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Home»विदेश

ये ‘शांति पुरस्कार’ नहीं, बल्की ‘जनसंहार का इनाम’ है

adminBy adminJuly 22, 2025 विदेश No Comments4 Mins Read
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image credit : alamy.com
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ग़ाज़ा जल रहा है, और वाशिंगटन में जश्न मनाया जा रहा है, ग़ाज़ा में 60,000 से ज़्यादा फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं। 10 लाख से ज़्यादा लोग बेघर, भूखे, और इलाज से वंचित हैं। बमों की बारिश से अस्पतालों, मस्जिदों, स्कूलों तक को मिटा दिया गया।और इन्हीं लाशों के ढेर पर खड़े होकर, बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रम्प व्हाइट हाउस में रात्रिभोज कर रहे हैं –जहाँ वो तय कर रहे हैं कि अब फिलिस्तीनियों को ग़ाज़ा से निकाल फेंकना चाहिए। क्या यही है ‘शांति वार्ता’?

या ये एक साफ-सुथरी ‘एथनिक क्लीनज़िंग’ है – यानी ज़बर्दस्ती नस्लीय सफ़ाया? नेतन्याहू इस बैठक में खुलेआम कहता है –अगर वो रहना चाहें, तो रहें… और जाना चाहें, तो जाएं” “ग़ाज़ा जेल नहीं है। लोगों को ‘जाने की आज़ादी’ मिलनी चाहिए।” जबकि हक़ीक़त ये है, ग़ाज़ा 14 साल से इज़राइल की घेराबंदी में एक खुली जेल है।

– वहाँ न बाहर जाने का रास्ता है– न सामान आने की छूट– और अब, जब ग़ाज़ा को मलबे में बदल दिया गया है, तो वही इज़रायल कहता है: “अब ये लोग यहाँ से चले जाएं”। ये शरण नहीं है, ये निर्वासन है। ये दया नहीं है, ये धोखा है। और इससे भी घिनौना है – इसे ‘शांति’ बताकर बेचना। ट्रम्प का ‘मिडल ईस्ट रिवेरा’ सपना: युद्ध भूमि को रिज़ॉर्ट में बदलने की साजिश, डोनाल्ड ट्रम्प ने इस साल की शुरुआत में ग़ाज़ा को “मध्य पूर्व का रिवेरा” बनाने की बात की थी। यानि:– पहले ग़ाज़ा को बमों से ख़ाली करो– फिर ज़मीन पर क़ब्ज़ा करो– और फिर वहाँ “रिज़ॉर्ट” और “टूरिज़्म” लाओ। और ये सब एक पूरे क़ौम की बर्बादी के बदले! अगर यही विज़न है, तो ये शांति योजना नहीं, कॉलोनियल लूट की 21वीं सदी की वापसी है। “स्वैच्छिक पलायन” – या धोखे से किया गया जातीय सफाया? इस साजिश को इज़रायल की तरफ से “Voluntary relocation” यानी “इच्छा से पलायन” कहा जा रहा है।

पर सवाल ये है: जब आपके घर पर बम गिरते हैं, जब आपके स्कूल जलाए जाते हैं, जब आपके बच्चों की लाशें मलबे में दबी हों, तो क्या आप वाकई “इच्छा से” अपना वतन छोड़ रहे होते हैं? यह जबरन निष्कासन है। और इसे अंतरराष्ट्रीय भाषा में कहते हैं – Ethnic Cleansing।

नोबेल शांति पुरस्कार? या ‘नरसंहार का इनाम’?:सबसे शर्मनाक बात –इस बैठक के अंत में नेतन्याहू ने ट्रम्प को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया। मतलब –जिसने इज़रायली बमबारी का समर्थन किया, ग़ाज़ा को क़ब्रिस्तान में बदला, और अब फिलिस्तीनियों को बाहर निकालने की योजना बना रहा हैं –उसे दुनिया का सबसे बड़ा ‘शांति सम्मान’ दिया जाए? ये नोबेल नहीं, नफरत का तमगा है। ये ट्रॉफी नहीं, निर्दोष बच्चों की लाशों से गढ़ा ताज है।

अंतरराष्ट्रीय चुप्पी और अरब देशों की शर्मनाक निष्क्रियता:- ट्रम्प कहते हैं – “हम आसपास के देशों से अच्छा सहयोग पा रहे हैं…”कौन हैं ये देश?– मिस्र? जिसने राफा बॉर्डर बंद कर रखा है?– सऊदी अरब? जो इज़रायल से डील के लिए बेताब है? – UAE? जिसने पहले ही इज़रायल को “बिजनस पार्टनर” बना लिया? ये सब ग़ाज़ा की तबाही को ‘साइलेंट अप्रूवल’ दे रहे हैं।

और UN क्या कर रहा है?:- संयुक्त राष्ट्र सिर्फ “गंभीर चिंता” जता रहा है। ICJ की राय को इज़रायल ठेंगा दिखा रहा है। और दुनिया की बाकी “लोकतंत्र-प्रेमी सरकारें” इस नरसंहार पर मौन व्रत में हैं। क्या आज दुनिया की नैतिकता ट्रम्प की दावत में खो गई है?

 यह शांति नहीं, सुनियोजित सफाया है:- फिलिस्तीनियों को घर से निकालना। उनकी ज़मीन पर टूरिस्ट लाना। और फिर नरसंहार के मास्टरमाइंड को “शांति पुरुष” कहना –यह इंसाफ नहीं, इतिहास का अपमान है। यह लेख एक सवाल छोड़ता है: क्या ग़ाज़ा के मलबे पर खड़े होकर नोबेल शांति पुरस्कार बांटने वालों को इतिहास कभी माफ़ करेगा? या यह पुरस्कार एक दिन ‘जनसंहार का दस्तावेज़’ बन जाएगा?

Ethnic Cleansing in Palestine Gaza Destruction 2025 Gaza Forced Eviction Gaza Genocide Israel Gaza Attack Open Air Prison Gaza
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