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Home»विदेश

ग़ज़ा में नरसंहार और मुस्लिम दुनिया की चुप्पी तोड़ी ईरान के नए राष्ट्रपति ने

adminBy adminJuly 22, 2025 विदेश No Comments3 Mins Read
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image credit : Compare news.google.com
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ग़ज़ा में ज़ायोनी शासन का ताज़ा हमला एक बार फिर दुनिया के सामने वह ख़ूनी चेहरा लाकर खड़ा कर चुका है, जिसे पश्चिमी मीडिया “आत्मरक्षा” कहकर छुपाना चाहता है। लेकिन अब इस ख़ामोशी की चादर को ईरान के नए राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने फाड़ दिया है। अज़रबैजान में ईसीओ सम्मेलन के दौरान उन्होंने जो बोला, वह न सिर्फ़ इजरायल के अपराधों की पोल खोलता है, बल्कि मुस्लिम देशों की बेहोशी पर करारा तमाचा भी है।

पेज़ेशकियन ने सीधे कहा: यह अफ़सोस की बात है कि ज़ायोनी शासन ग़ज़ा में बेशर्मी से अपराध करता है और हज़ारों बच्चों और महिलाओं का नरसंहार करता है।यह कोई सामान्य राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि एक ऐसी पुकार थी, जो तुर्की और पाकिस्तान जैसे प्रभावशाली मुस्लिम देशों को एकजुटता की राह पर बुला रही थी। उन्होंने तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ से साफ़ कहा कि अगर मुस्लिम देश अपने विशाल संसाधनों को एकत्र करें, तो इजरायल जैसे अपराधी शासन को नकेल कसी जा सकती है।

ग़ज़ा में क्या हो रहा है?:- पिछले 12 दिनों में इज़रायल के हमलों में सैकड़ों बेगुनाह मारे जा चुके हैं। अस्पतालों, स्कूलों और शिविरों तक को नहीं बख़्शा गया। संयुक्त राष्ट्र की चेतावनियाँ धरी की धरी रह गईं। लेकिन इससे भी ज़्यादा शर्मनाक है — उन मुस्लिम देशों की चुप्पी, जो खुद को उम्मत का रहनुमा कहते हैं।

ईरान पर भी हमला — और फिर भी आवाज़ उठी, ईरान खुद पिछले हफ्तों में इज़रायल के सीधे हमलों का शिकार रहा है। लेकिन फिर भी, पेज़ेशकियन ने हार नहीं मानी। उन्होंने कहा: यह आक्रमण अमेरिका और यूरोप के खुले समर्थन से किया गया था, और यह अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों और नियमों का खुला उल्लंघन था।”यह बात किसी एक देश के ग़म की नहीं है — यह पूरे मुसलमानों के आत्मसम्मान की लड़ाई है। जब ईरान अकेले इज़रायल और उसके पश्चिमी समर्थकों के खिलाफ बोल सकता है, तो अरब देश, तुर्की, पाकिस्तान, मलेशिया क्यों खामोश हैं?

मुस्लिम एकता: ज़रूरत नहीं, मजबूरी है:- आज पूरी मुस्लिम दुनिया को ग़ज़ा के खून से पुकारा जा रहा है — “क्या तुम्हारे पास ज़मीर बचा है?” ईरान का राष्ट्रपति अगर यह कह सकता है कि “हम बातचीत को तैयार हैं, पर जुल्म को बर्दाश्त नहीं करेंगे,” तो बाकी देश किसका इंतज़ार कर रहे हैं? ईरान ने सैन्‍य, कूटनीतिक और नैतिक मोर्चे पर ज़ायोनी शासन के खिलाफ खुलकर बोला है। वहीं सऊदी अरब, यूएई, और मिस्र जैसे देशों ने अपने पेट्रोडॉलर की माला जपते हुए इस्लामी भाईचारे की लाश पर चुप्पी की चादर ओढ़ ली है।

अब सवाल हम सब से है:कब तक हम फिलिस्तीनियों की लाशों पर “रणनीतिक

 चुप्पी” को जायज़ ठहराते रहेंगे? क्या इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) सिर्फ़ बयानों का कब्रिस्तान बनकर रह जाएगा? क्या ग़ज़ा के बच्चों की चीखें मुस्लिम राजधानियों की आलीशान दीवारों तक नहीं पहुँचतीं?

मसूद पेज़ेशकियन ने ज़मीर की आवाज़ उठाई है — अब बारी बाकियों की है। यह वक्त निंदा प्रस्तावों या बयानों का नहीं, सीधी कार्रवाई और सख़्त मोर्चाबंदी का है। अगर मुस्लिम देश अब भी नहीं जागे, तो इतिहास उन्हें सिर्फ़ ग़द्दारों की सूची में दर्ज करेगा।

(लेखक की टिप्पणी: यह लेख मुस्लिम एकता, मानवीय अधिकारों और ग़ज़ा के पीड़ितों के समर्थन में है। अगर इस समय भी हम खामोश रहे, तो फिर इंसानियत का कोई मतलब नहीं बचेगा।) ज़रूरी है कि इसे ज़्यादा से ज़्यादा साझा करें। अब भी समय है, ज़बान खोलिए या फिर हमेशा के लिए शर्मिंदा रहिए।

Gaza Genocide Iran Foreign Policy Muslim Silence on Gaza Muslim Unity Zionist Regime इज़राइल फिलिस्तीन संघर्ष ईरान की विदेश नीति ज़ायोनी शासन मुस्लिम एकता मुस्लिम दुनिया की चुप्पी
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