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धर्मांतरण कानून: सुप्रीम कोर्ट में इस समय एक बेहद संवेदनशील सवाल गूंज रहा है—“धर्मांतरण धोखाधड़ी है या नहीं, यह फैसला कौन करेगा?” यह प्रश्न केवल कानूनी बहस नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और धार्मिक स्वतंत्रता के भविष्य को तय करने वाला है।
अदालत का सीधा सवाल:- मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने साफ कहा कि अदालत का काम कानून बनाना नहीं, बल्कि उसकी संवैधानिकता की जांच करना है। लेकिन उन्होंने यह भी पूछा कि धर्मांतरण धोखाधड़ी है या नहीं, यह तय करने का अधिकार किसके पास है? क्या राज्य तय करेगा? पुलिस? या भीड़? यह प्रश्न इसलिए भी अहम है क्योंकि देश के कई राज्यों में लागू धर्मांतरण विरोधी कानूनों ने स्थिति को बेहद खतरनाक बना दिया है।
कानून का असली चेहरा:- वरिष्ठ वकील सी.यू. सिंह ने अदालत में जो तस्वीर रखी, वह चौंकाने वाली है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, हिमाचल, झारखंड, हरियाणा, कर्नाटक और अब राजस्थान तक—लगभग हर भाजपा शासित राज्य ने ‘धर्म स्वतंत्रता कानून’ के नाम पर असल में ‘धर्मांतरण विरोधी कानून’ बना दिए।
इन कानूनों में 20 साल तक की सज़ा या आजीवन कारावास तक का प्रावधान है।
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ज़मानत की शर्तें इतनी कठोर हैं कि वे यूएपीए जैसे आतंकवाद विरोधी कानूनों की याद दिलाती हैं। सबसे खतरनाक प्रावधान यह है कि अब कोई भी तीसरा पक्ष—यानी पड़ोसी, समाज का ठेकेदार, या फिर कोई भी अजनबी—अंतर-धार्मिक विवाह करने वाले जोड़े पर आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता है।
भेदभाव की सच्चाई: निशाना सिर्फ़ अल्पसंख्यक:- यह कानून कागज़ पर भले ही सभी धर्मों के लिए समान दिखें, लेकिन असलियत में इनका इस्तेमाल सिर्फ़ अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ हो रहा है। अगर कोई मुस्लिम या ईसाई युवक हिंदू लड़की से विवाह करता है, तो तुरंत एफआईआर, जेल और ‘लव जिहाद’ का शोर।
लेकिन अगर कोई हिंदू युवक अल्पसंख्यक लड़की से विवाह करे या उसका धर्मांतरण हो, तो चुप्पी। न मामला, न गिरफ्तारी, न हंगामा। यानी यह कानून बराबरी का नहीं, बल्कि एकतरफ़ा दमन का औज़ार बन चुका है।
संविधान बनाम राजनीति:- अनुच्छेद 25 हर भारतीय को अपनी पसंद का धर्म मानने और प्रचार करने की आज़ादी देता है। लेकिन ये कानून इस आज़ादी को कुचल रहे हैं। किसी व्यक्ति की आस्था अब उसकी निजी पसंद नहीं, बल्कि पुलिस स्टेशन और अदालत के दस्तावेज़ का विषय बना दी गई है। अंतरात्मा की स्वतंत्रता—जो लोकतंत्र की आत्मा है—उसे राजनीतिक फायदे के लिए बंधक बना दिया गया है।
असली खतरा: भीड़ को लाइसेंस:- इन कानूनों ने समाज में यह संदेश दे दिया है कि “अगर तुम्हें किसी जोड़े का धर्म या शादी पसंद नहीं, तो पुलिस और अदालत तुम्हारे साथ हैं।” यह सीधे-सीधे भीड़तंत्र को लाइसेंस देने जैसा है। अदालतें अब देख रही हैं कि कैसे यह कानून लोकतंत्र की नींव को हिला रहा है।
जवाबदेही कौन लेगा?:- धर्मांतरण पर रोक लगाने के नाम पर बनाए गए ये कानून वास्तव में प्यार, विवाह और धार्मिक स्वतंत्रता पर रोक लगाने के हथियार हैं।
यह कानून संविधान के खिलाफ हैं। यह कानून समाज में ज़हर घोल रहे हैं।
और सबसे अहम—यह कानून सिर्फ़ अल्पसंख्यकों को दबाने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं। अगर सुप्रीम कोर्ट ने अब ठोस फैसला नहीं लिया, तो आने वाले वक्त में हर अंतर-धार्मिक शादी अपराध मानी जाएगी और हर अल्पसंख्यक युवक-युवती अदालत और जेल के बीच फंसा रहेगा। सवाल साफ़ है—जब कानून ही भेदभाव का औज़ार बन जाए, तो इंसाफ़ कहां से मिलेगा?
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