पूर्व जज और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर का बयान एक बार फिर भारतीय न्यायपालिका को कटघरे में खड़ा करता है। उन्होंने कहा – “सुप्रीम कोर्ट में कभी मंदिर निर्माण की मांग ही नहीं की गई थी, फिर अदालत ने आदेश कैसे दिया?”
यह टिप्पणी केवल एक फैसले पर सवाल नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक ढांचे पर अविश्वास की गूंज है।
पूर्व हाईकोर्ट जज और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने देश की सबसे बड़ी अदालत के ऐतिहासिक फैसले की बुनियाद पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। उन्होंने साफ कहा – “सुप्रीम कोर्ट में कभी मंदिर निर्माण की मांग रखी ही नहीं गई थी, फिर अदालत ने आर्टिकल 142 के तहत मंदिर निर्माण का आदेश कैसे दे दिया?”
न्यायपालिका की “अक्षम्य भूल”?:- मुरलीधर ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में न्यायपालिका के रवैये को संस्थागत चूक बताते हुए बेहद कड़ी टिप्पणी की।
22 साल तक मामला ठंडे बस्ते में रहा। जब उठा तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “मरे हुए घोड़े को क्यों पीटना?” लेकिन यही सुप्रीम कोर्ट मान चुका था कि बाबरी विध्वंस एक गंभीर अपराध है। तो सवाल यह उठता है – क्या अदालत ने जानबूझकर इस मामले को नजरअंदाज किया?
मंदिर बनाम मस्जिद: किसने मांगा था मंदिर निर्माण?:- मुरलीधर का दावा चौंकाने वाला है: न हिंदू संगठन। न केंद्र सरकार। न ही याचिकाकर्ताओं ने। किसी ने भी सुप्रीम कोर्ट से “मंदिर निर्माण” की मांग नहीं की थी। फिर किस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश जारी किया? क्या यह न्यायिक सक्रियता थी या राजनीतिक दबाव?
17 नए मुकदमे और टूटता “पूजा स्थल अधिनियम”:- बाबरी विध्वंस का जख्म भरने से इंकार कर रहा है। पूजा स्थल अधिनियम 1991 के बावजूद देशभर में 17 नए मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। यानी विवाद खत्म होने के बजाय और फैल रहा है।
क्या अदालत का फैसला समाधान नहीं, बल्कि नए विवादों की चिंगारी साबित हुआ?
मीडिया पर भी करारा हमला:- मुरलीधर ने मीडिया को आईना दिखाते हुए कहा –
“इलेक्ट्रॉनिक मीडिया केवल हिंदू-मुस्लिम पर अटका रहता है, जबकि भारत की असली ताकत उसकी विविधता है।” लेकिन सवाल यह है – क्या मीडिया सत्ता के दबाव में “मंदिर-मस्जिद” एजेंडा ही चला रहा है?
जज और धर्म: खतरनाक खेल:- सबसे सनसनीखेज़ टिप्पणी पूर्व जज ने की –उन्होंने कहा कि अयोध्या फैसले के लेखक जज ने खुद स्वीकार किया था कि उन्होंने “निर्णय देने से पहले परमात्मा से परामर्श लिया था।” क्या भारत की न्यायपालिका अब कानून की किताब से नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था से फैसले लिख रही है?
भारत किस मोड़ पर खड़ा है?:- हिजाब विवाद से लेकर अयोध्या तक, अदालतें लगातार धार्मिक प्रथाओं की ‘मौलिकता’ में दखल दे रही हैं। मुरलीधर का साफ कहना है – “धर्मशास्त्र में जजों की दखल खतरनाक है, इसमें गलतियां तय हैं।”
आज भारत एक ऐसे दौर में है, जहां न्यायपालिका को आत्ममंथन करना होगा –
क्या वह संविधान की रखवाली कर रही है, या बहुसंख्यक राजनीति की छाया में काम कर रही है?
अयोध्या फैसला आज भी विवादों से घिरा है।
अगर मंदिर निर्माण की मांग ही नहीं की गई थी, तो सुप्रीम कोर्ट ने किस आधार पर आदेश दिया? क्या न्यायपालिका ने संविधान की आत्मा के बजाय आस्था को प्राथमिकता दी? और क्या इसने देश को शांति दी, या नए संघर्षों का दरवाज़ा खोला?
पूर्व जज मुरलीधर की बातें केवल आलोचना नहीं, बल्कि न्यायपालिका और लोकतंत्र की रीढ़ पर सीधा प्रहार हैं।
अब असली सवाल यह है – क्या भारत की अदालतें भविष्य में धर्म और राजनीति से ऊपर उठकर, सिर्फ संविधान के मुताबिक फैसला कर पाएंगी?
लेकिन दोस्तों… एक और सवाल उठता है। ये मुद्दा अभी क्यों उठा? मुरलीधर ने इतने सालों में यह बात पहले क्यों नहीं कही? क्या वजह है कि जब वोट चोरी का मामला पूरे देश में गूंज रहा है, तभी अचानक यह बहस गरमा दी गई? सोचिए – अगर आज इस मुद्दे को बार-बार उठाया जाए तो क्या होगा? क्या राम मंदिर टूट जाएगा? क्या बाबरी मस्जिद दोबारा उसी जगह बन जाएगी? नहीं न! तो फिर सवाल है – आखिर इसे अब क्यों उठाया जा रहा है? क्या कहीं यह शोर असली मुद्दे — वोट चोरी — को दबाने की कोशिश तो नहीं? दोस्तों, फैसला आपका है…ये सवाल महज़ अयोध्या का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की साख का है।