उत्तर प्रदेश में बलात्कार के आरोपी हिंदू युवा वाहिनी के नेता सुशील प्रजापति का जेल से ज़मानत पर बाहर आने के बाद जिस तरह फूल-मालाओं, नारों और जुलूस के साथ स्वागत किया गया, वह केवल एक शर्मनाक दृश्य नहीं था; वह हमारे समाज और राजनीति की भयावह दिशा का आईना भी था। किसी व्यक्ति पर बलात्कार जैसे गंभीर आरोप हों, मामला अदालत में लंबित हो, पीड़िता न्याय के लिए संघर्ष कर रही हो और उसी दौरान आरोपी को “विजेता” की तरह पेश किया जाए, तो यह केवल संवेदनहीनता नहीं, बल्कि अपराध के सामाजिक वैधीकरण का संकेत बन जाता है।
यह सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं है। सवाल उस राजनीतिक संस्कृति का है, जिसमें ऐसे आरोपियों को सामाजिक और राजनीतिक संरक्षण मिलता दिखाई देता है। जब किसी संगठन के समर्थक बलात्कार के आरोपी का इस तरह स्वागत करते हैं, तो यह स्वाभाविक रूप से पूछा जाएगा कि क्या ऐसी विचारधारा सचमुच महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और समानता को लेकर गंभीर हो सकती है? क्या “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे नारे केवल चुनावी मंचों तक सीमित रह गए हैं? क्योंकि किसी भी समाज का असली चरित्र उसके नारों से नहीं, बल्कि अपराधियों के प्रति उसके व्यवहार से पहचाना जाता है।
विडंबना देखिए कि एक तरफ मंचों से “नारी शक्ति” का गुणगान किया जाता है, दूसरी तरफ उन्हीं राजनीतिक और वैचारिक समूहों से जुड़े लोगों पर जब यौन हिंसा के आरोप लगते हैं, तो कई बार उन्हें सामाजिक बहिष्कार के बजाय सार्वजनिक समर्थन मिलता है। यह समर्थन केवल आरोपी व्यक्ति को नहीं मिलता, बल्कि उसके जरिए एक संदेश भी जाता है कि यदि आप सत्ता या प्रभावशाली विचारधारा के करीब हैं, तो समाज का एक हिस्सा आपके अपराध को भी “सम्मान” में बदल सकता है। यह कहना गलत होगा कि हर बलात्कारी किसी एक संगठन या विचारधारा से जुड़ा होता है।
यौन अपराध समाज की व्यापक बीमारी हैं और हर समुदाय, वर्ग और राजनीतिक धारा में ऐसे अपराधी मौजूद हैं। लेकिन यह सवाल भी उतना ही वैध है कि आखिर क्यों बार-बार ऐसे मामलों में संघ परिवार या कट्टर हिंदुत्ववादी संगठनों से जुड़े नाम सामने आते हैं? और उससे भी बड़ा सवाल कि क्यों कई मामलों में उनके समर्थन में माहौल बनाया जाता है? देश ने ऐसे कई उदाहरण देखे हैं।
कठुआ रेप केस में एक आठ वर्षीय बच्ची आसिफ़ा बानो के साथ मंदिर परिसर में सामूहिक बलात्कार और हत्या की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। लेकिन उससे भी अधिक शर्मनाक वह दृश्य था जब आरोपियों के समर्थन में रैलियां निकाली गईं। कुछ स्थानीय भाजपा नेताओं और हिंदुत्व संगठनों से जुड़े लोगों ने तिरंगा लेकर आरोपियों के पक्ष में प्रदर्शन किया। वकीलों ने चार्जशीट दाखिल होने से रोकने की कोशिश की।
उस समय पूरे देश ने देखा कि किस तरह एक मासूम बच्ची के लिए न्याय मांगने के बजाय कुछ लोग आरोपी पक्ष की “पहचान” बचाने में जुट गए थे। इसी तरह बिलकिस बानो केस के दोषियों की रिहाई के बाद उनका फूल-मालाओं से स्वागत किया गया था। उन्नाव बलात्कार मामले में भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर का नाम सामने आया, जबकि हाथरस मामले में भी शुरुआती दौर में पीड़िता के परिवार पर ही सवाल उठाए गए। इन घटनाओं ने यह धारणा मजबूत की कि सत्ता और राजनीतिक संरक्षण कई बार न्याय प्रक्रिया पर भारी पड़ने लगते हैं।
उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। National राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में राज्य लगातार शीर्ष पर रहा है। महोबा, प्रतापगढ़, मेरठ, गाज़ीपुर की लगातार सामने आती घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या महिलाओं की सुरक्षा वास्तव में सरकार की प्राथमिकता है, या फिर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति के बीच यह मुद्दा पीछे छूट गया है?
सबसे खतरनाक बात यह है कि जब बलात्कार जैसे अपराधों के आरोपियों को “हीरो” बनाया जाता है, तो इसका असर केवल एक मामले तक सीमित नहीं रहता। इससे समाज में यह संदेश जाता है कि राजनीतिक ताकत और भीड़ समर्थन न्याय से बड़ा हो सकता है। इससे पीड़ित महिलाओं का भरोसा टूटता है, शिकायत दर्ज कराने का साहस कम होता है और अपराधियों का मनोबल बढ़ता है।
किसी भी सभ्य समाज में बलात्कार का आरोपी अदालत से बरी होने तक निर्दोष माना जा सकता है, लेकिन उसका सार्वजनिक महिमामंडन कभी भी स्वीकार्य नहीं हो सकता। ज़मानत कोई सम्मान पत्र नहीं होती। वह केवल कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा होती है। लेकिन जब उसे विजय जुलूस में बदल दिया जाए, तो यह न्याय व्यवस्था और महिलाओं दोनों के प्रति असम्मान बन जाता है। आज असली सवाल यही है कि क्या हम ऐसा समाज बना रहे हैं जहां महिलाओं की सुरक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण राजनीतिक पहचान हो चुकी है? जहां पीड़िता की चीख से ज्यादा ताकतवर आरोपी के समर्थन में उठते नारे हों? और जहां सत्ता के करीब खड़े लोग कानून से ऊपर महसूस करने लगें?
यदि किसी सरकार और उससे जुड़े संगठनों के समर्थक बलात्कार के आरोपियों का सार्वजनिक अभिनंदन करते हैं, तो महिलाओं की सुरक्षा पर उनके दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्योंकि महिलाओं का सम्मान भाषणों से नहीं, बल्कि अपराधियों के प्रति समाज और सत्ता के रवैये से तय होता है।
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