Close Menu
Elaan NewsElaan News
  • Elaan Calender App
  • एलान के बारे में
  • विदेश
  • भारत
  • महाराष्ट्र
  • एलान विशेष
  • लेख / विचार
Letest

आरएसएस पर अमेरिका में बवाल: आखिर नफ़रत और जातिवाद की राजनीति से देश कब आज़ाद होगा?

August 28, 2026

वक्फ बोर्ड में बढ़ती धांधलियां… वक्फ की असली मंशा पर निजी हित भारी

August 28, 2026

10 हज़ार ‘गो मित्र’ और चुनावी राजनीति- रोजगार का मॉडल या आस्था के सहारे नई सियासत?

August 27, 2026
Facebook X (Twitter) Instagram
Trending
  • आरएसएस पर अमेरिका में बवाल: आखिर नफ़रत और जातिवाद की राजनीति से देश कब आज़ाद होगा?
  • वक्फ बोर्ड में बढ़ती धांधलियां… वक्फ की असली मंशा पर निजी हित भारी
  • 10 हज़ार ‘गो मित्र’ और चुनावी राजनीति- रोजगार का मॉडल या आस्था के सहारे नई सियासत?
  • मोहन भागवत का विदेश दौरा और आरएसएस पर अंतरराष्ट्रीय सवाल
  • तीन आदिवासी बच्चियों की मौत और ‘विकास’ का दावा: जब बिस्तर तक न मिले तो कैसा विकास?
  • विदेशी चंदे के नाम पर नियंत्रण या नागरिक संस्थाओं पर नई शिकंजाकशी?
  • क्या पैगंबर मुहम्मद (स.) केवल मुसलमानों के हैं?
  • प्रेस क्लब में ‘मोदी चालीसा’: पत्रकारिता के मंच पर व्यक्तिपूजा का सवाल
Facebook Instagram YouTube
Elaan NewsElaan News
Subscribe
Friday, September 4
  • Elaan के बारे में
  • भारत
  • महाराष्ट्र
  • विदेश
  • Elaan विशेष
  • लेख विचार
  • ई-पेपर
  • कैलेंडर App
  • Video
  • हिन्दी
    • English
    • हिन्दी
    • اردو
Elaan NewsElaan News
Home»लेख विचार

विश्वविद्यालय में संवाद होगा या हिंसा? (अपूर्वानंद का विश्लेषण)

adminBy adminNovember 1, 2025 लेख विचार No Comments5 Mins Read
Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email WhatsApp Copy Link
Share
Facebook Twitter LinkedIn Pinterest Email WhatsApp

image source : freepressjournal.in

दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के एक कॉलेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (ABVP) की पदाधिकारी द्वारा एक अध्यापक पर हमला करने का वीडियो सामने आने के बाद परिसर में तनाव का माहौल है। यह घटना केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय के सार्वजनिक जीवन में हिंसा की बढ़ती संस्कृति और परस्पर विश्वास की कमी को उजागर करती है।


🔎 हिंसा का संदर्भ और प्रासंगिकता

लेखक अपूर्वानंद इस घटना को समझने के लिए कुछ अप्रासंगिक लेकिन प्रचलित तर्कों को खारिज करते हैं:

  • जाति का प्रश्न: हमलावर पदाधिकारी का ‘उच्च जाति’ का होना और अध्यापक का ‘पिछड़ी जाति’ का होना इस हिंसा का कारक तत्त्व नहीं माना जा सकता। जाति के तत्त्व को लाने पर हम हिंसा के वास्तविक संदर्भ से कट जाएंगे।
  • ‘गुरु’ पर हिंसा: इसे केवल ‘गुरु पर की गई हिंसा’ कहकर भावनात्मक अपील पैदा करने से बचना चाहिए। यदि यही हिंसा किसी शिक्षकेतर अधिकारी के साथ होती, तो क्या इसकी गंभीरता कम हो जाती?

प्रशासनिक भूमिका और अध्यापक की परेशानी

  • दोहरी भूमिका: अध्यापकों को अध्यापन के अलावा कई प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ (जैसे अनुशासन समिति) उठानी पड़ती हैं। अध्यापक होने के कारण ही वे ये अतिरिक्त काम करते हैं।
  • तर्क: हमलावर पदाधिकारी ने तर्क दिया कि वे उस वक्त अनुशासन समिति के प्रभारी से सवाल-जवाब कर रहे थे, उस वक्त वे अध्यापक नहीं थे। यह प्रश्न उठता है कि क्या प्रशासक की भूमिका में होने पर अध्यापक अपनी मूल पहचान खो देता है?

😠 छात्र राजनीति में आक्रामकता की संस्कृति

परिसर में ऐसी हिंसा की आशंका हमेशा बनी रहती है। लेखक इसके कई कारण बताते हैं:

  • रुतबा और उग्र व्यवहार: छात्र नेता आम तौर पर आक्रामक होते हैं क्योंकि शायद उनकी उम्र है या वे अपने समर्थकों पर अपना रुआब क़ायम करना चाहते हैं।
  • परस्पर विश्वास का अभाव: विश्वविद्यालय के सार्वजनिक जीवन में परस्पर विश्वास की कमी है। छात्र नेता सोचते हैं कि विनम्रता से बात करने पर उन्हें सुना नहीं जाएगा। प्रशासन भी छात्रों के प्रतिनिधियों को पहले संदेह की निगाह से देखता है।
  • सुनने के धैर्य की कमी: प्रशासक हमेशा जन प्रतिनिधियों को इस निगाह से देखते हैं कि वे ख़ामख़्वाह ख़लल पैदा करते हैं, और वे उनसे पीछा छुड़ाने की हड़बड़ी में रहते हैं।

प्रतिनिधि मंचों की अवहेलना

कई विश्वविद्यालयों में छात्र संघों का अस्तित्व ही नहीं है, और जहाँ है भी, वहाँ नीति बनाते वक्त उनसे विचार-विमर्श नहीं किया जाता। इसलिए उनकी भूमिका सहयोगी की नहीं, बल्कि प्रतिपक्षी की रहती है।


🛑 छात्र संघ की चुप्पी और एबीवीपी की दलीलें

इस घटना के बाद छात्र संघ का संयुक्त बयान न आना चिंता का विषय है।

  • पदाधिकारी का माफ़ीनामा: हिंसा करने वाली पदाधिकारी ने अध्यापक वर्ग से माफ़ी मांगी, लेकिन पीड़ित से नहीं। यह माफ़ीनामा ईमानदार नहीं है क्योंकि वे अपनी हिंसा का औचित्य साबित कर रही हैं।
  • बचाव का आधार: उन्होंने अध्यापक पर नशे में होने और यौन दुर्व्यवहार की शिकायत की, जिससे वे उत्तेजित होकर हाथ उठा बैठीं। जबकि वीडियो साफ़ है और उनके दावे को प्रमाणित नहीं करता।
  • एबीवीपी अध्यक्ष का रुख: छात्र संघ के अध्यक्ष (जो एबीवीपी के हैं) ने हिंसा के लिए आधे मन से क्षमा मांगते हुए अध्यापक पर अन्य आरोप लगाए (जैसे सिगरेट पीना, दुर्व्यवहार), मानो यह सब हिंसा का कारण है और उससे वह कुछ उचित साबित हो जाती है।
  • सवाल: छात्र संघ का संयुक्त बयान क्यों नहीं आया? क्या वह एबीवीपी का मंच है या सारे छात्रों का प्रतिनिधि मंच है?

✅ शिक्षक संघ की एकजुटता और उसका कर्तव्य

  • स्वागत योग्य कदम: शिक्षक संघ का रुख़ इस बार बेहतर था। संघ के अध्यक्ष (जिन्हें हिंदुत्ववादी विचारधारा से जुड़ा माना जाता है) ने भी हिंसा की साफ़ शब्दों में निंदा की और विरोध प्रदर्शन किया।
  • कर्तव्यपालन: शिक्षक संघ के अध्यक्ष भले ही हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी हों, लेकिन वे सारे शिक्षकों के प्रतिनिधि हैं। उनकी सुरक्षा और सम्मान की हिफ़ाज़त उनका ज़िम्मा है। इस बार अपने भ्रातृ संगठन की सदस्य की हिंसा का विरोध करके वे अपना कर्तव्य निभा रहे हैं।

विचारधारात्मक विभाजन का खतरा

अगर अध्यापकों का एक समूह विचारधारा के कारण दूसरे समूह के ख़िलाफ़ हिंसा का प्रचार करेगा, तो वह हिंसा कभी न कभी होगी ही।

  • दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षकों में विचारधारा के आधार पर विभाजन से अकादमिक वातावरण पर प्रतिकूल असर पड़ता है, और अध्यापक की पेशेवर पहचान पीछे चली जाती है।
  • इसी वजह से कुछ अध्यापक हिंसा के लिए अध्यापक को ही ज़िम्मेदार ठहराने की कोशिश करते देखे गए।

❓ प्रशासन की विश्वसनीयता और भविष्य की चुनौती

विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच समिति बैठा दी है, लेकिन एक बड़े वर्ग को उस पर भरोसा नहीं हो पा रहा है।

  • भेदभाव का आरोप: यह सवाल पूछा जा रहा है कि अगर हिंसा करने वाली किसी दूसरे छात्र संगठन की होती, तो पहले ही उस पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो चुकी होती, जैसा कि पिछले सालों में एकाधिक बार हुआ है।
  • विश्वसनीयता की हानि: प्रशासन ने पिछले सालों में हिंदुत्ववादी विचार के प्रति अपनी वफ़ादारी दिखलाकर अपनी विश्वसनीयता खो दी है।

हिंसा की स्वीकृति का ख़तरा

पिछले दो दशकों में देश भर के परिसरों में हुई हिंसा की अधिकतर घटनाओं में एबीवीपी के सदस्य क्यों शामिल पाए जाते हैं—यह सवाल संगठन को स्वयं से पूछना चाहिए।

लेखक का मत है कि जहां विचार कारगर नहीं होते, वहां उसकी भरपाई हिंसा से की जाती है। लेकिन अगर परिसर में हिंसा एक स्वीकृत भाषा और व्यवहार बन जाए, तो फिर बुद्धि और विचार कहाँ शरण लें?

delhi delhi univercity hindutwwadi विश्वविद्यालय में संवाद होगा या हिंसा? (अपूर्वानंद का विश्लेषण)
Share. Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email WhatsApp Copy Link
admin
  • Website

Keep Reading

वक्फ बोर्ड में बढ़ती धांधलियां… वक्फ की असली मंशा पर निजी हित भारी

क्या पैगंबर मुहम्मद (स.) केवल मुसलमानों के हैं?

अल्पसंख्यकों की समस्याएँ और सरकार की भूमिका

वक्फ संपत्तियों पर कब्जेदारी-आखिर एक दिन ख़ुदा को जवाब देना है

गुजरात में “कट्टरतावाद विरोधी पथक”की स्थापना…

भारत में हिंदुत्व पॉप, डिजिटल प्रोपेगैंडा भी अब कारोबार बन चुका है

Add A Comment
Leave A Reply Cancel Reply

Latest Post
  • आरएसएस पर अमेरिका में बवाल: आखिर नफ़रत और जातिवाद की राजनीति से देश कब आज़ाद होगा?
  • वक्फ बोर्ड में बढ़ती धांधलियां… वक्फ की असली मंशा पर निजी हित भारी
  • 10 हज़ार ‘गो मित्र’ और चुनावी राजनीति- रोजगार का मॉडल या आस्था के सहारे नई सियासत?
  • मोहन भागवत का विदेश दौरा और आरएसएस पर अंतरराष्ट्रीय सवाल
  • तीन आदिवासी बच्चियों की मौत और ‘विकास’ का दावा: जब बिस्तर तक न मिले तो कैसा विकास?
Categories
  • Uncategorized
  • एलान विशेष
  • धर्म
  • भारत
  • महाराष्ट्र
  • लातुर
  • लेख विचार
  • विदेश
  • विशेष
Instagram

elaannews

📺 | हमारी खबर आपका हौसला
⚡️
▶️ | NEWS & UPDATES
⚡️
📩 | elaannews1@gmail.com
⚡️

📍 बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश गिरफ्तारी से पहले मीडिया 📍 बुलंदशहर, उत्तर प्रदेशगिरफ्तारी से पहले मीडिया को दिए इंटरव्यू में स्वतंत्र भारद्वाज ने विपक्ष को चुनौती देते हुए कहा—“तुम ट्रम्प, नेतनयाहू, जितना को भी, अभी तो राहुल गांधी उतरा है ना। हम तो कह रहे हैं भारत के अंदर जितना विपक्ष नेता है, तुम जितना विपक्ष के सपोर्टर हैं, उन सारे लोग को लेकर ग्राउंड पे उतर जाओ, तो भी अगर मेरा बाल भी बांका कर दो तो मान जाएं। नहीं हो सकता सर, जलवा है हमारा।और जलवा ऐसे ही बना रहेगा, धर्मो रक्षति रक्षितः। जो धर्म की रक्षा करता है, उसका धर्म रक्षा करता है। जेल जाएंगे, फिर आएंगे, फिर कुछ बोलेगा, फिर इलाज हो जाएगा।#elaannews #breakingnews #indianews #swatantrabhardwaj #viralnews
Full Video On Youtube And Facebook Check Out Like Full Video On Youtube And Facebook Check Out Like Comment And Share Video.#elaannews #breakingnews #Latur #laturnews #sambhajipatilnilangekar
पंजाब में चुनाव आयोग की ओर से विशेष गहन पुनरीक्षण पंजाब में चुनाव आयोग की ओर से विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत 13 अगस्त 2026 को जारी की गई ड्राफ्ट मतदाता सूची से राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा का नाम हटाए जाने की बात सामने आई है। खास बात यह है कि उनके नाम के सामने ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ दर्ज किया गया है।#elaannews #breakingnews #indianews #raghavchadha #punjabnews
Full Video On Youtube And Facebook Check Out Like Full Video On Youtube And Facebook Check Out Like Comment And Share Video#elaannews #breakingnews #Latur #laturnews #shiruranantpal
Follow on Instagram
Facebook X (Twitter) Pinterest Vimeo WhatsApp TikTok Instagram

News

  • महाराष्ट्र
  • भारत
  • विदेश
  • एलान विशेष
  • लेख विचार
  • धर्म

Subscribe to Updates

Get the latest creative news from FooBar about art, design and business.

© 2024 Your Elaan News | Developed By Durranitech
  • Privacy Policy
  • Terms
  • Accessibility