क्या हिंदुत्व अब अमेरिका में भी मुसलमानों को सत्ता से रोकना चाहता है?
“ग्लोबल इंटिफ़ादा”? नहीं, ये ग्लोबल हेट इंपोर्ट है! 24 जून, 2025 को जब भारतीय-अमेरिकी डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट ज़ोहरान ममदानी ने न्यूयॉर्क सिटी के मेयर पद की प्राइमरी में धमाकेदार जीत दर्ज की — तो यह सिर्फ़ एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि यह उस ज़हर के खिलाफ जनादेश था जो कुछ दक्षिणपंथी भारतीय और हिंदू-अमेरिकी संगठन अमेरिका में भी फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। ज़ोहरान की राजनीति न्याय, बराबरी और मज़दूरों के हक़ पर टिकी है। लेकिन उन्हें निशाना बनाया गया — सिर्फ़ इसलिए कि वे मुसलमान हैं, मोदी के खिलाफ हैं, और “इंतिफ़ादा” को आज़ादी की आवाज़ मानते हैं। क्या अमेरिका जैसे लोकतंत्र में भी अब कोई मुसलमान सत्ता की ओर बढ़े तो उसे “चरमपंथी”, “आतंकी समर्थक” और “भारत विरोधी” कहकर बदनाम किया जाएगा?
विरोध किसने किया और क्यों किया?:-“इंडियन अमेरिकन्स फॉर कुओमो” और कुछ हिंदू-अमेरिकी समूहों ने ज़ोहरान के खिलाफ अभियान चलाया। उन्होंने आसमान में बैनर उड़ाए जिन पर लिखा था: Save NYC from Global Intifada. Reject Mamdani.” जरा सोचिए — अमेरिका में जन्मे और पल-बढ़े ज़ोहरान को एक विदेशी चरमपंथी की तरह पेश किया गया। ये वही मानसिकता है जिसने भारत में ‘मुसलमानों को सत्ता से दूर रखने’ का एजेंडा फैलाया। यही मानसिकता अब अमेरिका में पैकेज बदलकर लेकिन ज़हर वही रखकर फैल रही है।
हिंदुत्व का ज़हर अमेरिका कैसे पहुंचा?:- भारत में तो हम यह सुनते आए हैं: “मुसलमान वोट बैंक हैं” “मुस्लिम इलाके में मंदिर नहीं बनेगा” “हिंदू बहुल मोहल्ले में मुसलमान दुकान नहीं खोलेगा” अब यह नफरत एयर इंडिया की उड़ानों में पैक होकर अमेरिका पहुंच गई है। वहीं पर अब कहा जा रहा है: “मुसलमान म्योर न बन पाए” “इंतिफ़ादा का समर्थन मतलब आतंकवाद” “मोदी की आलोचना मतलब भारत विरोध” ज़ोहरान के विरोध में जिन हिंदू संगठनों ने ज़हर फैलाया, उनकी जड़ें RSS, विश्व हिंदू परिषद, OFBJP और हिंदू अमेरिकी फाउंडेशन जैसे संगठनों में हैं — जिनका एकमात्र लक्ष्य है: हिंदुत्व का वैश्विक विस्तार और मुसलमानों को सत्ता से दूर रखना।
ज़ोहरान ने क्या किया जो चुभ गया?:-उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी को हम war criminal की तरह देखें। उन्होंने फिलिस्तीनियों के हक़ में आवाज़ उठाई। उन्होंने मज़दूरों, यहूदियों, अश्वेतों और प्रवासियों के साथ गठजोड़ बनाया। यानी उन्होंने वो किया जो एक सच्चा प्रगतिशील नेता करता है। पर भारत के दक्षिणपंथियों को यही नहीं पच रहा — कि कोई मुसलमान, वो भी भारतीय मूल का, मोदी के विरोध से न केवल बचा रहे बल्कि चुनाव जीत भी रहा है।
विरोध करने वाले हिंदू अमेरिकियों से सवाल:-अगर कोई हिंदू अमेरिकी नेता नेतन्याहू की आलोचना करे, तो क्या आप उसे ‘यहूदी विरोधी’ कहेंगे? अगर कोई अमेरिकी नेता भारत की गरीबी, मॉब लिंचिंग, या मुस्लिम विरोधी नीतियों पर सवाल उठाए तो क्या वह ‘भारत विरोधी’ हो गया? क्या अमेरिका में चुनाव अब दिल्ली की तर्ज पर ‘धर्म’ से तय होंगे? यह जीत किसकी है? यह जीत ज़ोहरान की नहीं — यह जीत साझा संघर्ष की है। यह जीत उन प्रवासी मुस्लिमों, यहूदियों, मज़दूरों, और वंचित समुदायों की है, जिन्होंने मिलकर अमेरिका के हिंदुत्ववादी संस्करण को करारी शिकस्त दी। यह जीत उस सच की है जो कहता है: “तुम अपने नरेंद्र मोदी को पूज सकते हो, लेकिन अमेरिका को ‘हिंदू राष्ट्र’ नहीं बना सकते।” और ज़िम्मेदार कौन है इस मानसिकता का? भारत में बैठे वे नेता जो “हर मुसलमान गद्दार” का प्रचार करते हैं वे चैनल जो “जिहादी मंसूबे”, “लव जिहाद”, और “गौ-रक्षक” जैसे शब्दों से दिमाग़ भरते हैं। वे NRI संगठन जो भारत में नफरत फैलाकर अमेरिका में “हिंदू हित” के नाम पर राजनीति करते हैं। RSS, BJP और उसके समर्थक NRI नेटवर्क — ये सभी इस नफरत के निर्यातक हैं। और अब अमेरिका में लोकतंत्र की हवा ने इन्हें पहली बार मुंहतोड़ जवाब दिया है। ज़ोहरान ममदानी की जीत एक राजनीतिक घटना नहीं, एक सांस्कृतिक विद्रोह है — नफरत के खिलाफ, धर्म आधारित राजनीति के खिलाफ, और उस विचारधारा के खिलाफ जो पूरे विश्व में ‘हिंदू राष्ट्र’ की कल्पना थोपना चाहती है। अब बारी ज़ोहरान जैसे और नेताओं की है — और हमारी भी — कि हम इस वैश्विक हिंदुत्व के फैलते ज़हर को पहचानें, चुनौती दें, और हर जगह संविधान, बराबरी और इंसाफ़ के पक्ष में खड़े हों।