पहले हम ईरान और इजरायल के बीच चल रहे युद्ध पर ताज़ा अपडेट जानते हैं उसके बाद आपको बताएँगे इस जंग का असल मक़सद क्या है ? तो आइए पहले जानते हैं कि ईरान और इजरायल के बीच चल रहे युद्ध की ताज़ा स्थिति क्या है ? डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि: “ईरान और इजरायल के बीच अब युद्ध रुक गया है, यानी संघर्षविराम (सीज़फायर) लागू हो गया है।” लेकिन क्या ट्रंप के कहते ही ये जंग रुक जाएगी ? क्या यह युद्ध रुक गया ?
ट्रम्प ने जो युद्धविराम की बात कही है, वो एकतरफा बयान है। ईरान और इजरायल दोनों ने अभी तक मिलकर कोई समझौता नहीं किया। इसलिए यह असली शांति नहीं, सिर्फ अस्थायी रोक लग रही है। अगर इजरायल फिर हमला करता है, तो ईरान भी करेगा। ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले करके जो ट्रंप कल तक ये कह रहा था कि हमने ईरान के तीनों परमाणु ठिकानों को नष्ट कर दिया।’ ताली बजाई… और फिर धमकी दी — ‘या तो शांति, या विनाश।’ “ये कोई डिप्लोमेसी नहीं, ये खुली गुंडागर्दी है। ये वही अमेरिका है, जिसने कभी कहा था — ‘हम शांति के लिए लड़ते हैं’। आज वो कह रहा है — ‘जो हमारे साथ नहीं, उसे मिटा दो।'” “इज़रायल का राजदूत ट्रंप को चिट्ठी लिखता है —’ख़ुदा ने तुम्हें भेजा है… ट्रूमैन जैसा काम करने के लिए!’ हां, वही ट्रूमैन जिसने हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु बम गिराए थे।
क्या अब बारी ईरान की है?”वो आज अचानक युद्धविराम की बात क्यों कर रहा है ? क्या अमेरिका के बेस पर ईरानी हमले से डरकर तो ट्रंप ने युद्धविराम की बात नहीं की ? या फिर इस डर से कि अगर यह युद्ध बढ़ा, तो और देश भी इसमें कूद सकते हैं – जैसे: लेबनान, सीरिया, यमन। अमेरिका के दुश्मन देश – रूस, चीन वगैरह। “दुनिया के सभ्य देश कहाँ हैं?G7 मुल्क फोटो खिंचवा रहे हैं, हंसी मज़ाक कर रहे हैं…और इधर ईरान जल रहा है, ग़ज़ा मलबा बन चुका है!”बहरहाल ये जो “युद्धविराम” बताया जा रहा है, वो अभी सिर्फ बयानबाज़ी है, सच्चा समझौता नहीं। हालात कभी भी फिर से बिगड़ सकते हैं। असली शांति तभी आएगी जब दोनों देश हमले बंद करें, और बाकी दुनिया इसमें ईमानदारी से दखल दे। अब बात करेंगे इस जंग के असल मक़सदकी। सोशल मीडिया पर तो यही ज़ाहिर हो रहा है कि ये जंग इस्लाम और यहूदियत के बीच है या फिलिस्तीन के लिए है। लेकिन क्या हक़ीक़त में ये जंग इस्लाम और यहूदियत के बीच है? या फिलिस्तीन के लिए है ? हरगिज़ नहीं। क्योंकि अगर ये जंग फिलिस्तीन के लिए या इस्लाम के लिए होती तो पिछले एक साल से फिलिस्तीन के मासूमों को इजराइल का कहर सहना नहीं पढता। 60 हज़ार से ज़्यादा फिलिस्तीनी मुसलमान शहीद न होते। भारत के मुसलमानों में ग़ज़ा के जनसंहार और ईरान-इज़राइल टकराव को लेकर गहरा ग़म और गुस्सा है। सोशल मीडिया, मस्जिदों, मजलिसों और जलसों में लोग इसे “यहूदी बनाम मुसलमानों की जंग” के तौर पर देख रहे हैं।
लेकिन क्या हकीकत वाकई इतनी सरल है? भारतीय मुसलमानों की भावना फिलिस्तीन के साथ इंसानी हमदर्दी, मज़हबी जुड़ाव, और उम्मा (इस्लामी एकता) के उसूलों से आती है। लेकिन जो युद्ध इस वक़्त चल रहा है, वह केवल मज़हब नहीं, बल्कि राजनीति, भू-रणनीति (Geopolitics), सत्ता संघर्ष और रणनीतिक हितों का खेल है।
भारतीय मुसलमान क्या देख और समझ रहे हैं?:- ग़ज़ा में इज़राइल द्वारा 60,000+ मुसलमानों की हत्या। मस्जिदें, स्कूल, अस्पतालों पर बमबारी। पश्चिमी मीडिया की चुप्पी। अमेरिका का इसराइल को हर स्तर पर समर्थन। इस्लामी देशों की चुप्पी और ईरान का पलटवार। इसलिए भारतीय मुसलमान यह समझ रहे हैं कि ये “मज़हबी जंग” है – यहूदियों ने मुसलमानों पर हमला किया है। ईरान, हिज़्बुल्लाह, हौथी जैसे ग्रुप “मुसलमानों के रक्षक” हैं। फिलिस्तीन की मदद = इस्लाम की हिफाज़त। यह भावना सही है — इंसानियत के उसूल से भी, मज़हबी तकाज़े से भी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति इससे कहीं ज़्यादा जटिल है।
असल में ये जंग क्या है?:- यहूदी बनाम मुसलमान नहीं – बल्कि “राजनीति बनाम न्याय” है। इज़राइल एक राष्ट्र है, जो खुद को यहूदी राज्य कहता है — लेकिन उसकी सारी नीति राजनीतिक-जातीय वर्चस्व पर आधारित है। ईरान एक शिया इस्लामी राष्ट्र है, जिसकी प्राथमिकता फिलिस्तीन से ज़्यादा अपने क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाना है। यानी जंग का आधार मज़हबी नहीं, बल्कि सत्ता, इलाक़ा और दबदबे का खेल है। ईरान चाहता है कि पूरे मध्य-पूर्व में उसका प्रभाव बढ़े (इराक, सीरिया, लेबनान, यमन आदि में) इज़राइल और अमेरिका इसे “ईरानी विस्तारवाद” कहते हैं और उसे रोकना चाहते हैं। ग़ज़ा इस टकराव में सिर्फ एक मोहरा बन चुका है — असली मुद्दा “कौन ताकतवर है?” का है।
पिछले एक साल से इज़राइल ने ग़ज़ा में जो नरसंहार मचाया, उसने दुनिया को हिला दिया — 60 हज़ार से ज़्यादा फिलिस्तीनी मारे गए, जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे और औरतें शामिल थीं। स्कूल, अस्पताल, मस्जिदें और शरणस्थल तक नष्ट कर दिए गए। 70 प्रतिशत ग़ज़ा पर इज़राइल ने क़ब्ज़ा कर लिया है। लेकिन इसके बावजूद मुस्लिम देश चुप रहे। कोई कड़ा कदम नहीं उठा। और ईरान, जिसे फिलिस्तीन का सबसे बड़ा ‘समर्थक’ माना जाता है, वो भी केवल बयानबाज़ी तक सीमित रहा।
जब इज़राइल ने ईरान के सीरिया स्थित दूतावास पर हमला किया और ईरानी कमांडरों को मार डाला, तभी ईरान ने जवाबी मिसाइल हमले किए — लेकिन ग़ज़ा के लिए नहीं, अपने ‘स्वाभिमान’ के लिए। 57 मुस्लिम देश हैं, लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण बिखरे हुए हैं। कोई ईरान के पाले में है, तो कोई सऊदी-अमेरिका गठबंधन में। ओआईसी (Islamic Cooperation Organization) जैसी संस्थाएं केवल शोक व्यक्त करती हैं, कोई ठोस एक्शन नहीं। सऊदी अरब, UAE, मिस्र, क़तर जैसे देश अमेरिका के सुरक्षा तंत्र पर निर्भर हैं। IMF के कर्ज़, डॉलर आधारित व्यापार और हथियारों की खरीद इन देशों को अमेरिका के खिलाफ बोलने नहीं देती।
मज़हबी-राजनीतिक मतभेद:- शिया बनाम सुन्नी विवाद ने मुस्लिम दुनिया को बाँट रखा है। ईरान (शिया) का समर्थन सुन्नी देश नहीं करना चाहते, भले ही मुद्दा फिलिस्तीन का हो। जो नेता मक्का-मदीना के रक्षक कहलाते हैं, वे इसराइल से संबंध सुधार रहे हैं (जैसे सऊदी अब्राहम समझौते की तरफ बढ़ रहा है) ईरान अमेरिका और इसराइल से सीधे युद्ध नहीं चाहता था। परमाणु डील, प्रतिबंधों से राहत की कोशिशें, और आंतरिक आर्थिक समस्याएं इसे रुकने पर मजबूर करती रहीं। ईरान की रणनीति हमेशा ‘प्रॉक्सी वॉर’ रही है — जैसे हिज़्बुल्लाह, हौथी, शिया मिलिशिया इत्यादि के जरिए इसराइल पर दबाव डालना।
लेकिन सीधा हमला करने से बचता रहा, क्योंकि इससे खुले युद्ध का खतरा बढ़ जाता। ईरान फिलिस्तीन के समर्थन की बात तो करता रहा, लेकिन कोई बड़ा सैन्य हस्तक्षेप नहीं किया। हिज़्बुल्लाह और हौथियों को छिटपुट मिसाइलें छोड़ने दी गईं, लेकिन वो इसराइल की सेना को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं थीं। पहली बार ईरान ने सीधे इजराइल पर सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलों से हमला किया। लेकिन ये हमला ग़ज़ा के जनसंहार के जवाब में नहीं, बल्कि अपने अफसरों की हत्या का बदला था। ईरान ग़ज़ा के लिए नहीं, अपनी ‘इज़्ज़त’ के लिए लड़ा है।”
ईरान का बयान है कि“हमने इस्राइली आक्रामकता का जवाब दिया, फिलिस्तीन के लिए हम हमेशा साथ हैं” लेकिन इसमें कोई ठोस सैन्य रणनीति फिलिस्तीन के पक्ष में नहीं थी। ईरान का मक़सद फिलिस्तीन नहीं, खुद की ताकत का प्रदर्शन था। ग़ज़ा पर 1 साल से ज़्यादा बम गिरते रहे, ईरान सिर्फ हौथियों, हिज़्बुल्ला से limited हमले करवाता रहा। जब सीधा हमला खुद पर हुआ, तब जाकर बड़ी कार्रवाई की गई।
मुस्लिम दुनिया की चुप्पी = पाखंड:- जो देश फिलिस्तीन के समर्थन में ‘प्रतीकात्मक’ बयान देते हैं, उन्होंने न तो राजदूत वापस बुलाए, न कोई आर्थिक प्रतिबंध लगाए, न इसराइली जहाज़ों पर रोक लगाई।
ईरान बनाम अमेरिका-इसराइल = दो राष्ट्रों की लड़ाई। इसमें फिलिस्तीन एक कूटनीतिक मोहरा बन गया है। हक़ीक़त में कोई भी मुस्लिम देश फिलिस्तीन के लिए खून बहाने को तैयार नहीं। ग़ज़ा आज इतिहास का सबसे भयानक नरसंहार झेल रहा है, और मुस्लिम दुनिया या तो बंट चुकी है, या बिक चुकी है। ईरान ने जो हमला किया वो ‘ग़ज़ा’ के लिए नहीं था — वो उसके अपने सम्मान और सैन्य संतुलन के लिए था। फिलिस्तीन को लेकर मुस्लिम नेताओं की “सहानुभूति” महज़ एक राजनीतिक नाटक है, जबकि हकीकत यह है कि फिलिस्तीनी अकेले हैं — उनकी लड़ाई मानवता की आखिरी लड़ाई बनती जा रही है। “जब कोई ईरान फिलिस्तीन के लिए नहीं लड़ा, और सऊदी-अमीरात जैसे मुल्क अमेरिका की गोद में बैठे हैं — तब मुसलमानों और फिलिस्तीनियों को यह समझ लेना चाहिए कि ‘उम्मा’ सिर्फ किताबों में है, जमीनी हकीकत में नहीं।