2006 मुंबई लोकल ट्रेन धमाका मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने बेकसूर 12 मुसलमानों को 19 साल बाद रिहा किया तो अगले ही दिन महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी। उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट का फैसला गलत है, और जिन लोगों को छोड़ा गया है, वो असली गुनहगार हैं। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस फैसले पर फिलहाल रोक (stay) लगा दी — लेकिन रिहा लोगों को दोबारा जेल नहीं भेजा। सुप्रीम कोर्ट अब पूरी सुनवाई करेगा, फिर तय करेगा कि हाई कोर्ट का फैसला सही था या नहीं। वहीं 2008 मालेगांव बम धमाका मामले में मुंबई की विशेष NIA अदालत ने सभी 7 हिन्दू आरोपियों को बरी कर दिया याद रहे कि मुस्लिम आरोपियों को हाई कोर्ट ने बरी किया था उसके बावजूद महाराष्ट्र सरकार दूसरे ही दिन सुप्रीम कोर्ट दौड़ी लेकिन हिन्दू आरोपियों को तो NIA कोर्ट ने बरी किय फिर भी अब तक सरकार खामोश है। क्यों ?क्योंकि “29 सितंबर 2008 को मालेगांव में हुए बम धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया था। 6 लोग मारे गए थे,100 से ज़्यादा घायल हुए थे। लेकिन धमाके से ज़्यादा गूंजा था एक सवाल: आतंकी कौन ? पहले हमेशा की तरह मुसलमानों को फंसाने की कोशिश की गई। फिर असली नाम सामने आए —“जांच में सामने आया जिस बाइक में बम था वो साध्वी प्रज्ञा की थी।कर्नल पुरोहित, असीमानंद, और ‘अभिनव भारत’ नाम का एक हिंदू संगठन जांच के घेरे में आया। तब पहली बार देश ने सुना — ‘भगवा आतंक’। लेकिन फिर…2014 में सत्ता बदली — भाजपा आई।और उसी दिन से बदलने लगी जांच की दिशा, मिटने लगे सबूत, और बचाए जाने लगे आरोपी। एनआईए ने अदालत में कहा — साध्वी प्रज्ञा पर कोई पुख्ता सबूत नहीं।वो साध्वी, जो ATS की जांच में आरोपी थी। वो मोटरसाइकिल, जो बम बनी — अब ‘सबूत नहीं रहे’। और फिर… उसे बनाया गया सांसद। क्या अब यही है ‘न्यू इंडिया’? निसार अहमद… जिसने बेटे को खोया…350 किलोमीटर दूर कोर्ट के चक्कर लगाए, इंसाफ़ की भीख मांगी…पर आरोपी पेश तक नहीं हुए — और एजेंसियों ने चुप्पी साध ली। 1,087 सुनवाईयां हुईं , 5 जज बदले…गवाह डराए गए, सबूत ‘गायब’ हो गए…और अंत में, अदालत बोली — ‘सबूत नहीं हैं’। पर कोई ये नहीं पूछता — ‘सबूत गए कहां? इधर अमित शाह ने कहा — ‘कोई हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता। उधर अदालत कहती है कि ‘सबूत नहीं हैं, जांच एजेंसी, जो सच सामने लाने के लिए होती है —वो सत्ता की ढाल बन गई। सच को मिटाया गया…और इंसाफ़ को मार दिया गया।”मालेगांव केस में कोई दोषी नहीं — पर क्या कोई निर्दोष था? जब धर्म के आधार पर आतंक की परिभाषा तय होने लगे —तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र में सिर्फ़ संसद नहीं, अदालत भी गिरवी रखी जा चुकी है। ये केस खत्म नहीं हुआ है —ये सवाल बन चुका है: क्या इंसाफ़ अब वोट से तय होगा? या भगवा ओढ़ लेने से कोई पाक़ हो जाएगा? मालेगांव — एक धमाका नहीं, एक लोकतंत्र का पोस्टमॉर्टम है। एक मामले में तुरंत सुप्रीम कोर्ट में अपील। दूसरे में ख़ामोशी। क्या यह “कानून का राज” है या “धर्म का भेदभाव”? यह सिर्फ ‘भूल’ नहीं, यह ‘रणनीति’ है। जब आरोपी मुस्लिम हो तो जांच तेज़, फांसी की सिफारिश, मीडिया ट्रायल। लेकिन जब आरोपी हिंदू हो तो सबूत ढीले, जांच ढीली, सरकार चुप। मालेगांव बम धमाका मामले में जिसे बचाया जा रहा है ये वही साध्वी प्रज्ञा है जिसने गोडसे को देशभक्त कहा था। आज वो सांसद है Z+ सुरक्षा में घूमती है।और वो मुस्लिम युवक जो बेकसूर साबित हुए? 19 साल जेल में सड़े, अब छूटे तो न नौकरी, न परिवार, न इज्ज़त। ये इंसाफ नहीं, राजनीतिक खेल है। क्या ये सब यूं ही हो रहा है? क्यों UAPA सिर्फ मुसलमानों पर लागू होता है? क्यों? क्योंकि सत्ता ने मजहब के आधार पर ‘गद्दार’ और ‘देशभक्त’ तय कर लिए हैं। और यही असली आतंक है — राज्य प्रायोजित पक्षपात। जब तक इस देश में एक नाम ‘अब्दुल’ होने से फांसी मिलती रहेगी, और ‘प्रज्ञा’ होने से छूट, तब तक ये इस लोकतंत्र पर सबसे बड़ा धब्बा है। हिन्दू हो या मुस्लिम गुन्हेगार को सज़ा मिलनी ही चाहिए। अगर आप इन विचारों से सहमत हैं तो कमेंट बॉक्स में बताएं। जय हिन्द !
Trending
- विदेश में ‘एकता’ का संदेश, देश में नफ़रत की राजनीति पर खामोशी
- आरएसएस पर अमेरिका में बवाल: आखिर नफ़रत और जातिवाद की राजनीति से देश कब आज़ाद होगा?
- वक्फ बोर्ड में बढ़ती धांधलियां… वक्फ की असली मंशा पर निजी हित भारी
- 10 हज़ार ‘गो मित्र’ और चुनावी राजनीति- रोजगार का मॉडल या आस्था के सहारे नई सियासत?
- मोहन भागवत का विदेश दौरा और आरएसएस पर अंतरराष्ट्रीय सवाल
- तीन आदिवासी बच्चियों की मौत और ‘विकास’ का दावा: जब बिस्तर तक न मिले तो कैसा विकास?
- विदेशी चंदे के नाम पर नियंत्रण या नागरिक संस्थाओं पर नई शिकंजाकशी?
- क्या पैगंबर मुहम्मद (स.) केवल मुसलमानों के हैं?