बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से ठीक पहले एक ऐसा प्रशासनिक फैसला सामने आया है जिसने न सिर्फ राज्य की राजनीति को गरमा दिया है, बल्कि भारत के लोकतंत्र पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने बिहार में “स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR)” यानी विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की है। इसमें सबसे विवादास्पद बात ये है कि 2003 के बाद मतदाता सूची में शामिल हर व्यक्ति से नागरिकता प्रमाण मांगा जा रहा है — एक ऐसा कदम जो एनआरसी की स्मृति ताज़ा करता है। विपक्षी दलों ने इसे साफ़ तौर पर ‘गुप्त एनआरसी’ कहा है, जबकि चुनाव आयोग इसे “मतदाता सूची की सफ़ाई” बता रहा है। सवाल यह है कि यह फैसला अचानक क्यों लिया गया? क्या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक साज़िश है?
1. चुनाव से ठीक पहले ही क्यों? क्या यह संयोग है या साज़िश? बिहार में चुनाव नवंबर 2025 से पहले प्रस्तावित हैं। ऐसे में चुनाव से महज़ चार महीने पहले यह निर्णय लेने का कोई तार्किक कारण समझ नहीं आता। विशेषज्ञ मानते हैं कि: यदि मतदाता सूची की सफाई ही मकसद होता, तो यह प्रक्रिया कम से कम 6-8 महीने पहले शुरू होनी चाहिए थी। चुनाव आयोग खुद कह चुका है कि वह यह प्रक्रिया पूरे देश में लागू करेगा, लेकिन बिहार से शुरुआत करना और वह भी चुनाव से ऐन पहले, संदेह पैदा करता है। क्या भाजपा को बिहार में हार का डर है, और इसलिए अब मतदाता सूची को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की जा रही है?
2. नागरिकता साबित करने की अनिवार्यता: संविधान की अवहेलना? भारत में अब तक मतदाता बनने के लिए सिर्फ आयु (18+) और निवास स्थान का प्रमाण देना होता था। नागरिकता केवल घोषणापत्र (declaration) से तय मानी जाती थी। लेकिन अब, 2003 के बाद शामिल मतदाताओं को दस्तावेज़ों से नागरिकता साबित करनी होगी। यह वही भाषा है, जो एनआरसी और CAA विवाद में इस्तेमाल की गई थी। विशेषकर बिहार जैसे राज्य में, जहां: लाखों लोग बाहर काम करते हैं (प्रवासी), ग्रामीण इलाकों में कागज़ों का रिकॉर्ड बहुत कमजोर है, गरीब, दलित, मुसलमान और पिछड़े तबके दस्तावेज़ों के अभाव से पीड़ित हैं, उनसे माता-पिता तक के जन्म प्रमाण पत्र मांगना वोटिंग अधिकार छीनने के बराबर है।
3. कौन होगा प्रभावित? इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा भार पड़ेगा: ग़रीबों, जिनके पास कागज़ नहीं हैं; सीमांचल, चंपारण और मिथिलांचल जैसे इलाकों पर, जहां बाढ़ और विस्थापन के कारण लोगों के पास स्थायी दस्तावेज़ नहीं हैं; मुस्लिमों, जिन पर नागरिकता को लेकर पहले से ही संदेह का माहौल बना दिया गया है; प्रवासी मजदूरों, जो फॉर्म भरने के लिए समय पर लौट भी नहीं सकते। इसका एक संभावित नतीजा यह हो सकता है कि भाजपा विरोधी वोटर ही सबसे अधिक बाहर कर दिए जाएं।
4. क्या यह मतदाता पहचान से ज़्यादा, पहचान की राजनीति है? यह कोई संयोग नहीं कि भाजपा के नेतृत्व वाले राज्यों या क्षेत्रों में ही पहले एनआरसी या जनगणना से जुड़ी ऐसी प्रक्रियाएं सामने आईं: असम में एनआरसी ने 19 लाख लोगों को नागरिकता से बाहर कर दिया था, जिनमें अधिकतर हिंदू-बांग्लादेशी और मुस्लिम थे। अब बिहार, जो भाजपा के लिए महत्वपूर्ण चुनावी राज्य है, वहां भी यह प्रयोग शुरू हो गया है।
➡️ क्या भाजपा एक “छुपी हुई जनसंख्या सफाई” (Silent Voter Cleansing) रणनीति पर काम कर रही है?
5. क्यों डरें मतदाता? चुनाव आयोग का नया फॉर्म बताता है कि: अगर आपने फॉर्म नहीं भरा, तो आपका नाम सीधे हटाया जा सकता है। अगर आपके पास दस्तावेज़ नहीं हैं, तो कोई स्पष्ट विकल्प नहीं है। यह वही डरावना वातावरण है जो नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और NRC के समय देश भर में दिखा था — जहां “कागज़ नहीं दिखाएंगे” आंदोलन बना था। यह केवल मतदाता सूची नहीं, नागरिकता का पुनर्लेखन है।
6. क्या है भाजपा की मंशा? भाजपा की संभावित रणनीति कुछ इस प्रकार हो सकती है:
1. Voter Engineering: विपक्षी वोट बैंक को कमजोर करना — खासकर मुस्लिम, दलित और प्रवासी वर्ग के वोट काट कर।
2. NRC का dry run: एक राज्य में NRC जैसी प्रक्रिया चलाकर पूरे देश में लागू करने की तैयारी करना।
3. डर और असुरक्षा का माहौल: नागरिकों को दस्तावेज़ों के जाल में उलझाकर विरोध और जागरूकता से दूर रखना।
4. राजनीतिक मोड़: यदि इस प्रक्रिया से कोई संवैधानिक संकट या विरोध खड़ा होता है, तो भाजपा इसे “कानून और व्यवस्था” या “राष्ट्रहित” का मामला बताकर राजनीतिक फायदा उठा सकती है।
7. लोकतंत्र का मतदाता संकट:- बिहार में मतदाता सूची को लेकर जो हो रहा है, वह सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, एक लोकतांत्रिक संकट है। अगर करोड़ों लोग सिर्फ इसलिए अपने वोटिंग अधिकार से वंचित हो जाएं क्योंकि उनके पास दस्तावेज़ नहीं हैं — तो यह भारत के सामाजिक न्याय और संविधान दोनों के साथ धोखा है। क्या चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में है ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनावों का संचालन निष्पक्ष व स्वतंत्र ढंग से कराने की ज़िम्मेदारी दी गई है। इसके तहत आयोग मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन जैसी प्रक्रियाएं करता है।
लेकिन “विशेष गहन पुनरीक्षण” जैसी प्रक्रिया अगर चुनाव के ठीक पहले, खास इलाकों में, लक्षित समूहों को प्रभावित करते हुए करवाई जाए — तो यह सवाल उठता है कि कहीं यह राजनीतिक दबाव में की गई कार्रवाई तो नहीं? क़ानूनी जानकार मानते हैं कि: हां, पुनरीक्षण का अधिकार आयोग के पास है, लेकिन यह अधिकार मनमाने, पक्षपातपूर्ण और अल्पसंख्यक-विरोधी तरीके से नहीं इस्तेमाल किया जा सकता।
राजनीतिक दलों को चाहिए कि इस प्रक्रिया का विरोध केवल चुनावी दृष्टिकोण से नहीं, नागरिक अधिकारों के संरक्षण की दृष्टि से करें। और नागरिकों को चाहिए कि वे सवाल पूछें — ये प्रक्रिया किसके लिए है? और किसके ख़िलाफ़? इसे अदालत में चुनौती भी दी जा सकती है। अगर कोई प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), या अनुच्छेद 326 (सार्वभौमिक मताधिकार) का उल्लंघन करती है, तो इसे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
मानवाधिकार संगठनों, वकीलों या राजनीतिक दलों द्वारा यह याचिका डाली जा सकती है कि: गरीब, दलित, मुसलमान, और प्रवासी मजदूरों को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है, उन्हें दस्तावेज़ों के नाम पर सूची से हटाया जा रहा है, और ये पूरी प्रक्रिया एक समुदाय विशेष को मतदान से बाहर रखने का हथकंडा है। जन संगठनों को न्यायालय का रुख करना चाहिए, क्योंकि यह मामला संविधानिक अधिकारों और लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। सिविल सोसाइटी को निगरानी रखनी होगी कि कौन से इलाके टारगेट किए जा रहे हैं। प्रेस और मीडिया को इसका निष्पक्ष और निरंतर विश्लेषण करना चाहिए। और सबसे ज़रूरी – जनता को जागरूक होना होगा कि उनके मताधिकार को कैसे छीनने की कोशिश की जा रही है।
विपक्ष की प्रतिक्रियाएं: “जनगणना नहीं, सफ़ाई अभियान चल रहा है” आरजेडी सांसद प्रोफेसर मनोज झा ने इस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा: “37% लोगों को जन्म प्रमाण पत्र दिखाना होगा – वे सभी गरीब, दलित, पिछड़े और मुसलमान हैं। ये लोग रोज़ी-रोटी के लिए बाहर पलायन करते हैं, साल में 3-4 बार घर आते हैं। आप इन्हें प्रक्रिया से बाहर करना चाहते हैं क्योंकि सत्ताधारी पार्टी के आंतरिक सर्वे उन्हें डरा रहे हैं।” उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सीधा सवाल उठाया: “माफ़ी के साथ कहता हूं, आप दिन-ब-दिन अपनी विश्वसनीयता खो रहे हैं।”
टीएमसी नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने दावा किया कि बंगाल में बीजेपी के आंतरिक सर्वे में उसे केवल 46-49 सीटें मिलने की संभावना है, इसीलिए इस तरह के अचानक कदम उठाए जा रहे हैं – यह हताशा का संकेत है। अंत में सवाल उठता है: क्या यह मतदाता सूची की सफाई है, या लोकतंत्र की हत्या की तैयारी?