लेखक: सैयद आसिफ नदवी–
जब किसी कौम के जिस्म से एकता की रूह निकल जाए, जब उसके रहनुमा केवल भौगोलिक सीमाओं में सिमट जाएँ, जब कौमें “वतन” के नारों के पीछे “उम्मत” के विचार को भूल जाएँ, तो न तो बैतुल मक़दिस की पवित्रता बचती है, और न ही किसी मुसलमान के खून की कोई कीमत रह जाती है।
आज का इस्लामी जगत इसी पतन और गफलत की तस्वीर पेश कर रहा है, जहाँ क्षेत्रीयता, जातीयता और स्वार्थपरता ने एकता, भाईचारा और इस्लामी गरिमा का गला घोंट दिया है।
डोनाल्ड ट्रंप—एक ऐसा वैश्विक नेता जिसके हाथ मुस्लिम देशों की तबाही, इज़राइल का समर्थन और उम्मत की तौहीन से रंगे हुए हैं—जब अपने पहले विदेशी दौरे पर आता है, तो खाड़ी देश उसके स्वागत में ज़मीन-आसमान एक कर देते हैं।
क़तर द्वारा उसे उपहार में दिया गया वह बेशकीमती विमान, जिसकी कीमत करोड़ों में है, दरअसल एक घायल उम्मत के सीने में घोंपा गया खंजर है।
क्या यह वही क़तर नहीं है जो खुद को इस्लाम का झंडाबरदार बताता है? क्या यह वही नेतृत्व नहीं है जो फ़िलिस्तीन के समर्थन के दावे करता है?
तो फिर यह दोहरा रवैया क्यों? यह दिखावटीपन क्यों?
यह कोई एक देश की बात नहीं है। आज अधिकतर मुस्लिम शासक इस कदर स्वार्थ और क्षेत्रीयता में डूब चुके हैं कि उन्हें न उम्मत का दर्द महसूस होता है, न ही मज़लूमों की चीखें सुनाई देती हैं।
एक देश फ़िलिस्तीन के समर्थन में बयान देता है, दूसरा इज़राइल से गुप्त समझौते करता है।
कोई मुस्लिम देश पर हमले में मदद करता है, तो दूसरा अपनी ज़मीन दुश्मनों के लिए अड्डा बना देता है।
“एक उम्मत” के तौर पर सोचने की ताक़त अब नहीं बची। उम्मत-ए-मुस्लिमा, जो एक जिस्म की तरह होनी चाहिए थी, आज जातियों, राष्ट्रों, नस्लों और राज्यों में बिखर चुकी है।
इस्लाम का पैग़ाम क़ौमियत, वतनपरस्ती और भौगोलिक सीमाओं से ऊपर है।
क़ुरआन बार-बार हमें याद दिलाता है:
“वअन्ना हाज़िहि उम्मतुकुम उम्मतन वाहिदतन व अना रब्बुकुम फअबुदून”
(यह तुम्हारी उम्मत एक ही उम्मत है, और मैं तुम्हारा रब हूँ, तो मेरी इबादत करो)।
मगर हमने इस अल्लाही पैग़ाम को भुला दिया। हमने राष्ट्रीय झंडों, राजनयिक हितों और क्षेत्रीय राजनीति को दीन की तालीमात पर तरजीह दी।
आज हम अपने ही मुस्लिम भाइयों को आतंकवादी, बागी, शरणार्थी और बोझ समझते हैं।
चाहे रोहिंग्या के पीड़ित हों, सीरियाई शरणार्थी, कश्मीरी नौजवान या फ़िलिस्तीनी अनाथ—सभी को अपनाने की बजाय हम उन्हें ठुकरा देते हैं।
इस त्रासदी की जड़ मुस्लिम नेतृत्व के अंदर वह मानसिक दिवालियापन है जो उन्हें पश्चिम की चापलूसी करने पर मजबूर करता है।
उन्हें अपने अवाम की गरीबी, शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य की बदहाली और न्याय के अभाव की कोई फिक्र नहीं।
उनकी प्राथमिकताओं में न तो क़िब्ला-ए-अव्वल की आज़ादी है, न उम्मत की इज्जत और अस्तित्व।
वे या तो पश्चिम के गुलाम हैं, या अपने ही तख़्त व ताज के बंदी।
दूसरी तरफ़ इस्लामी दुनिया की आम जनता भी गफलत की चादर में लिपटी हुई है।
हमने अपनी दुआओं से फ़िलिस्तीन को निकाल दिया, अपने बच्चों को उम्मत का दर्द सिखाना छोड़ दिया, और अपनी मजलिसों, तक़रीरों और खुतबों को दुनिया की बातों में उलझा दिया।
हम सिर्फ़ सोशल मीडिया पोस्ट, बयान और चंद घंटों के जोश में रह गए।
अब समय है कि हम इस मरी हुई उम्मत की नसों में नई रूह फूंकेँ।
हमें क्षेत्रीयता, वतनपरस्ती और नस्लीय घमंड की ज़ंजीरों को तोड़कर एक उम्मत बनना होगा।
इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) जैसे संस्थानों को सिर्फ औपचारिक बैठकों के बजाए ठोस कार्य करना होगा।
हमें साझा नीति, साझा सुरक्षा, साझा मीडिया और साझा कूटनीति को सपना नहीं, हकीकत बनाना होगा।
अगर हमने अब भी यह अवसर खो दिया, तो इतिहास हमें केवल एक तमाशबीन कौम के तौर पर याद रखेगा।
वो तमाशबीन जो अपनी मस्जिदों, बाज़ारों, त्योहारों और दौलत में मस्त रहा, जब उसका भाई ख़ून में नहाया जा रहा था।
आइए!
हम भाषा, रंग, नस्ल, क़ौम और वतन की जंजीरों को तोड़ कर
“إنما المؤمنون إخوة” (निःसंदेह मुसलमान आपस में भाई-भाई हैं)
की पुकार पर लब्बैक कहें।
हमें अपने बच्चों को उम्मत का شعور देना होगा, अपनी दुआओं को वसीع करना होगा, अपने संसाधनों को संगठित करना होगा, और अपने शासकों को आईना दिखाना होगा।
वरना कल हमारी यही खामोशी हमारी सबसे बड़ी सज़ा बन जाएगी।