भारत के स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन की त्रासदी को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस ने एनसीईआरटी द्वारा जारी किए गए ‘विभाजन विभीषिका’ मॉड्यूल को खुले तौर पर सांप्रदायिक नफ़रत फैलाने वाला दस्तावेज़ करार दिया है। यह सिर्फ एक शैक्षिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के दिमाग में नफ़रत का बीज बोने का राजनीतिक हथकंडा है। इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने की साज़िश
इस मॉड्यूल में: कांग्रेस और मोहम्मद अली जिन्ना को विभाजन का गुनहगार बताया गया।
अंग्रेजों को “भारत को एकजुट रखने की कोशिश करने वाला” करार दिया गया।
हिंदू महासभा और सावरकर की टू नेशन थ्योरी जैसी हकीकतों को पूरी तरह दबा दिया गया।
1942 का क्रिप्स मिशन और 1946 का कैबिनेट मिशन प्लान तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। यानी, वास्तविक दोषियों को बचाने और सांप्रदायिक ताकतों को क्लीन चिट देने का खेल खेला जा रहा है।
सच्चाई क्या है? विभाजन का असली सूत्रधार अंग्रेज थे, जिन्होंने 1857 की क्रांति के बाद ही “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाई। पृथक निर्वाचन व्यवस्था, धार्मिक संगठनों को बढ़ावा और हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ना इसी रणनीति का हिस्सा था।
1937 में सावरकर ने सबसे पहले टू नेशन थ्योरी दी, लेकिन पाठ्यपुस्तकों में केवल जिन्ना का नाम लिया जाता है।
कांग्रेस और गांधी ने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए बलिदान दिया। गांधी ने आखिरी उपवास मुसलमानों पर हो रहे हमले रोकने के लिए रखा और इसी सांप्रदायिक नफरत ने उनकी हत्या करवाई।
खतरनाक चाल – मुसलमानों को खलनायक बनाना:- इस मॉड्यूल में विभाजन के दौरान सिर्फ हिंदुओं और सिखों पर हुए अत्याचार का जिक्र है। लेकिन मुसलमानों पर हुए अत्याचार, हत्याएं और विस्थापन का ज़िक्र तक नहीं। यानी, बच्चों को आधा-अधूरा सच पढ़ाकर पूरे समुदाय को अपराधी ठहराने की कोशिश। यह सिर्फ इतिहास का विकृतिकरण नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जहरीला बनाने की सोची-समझी साज़िश है।
एनसीईआरटी का यह नया मॉड्यूल कोई साधारण गलती नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और वैचारिक हथियार है। इसके ज़रिए आने वाली पीढ़ियों के दिमाग में यह बैठाने की कोशिश की जा रही है कि विभाजन के असली दोषी मुसलमान और कांग्रेस थे, जबकि अंग्रेज निर्दोष थे। यह इतिहास नहीं, ज़हर है – और ज़रूरी है कि समाज, इतिहासकार और शिक्षाविद इस ज़हर को बच्चों की किताबों तक पहुँचने से रोकें। अब सवाल ये है – क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को नफरत का इतिहास पढ़ने देंगे या सच्चाई और एकता का इतिहास?
ये कोई पहला मामला नहीं है इससे पहले भी बीजेपी ने कक्षा 7 की ‘Our Pasts-II’ पुस्तक से मुगल शासकों (हुमायूँ, शाहजहाँ, अकबर, औरोंगज़ेब) की उपलब्धियों की दो-पृष्ठीय तालिका हटा दी गई है। कक्षा 8 में औरोंगज़ेब का उल्लेख नहीं है, और कक्षा 12 की ‘Kings and Chronicles’ अध्याय ही हटाया गया है।
कई जगहों से मुगल, खालजी, mamluk सल्तनतों का विवरण हटाया गया, और नव अध्यायों से ध्यान भारी-भरकम हिंदू-प्राचीन अवधारणाओं पर लगाया गया।
2. महात्मा गांधी और उनकी हत्या का बदलाव:- कक्षा 12 की Political Science किताब से निम्न पाठ हटाए गए:“गांधी का हिंदू-मुस्लिम एकता की अपील और कट्टरपंथियों की प्रतिक्रिया”। “उनकी हत्या के बाद तत्काल RSS पर प्रतिबंध” जैसी जानकारी।
3. गुजरात दंगों और बाबरी मस्जिद जैसे संवेदनशील विषयों का हटाया जाना “Anti-Muslim riots in Gujarat” शीर्षक को केवल “Gujarat riots” में बदला गया।
Babri Masjid का उल्लेख सीधे “three-domed structure” में बदल दिया गया; रथ यात्रा, क़रसेवकों की भूमिका और राष्ट्रपति शासन जैसे विषय कट गए।
4. अन्य महत्वपूर्ण कटौती और बदलाव:- कांस्तिक विवाद, सामाजिक साहित्य, आर्थिक बदलाव से जुड़े अध्याय (जैसे कृषि-उदारीकरण, दलित/आदिवासी साहित्य) हटाए गए। पाठ्यपुस्तकों में Mughal rulers को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करना, जैसे बाबर को क्रूर, अकबर को असहिष्णु, और औरोंगज़ेब को धार्मिक कट्टर बनाकर दिखाना, जो विद्वानों ने एक-तरफ़ा और साम्प्रदायिक बताया।
5. मैप विवाद – जैसलमेर को मराठा साम्राज्य का हिस्सा दिखाना:- कक्षा 8 की Social Science किताब में जैसलमेर को मराठा साम्राज्य का हिस्सा दिखाने पर इतिहासकारों और राजपरिवार ने विरोध किया। NCERT ने एक विशेषज्ञ पैनल गठित किया है जिससे इस विषय को फिर से जांचा जाए।
अगर बीजेपी सरकार सिर्फ आरएसएस और हिंदुत्व को शर्मिंदा करने वाली सच्चाई को मिटाती तो समझा जा सकता था लेकिन उसे मिटा कर झूठा, मनगढ़त, मुसलमानों को बदनाम करने वाला और नफरत फ़ैलाने वाला इतिहास लिख रही है। उसके बावजूद देश के इतिहासकार, बुद्धिजीवी, विपक्ष और मुस्लिम संगठनाएं खामोश तमाशा देख रही हैं। अब तक किसी ने इसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की न ही किसी ने अदालत में इसे चुनौती दी।