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Home»एलान विशेष

जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र के बहाने NRC? गरीबों और मुसलमानों को फँसाने का नया खेल!

adminBy adminAugust 14, 2025 एलान विशेष No Comments6 Mins Read
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"महाराष्ट्र में जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र के नए सख्त नियम और NRC विवाद"
"गरीब, मुसलमान, आदिवासी और खानाबदोश सबसे ज्यादा प्रभावित — क्या यही है NRC 2.0?"
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नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू होने के साथ ही देश में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRIC/NRC) की चर्चा फिर तेज हो गई है। असम में NRC लागू करने के दौरान लाखों लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए पुराने दस्तावेज़ देने पड़े थे, और जिनके पास कागज़ नहीं थे, वे लिस्ट से बाहर हो गए।

माना जा रहा था कि 2019 के चुनाव में बीजेपी को अकेले बहुमत न मिलने से NRC जैसी प्रक्रिया पूरे देश में जल्दी नहीं आएगी। लेकिन बिहार और महाराष्ट्र में जो हो रहा है, वह संकेत देता है कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे अलग-अलग तरीकों से लागू की जा रही है।

बिहार में क्या हुआ?:- बिहार में SIR प्रक्रिया के नाम पर NRC जैसी कड़ी जांच हुई। जिन लोगों के पास जरूरी दस्तावेज़ नहीं थे, उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए — करीब 65 लाख वोटर लिस्ट से बाहर कर दिए गए।

महाराष्ट्र में नया खेल:- 2023 में केंद्र सरकार ने कानून बदलकर तय किया कि अगर जन्म या मृत्यु का रजिस्ट्रेशन एक साल के भीतर न हो, तो अब यह आदेश तहसीलदार (कार्यकारी मजिस्ट्रेट) ही देंगे। पहले यह काम छोटे कोर्ट में होता था।

इस बदलाव के बाद, खासकर मुसलमान समुदाय में, यह डर फैल गया कि कहीं यह NRC का हिस्सा न हो। लोग अपने और अपने बुज़ुर्गों के जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने के लिए तहसील कार्यालयों में टूट पड़े।

घबराहट और दलालों का खेल:- शिक्षा और जानकारी की कमी की वजह से कई लोग सोशल मीडिया पर खुलकर अपील करने लगे कि “जल्दी से सर्टिफिकेट बनवा लो”।

इसका फायदा दलालों ने उठाया। उन्होंने ज्यादा पैसे लेकर प्रमाणपत्र बनवाए।

कई मामलों में पुराने रिकॉर्ड न मिलने पर नकली कागज़ बनवाए गए। इसमें सरकारी कर्मचारी भी दलालों के साथ मिले हुए थे।

किरीट सोमैया की एंट्री:- बीजेपी के तोतले नेता किरीट सोमैया ने इसे “बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों” से जोड़कर प्रचारित किया और सरकार पर दबाव डाला।

नतीजा — जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पर पाबंदी लगा दी गई।

मार्च 2024 में पाबंदी हटाई गई, लेकिन नए नियम इतने सख्त रखे गए कि कोई आम आदमी, खासकर गरीब और अनपढ़, मुसलमान ही नहीं, बल्कि हिन्दू भी मुश्किल से ही प्रमाणपत्र बनवा पाएगा। इसमें ऐसी बेहूदा और बेतुके कागज़ात मांगे गए हैं जिनका पूरा करना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है।

नए नियमों की मुख्य बातें (सरल भाषा में):- एक साल बाद जन्म/मृत्यु का रजिस्ट्रेशन कराने के लिए तहसीलदार की अनुमति ज़रूरी है। अस्पताल रिकॉर्ड, स्कूल का रिकॉर्ड, संपत्ति के कागज़, बिजली/पानी का बिल, आधार-पैन, राशन कार्ड जैसे कई दस्तावेज़ एक साथ देने होंगे। पूरे मामले की जांच पुलिस, ग्रामसेवक/तलाठी और अन्य विभाग करेंगे। गांव/इलाके में सार्वजनिक नोटिस लगाया जाएगा, ताकि कोई आपत्ति कर सके। दस्तावेज़ में थोड़ी भी गड़बड़ी या कमी मिली तो आवेदन खारिज कर पुलिस केस दर्ज होगा। केवल “स्थायी निवासी” को ही प्रमाणपत्र मिलेगा, यानी आपको यह साबित करना होगा कि आप और आपका परिवार लंबे समय से वहीं रहते हैं।

असर:- गरीब, मज़दूर, किराएदार, खानाबदोश और दस्तावेज़ न रखने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। बूढ़े लोगों या जिनका जन्म अस्पताल में नहीं हुआ, उनके लिए कागज़ जुटाना बेहद कठिन होगा। यह प्रक्रिया NRC जैसी ही है, फर्क सिर्फ इतना है कि इसे “जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र के नियम” के नाम पर लागू किया गया है।

नतीजा:- यह सिर्फ जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रेशन का मामला नहीं है। यह नागरिकता साबित करने की एक अप्रत्यक्ष (Indirect) प्रक्रिया बन चुकी है। जो लोग इन शर्तों को पूरा नहीं कर पाएंगे, भविष्य में वे सरकारी रिकॉर्ड में “नागरिक” के रूप में दर्ज ही नहीं होंगे।

नए नियमों के मुताबिक जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए आवेदन के साथ जोड़े जाने वाले दस्तावेज़ इस प्रकार हैं।

जन्म के मामले में आवश्यक प्रमाण:-

1 ) अगर जन्म घर पर हुआ है तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता या संबंधित अधिकारी का बयान/शपथपत्र।

टीकाकरण से संबंधित कागज़ात:- अस्पताल का रिकॉर्ड या अस्पताल का प्रमाणपत्र।

2 ) शैक्षणिक प्रमाण:- स्कूल प्रवेश रजिस्टर की कॉपी / बोनाफाइड प्रमाणपत्र / स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र (यदि हो)

3 ) परिवार से संबंधित प्रमाण:- माता-पिता या रिश्तेदार का निवास प्रमाणपत्र/

जन्म प्रमाणपत्र/ स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र/ शादी का प्रमाणपत्र/ राशन कार्ड /अन्य सरकारी अभिलेख।

4 ) निवास का प्रमाण:- संपत्ति कर (हाउस टैक्स) की रसीद/ बिजली बिल।

5 ) संपत्ति का प्रमाण:- जमीन का 7/12 उतारा (राजस्व रिकॉर्ड) बिक्री पत्र (सेल डीड)

6 ) पहचान का प्रमाण:- आधार कार्ड, पैन कार्ड, या अन्य सरकारी पहचान पत्र। ये तो थे जन्म प्रमाण पत्र के लिए लगने वाले कागज़ात लेकिन कमाल तो ये है कि मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए भी इससे कम कागज़ात नहीं हैं।

मृत्यु के मामले में आवश्यक प्रमाण:-

1 ) पोस्टमार्टम रिपोर्ट/ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) अस्पताल का रिकॉर्ड या अस्पताल का प्रमाणपत्र।

2 ) शैक्षणिक प्रमाण:- स्कूल प्रवेश रजिस्टर की कॉपी / बोनाफाइड प्रमाणपत्र / स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र (यदि हो)

3 ) परिवार से संबंधित प्रमाण:- माता-पिता या रिश्तेदार का निवास प्रमाणपत्र/ जन्म प्रमाणपत्र/ शादी का प्रमाणपत्र/ राशन कार्ड/ अन्य सरकारी अभिलेख।

4 ) निवास का प्रमाण:- संपत्ति कर (हाउस टैक्स) की रसीद/ बिजली बिल।

5 ) संपत्ति का प्रमाण:- जमीन का 7/12 उतारा/ बिक्री पत्र।

6 ) पहचान का प्रमाण:-आधार कार्ड, पैन कार्ड, या अन्य सरकारी पहचान पत्र।

इसमें कुछ कागज़ात ऐसे हैं जिनका लाना या जमा कराना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। जैसे कि आजसे 40 – 50 साल पहले अक्सर बच्चों का जन्म घरों में दाइयों द्वारा होता था उस वक़्त आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कहाँ डलेवरियाँ करती थीं? टीकाकरण से संबंधित कागज़ात। अस्पताल का प्रमाणपत्र।जनता ने मुख्य मंत्री देविंदर फडणवीस और केरिट सोमैया से पूछना चाहिए कि उनका जन्म कहाँ हुआ था ? क्या इनके पास अस्पताल का प्रमाणपत्र या टीकाकरण से संबंधित कागज़ात हैं ? जो कागज़ात इस कानून को बनाने वाले भी नहीं ला सकते, वो कागज़ात आम इंसान फिर उसमें भी आदिवासी, खाना बदोश और अनपढ़ आदमी कहाँ से लाएगा ? इसी तरह जो लोग अनपढ़ हैं वो शैक्षणिक प्रमाण, स्कूल प्रवेश रजिस्टर की कॉपी, बोनाफाइड प्रमाणपत्र, स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र। कहाँ से लाएंगे जबकि उनहोंने स्कूल की सीढ़ी भी नहीं चढ़ी। इसी तरह जो लोग जंगलों, खेतों या खाना बदोशों वाली ज़िन्दी जीते हैं या किराए के घरों में रहते हैं वो संपत्ति कर की रसीद, बिजली बिल, जमीन का 7/12 उतारा, बिक्री पत्र कहाँ से लाएंगे ? तो क्या ऐसे सभी लोगों को चोरी के वोटों से बनी सरकार बांग्ला देशी घोषित कर देगी ? ये बहुत ही गंभीर मसला है लिहाज़ा तुरंत सामाजिक संगठनों, विपक्षी पार्टियों और बुद्धिजीवियों को चाहिए की चोरी के वोटों से बनी सरकार के इस मनमाने और गरीबों, आदिवासियों, खाना बदोशों और विशेषकर मुसलमानों को परेशान करने के लिए बनाए गए इस अंधे कानून को अदालत में चुनौती दें।

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