छात्रों को “राष्ट्रविरोधी” करार देने वाले बयान दिए। संसद में भी वे कई बार विपक्ष को “अनुशासनहीन”और “अवरोधक”ठहराते रहे हैं। ये सभी बयान भाजपा के राजनीतिक नैरेटिव से मेल खाते हैं, जो न्यायपालिका, शिक्षा व्यवस्था और मीडिया पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना चाहता है।
उपराष्ट्रपति या भावी राष्ट्रपति?:- अब बड़ा सवाल उठता है क्या उपराष्ट्रपति धनखड़ इन बयानों के जरिए अपनी राजनीतिक निष्ठा प्रमाणित कर रहे हैं? क्या वे 2027 में राष्ट्रपति बनने की दावेदारी मजबूत कर रहे हैं? पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से राष्ट्रपति और राज्यपालों के पद का राजनीतिकरण हुआ है, उसमें यह आशंका निराधार नहीं। धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे शब्दों को टार्गेट कर वे सीधे संघ और भाजपा की जड़ से जुड़े मुद्दों को साध रहे हैं शायद इसी के बदले में “ऊंचे पद” की उम्मीद की जा रही हो।
संविधान के खिलाफ यह खुला युद्ध है:- कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस पर तीखा जवाब दिया: होसाबले और धनखड़ जैसे लोग नहीं चाहते कि गरीब, दलित, पिछड़े लोग ऊपर आएं। उन्हें संविधान में लिखी समानता और स्वतंत्रता की भावना से दिक्कत है।”अगर संविधान के किसी शब्द को छूने की कोशिश की गई, तो कांग्रेस अंतिम सांस तक उसका विरोध करेगी।”खरगे ने बिल्कुल सही कहा ये सिर्फ शब्द नहीं हैं, ये भारत की आत्मा हैं। धर्मनिरपेक्षता ही वह ढाल है जिसने इस देश को हिंदू-मुस्लिम दंगों, जातिवाद और धार्मिक उन्माद से बचाकर रखा। और समाजवाद वह पुल है जो दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को सत्ता और संसाधनों की ओर ले जाता है।
अंत में: उपराष्ट्रपति से एक सवाल:- श्रीमान धनखड़, क्या आप वास्तव में यह कहना चाहते हैं कि भारत के सबसे कमजोर, वंचित, उपेक्षित तबकों के हक़ के शब्द ‘नासूर’ हैं? क्या आप ‘सनातन’धर्म के नाम पर एक ब्राह्मणवादी, पूंजीवादी राष्ट्र की परिकल्पना को थोपना चाहते हैं, जहाँ संविधान सिर्फ एक दिखावा बन जाए?
अगर ऐसा नहीं है, तो कृपया साफ़ करें कि एक संवैधानिक पद पर बैठकर आप संविधान के मूल शब्दों के खिलाफ ज़हर क्यों उगल रहे हैं? भारत के संविधान से अगर “धर्मनिरपेक्ष” और “समाजवादी” शब्द निकाल दिए गए तो क्या बचेगा? सिर्फ सत्ता, सिर्फ बहुसंख्यकवाद, सिर्फ अडानी-अंबानी का राज और चुप रह जाने वाली जनता। और ये सिर्फ कांग्रेस की नहीं हर भारतीय की आखिरी सांस तक की लड़ाई होगी।