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दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के एक कॉलेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (ABVP) की पदाधिकारी द्वारा एक अध्यापक पर हमला करने का वीडियो सामने आने के बाद परिसर में तनाव का माहौल है। यह घटना केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय के सार्वजनिक जीवन में हिंसा की बढ़ती संस्कृति और परस्पर विश्वास की कमी को उजागर करती है।
🔎 हिंसा का संदर्भ और प्रासंगिकता
लेखक अपूर्वानंद इस घटना को समझने के लिए कुछ अप्रासंगिक लेकिन प्रचलित तर्कों को खारिज करते हैं:
- जाति का प्रश्न: हमलावर पदाधिकारी का ‘उच्च जाति’ का होना और अध्यापक का ‘पिछड़ी जाति’ का होना इस हिंसा का कारक तत्त्व नहीं माना जा सकता। जाति के तत्त्व को लाने पर हम हिंसा के वास्तविक संदर्भ से कट जाएंगे।
- ‘गुरु’ पर हिंसा: इसे केवल ‘गुरु पर की गई हिंसा’ कहकर भावनात्मक अपील पैदा करने से बचना चाहिए। यदि यही हिंसा किसी शिक्षकेतर अधिकारी के साथ होती, तो क्या इसकी गंभीरता कम हो जाती?
प्रशासनिक भूमिका और अध्यापक की परेशानी
- दोहरी भूमिका: अध्यापकों को अध्यापन के अलावा कई प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ (जैसे अनुशासन समिति) उठानी पड़ती हैं। अध्यापक होने के कारण ही वे ये अतिरिक्त काम करते हैं।
- तर्क: हमलावर पदाधिकारी ने तर्क दिया कि वे उस वक्त अनुशासन समिति के प्रभारी से सवाल-जवाब कर रहे थे, उस वक्त वे अध्यापक नहीं थे। यह प्रश्न उठता है कि क्या प्रशासक की भूमिका में होने पर अध्यापक अपनी मूल पहचान खो देता है?
😠 छात्र राजनीति में आक्रामकता की संस्कृति
परिसर में ऐसी हिंसा की आशंका हमेशा बनी रहती है। लेखक इसके कई कारण बताते हैं:
- रुतबा और उग्र व्यवहार: छात्र नेता आम तौर पर आक्रामक होते हैं क्योंकि शायद उनकी उम्र है या वे अपने समर्थकों पर अपना रुआब क़ायम करना चाहते हैं।
- परस्पर विश्वास का अभाव: विश्वविद्यालय के सार्वजनिक जीवन में परस्पर विश्वास की कमी है। छात्र नेता सोचते हैं कि विनम्रता से बात करने पर उन्हें सुना नहीं जाएगा। प्रशासन भी छात्रों के प्रतिनिधियों को पहले संदेह की निगाह से देखता है।
- सुनने के धैर्य की कमी: प्रशासक हमेशा जन प्रतिनिधियों को इस निगाह से देखते हैं कि वे ख़ामख़्वाह ख़लल पैदा करते हैं, और वे उनसे पीछा छुड़ाने की हड़बड़ी में रहते हैं।
प्रतिनिधि मंचों की अवहेलना
कई विश्वविद्यालयों में छात्र संघों का अस्तित्व ही नहीं है, और जहाँ है भी, वहाँ नीति बनाते वक्त उनसे विचार-विमर्श नहीं किया जाता। इसलिए उनकी भूमिका सहयोगी की नहीं, बल्कि प्रतिपक्षी की रहती है।
🛑 छात्र संघ की चुप्पी और एबीवीपी की दलीलें
इस घटना के बाद छात्र संघ का संयुक्त बयान न आना चिंता का विषय है।
- पदाधिकारी का माफ़ीनामा: हिंसा करने वाली पदाधिकारी ने अध्यापक वर्ग से माफ़ी मांगी, लेकिन पीड़ित से नहीं। यह माफ़ीनामा ईमानदार नहीं है क्योंकि वे अपनी हिंसा का औचित्य साबित कर रही हैं।
- बचाव का आधार: उन्होंने अध्यापक पर नशे में होने और यौन दुर्व्यवहार की शिकायत की, जिससे वे उत्तेजित होकर हाथ उठा बैठीं। जबकि वीडियो साफ़ है और उनके दावे को प्रमाणित नहीं करता।
- एबीवीपी अध्यक्ष का रुख: छात्र संघ के अध्यक्ष (जो एबीवीपी के हैं) ने हिंसा के लिए आधे मन से क्षमा मांगते हुए अध्यापक पर अन्य आरोप लगाए (जैसे सिगरेट पीना, दुर्व्यवहार), मानो यह सब हिंसा का कारण है और उससे वह कुछ उचित साबित हो जाती है।
- सवाल: छात्र संघ का संयुक्त बयान क्यों नहीं आया? क्या वह एबीवीपी का मंच है या सारे छात्रों का प्रतिनिधि मंच है?
✅ शिक्षक संघ की एकजुटता और उसका कर्तव्य
- स्वागत योग्य कदम: शिक्षक संघ का रुख़ इस बार बेहतर था। संघ के अध्यक्ष (जिन्हें हिंदुत्ववादी विचारधारा से जुड़ा माना जाता है) ने भी हिंसा की साफ़ शब्दों में निंदा की और विरोध प्रदर्शन किया।
- कर्तव्यपालन: शिक्षक संघ के अध्यक्ष भले ही हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी हों, लेकिन वे सारे शिक्षकों के प्रतिनिधि हैं। उनकी सुरक्षा और सम्मान की हिफ़ाज़त उनका ज़िम्मा है। इस बार अपने भ्रातृ संगठन की सदस्य की हिंसा का विरोध करके वे अपना कर्तव्य निभा रहे हैं।
विचारधारात्मक विभाजन का खतरा
अगर अध्यापकों का एक समूह विचारधारा के कारण दूसरे समूह के ख़िलाफ़ हिंसा का प्रचार करेगा, तो वह हिंसा कभी न कभी होगी ही।
- दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षकों में विचारधारा के आधार पर विभाजन से अकादमिक वातावरण पर प्रतिकूल असर पड़ता है, और अध्यापक की पेशेवर पहचान पीछे चली जाती है।
- इसी वजह से कुछ अध्यापक हिंसा के लिए अध्यापक को ही ज़िम्मेदार ठहराने की कोशिश करते देखे गए।
❓ प्रशासन की विश्वसनीयता और भविष्य की चुनौती
विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच समिति बैठा दी है, लेकिन एक बड़े वर्ग को उस पर भरोसा नहीं हो पा रहा है।
- भेदभाव का आरोप: यह सवाल पूछा जा रहा है कि अगर हिंसा करने वाली किसी दूसरे छात्र संगठन की होती, तो पहले ही उस पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो चुकी होती, जैसा कि पिछले सालों में एकाधिक बार हुआ है।
- विश्वसनीयता की हानि: प्रशासन ने पिछले सालों में हिंदुत्ववादी विचार के प्रति अपनी वफ़ादारी दिखलाकर अपनी विश्वसनीयता खो दी है।
हिंसा की स्वीकृति का ख़तरा
पिछले दो दशकों में देश भर के परिसरों में हुई हिंसा की अधिकतर घटनाओं में एबीवीपी के सदस्य क्यों शामिल पाए जाते हैं—यह सवाल संगठन को स्वयं से पूछना चाहिए।
लेखक का मत है कि जहां विचार कारगर नहीं होते, वहां उसकी भरपाई हिंसा से की जाती है। लेकिन अगर परिसर में हिंसा एक स्वीकृत भाषा और व्यवहार बन जाए, तो फिर बुद्धि और विचार कहाँ शरण लें?