दोस्तों, सोचिए… शहर के बीचोंबीच, चौक में“ सड़क पर अगर आपको नंगा किया जाए…?” “अगर आपके गुप्तांगों पर मारा जाए और कहा जाए – तू पाकिस्तानी है? कश्मीर से आया है?”न सिर्फ मारा जाए, बल्कि आपकी इंसानियत, आपकी इज्ज़त, आपकी पहचान को नंगा कर दिया जाए…“और फिर इन सबका विडिओ बनाया जाए और कहा जाए – वीडियो वायरल करूंगा…”तो क्या आप ज़िंदा रह पाएंगे? लातूर शहर में एयरटेल कंपनी में काम करने वाले एक पढ़े -लिखे, इज्ज़तदार 30 वर्षीय आमिर पठान को सिर्फ एक छोटी सी बात पर – गाड़ी को साइड न देने के बहाने हिंदुत्ववादी गुंडों ने सड़क पर घसीटा, मारा, कपड़े उतारे… और यहाँ तक कहा कि “क्या तू पाकिस्तानी है? कश्मीर से आया है?”और फिर, उसके गुप्तांगों पर मारा।इस अपमान और गहरे सदमे के कारण आमिर पठान ने आत्महत्या कर ली। पीड़ित परिवार इंसाफ की गुहार लगा रहा है, लेकिन अफ़सोस है लातूर पुलिस पर जो पहले तो इस मामले में FIR दर्ज करने में टाल मटोल करती रही पीड़ित परिवार और स्थानीय मीडिया के दबाव के बाद FIR तो दर्ज हो गई लेकिन FIR दर्ज होकर भी आज 4 दिन हो चुके हैं फिर भी कोई करवाई नहीं हो रही है। जबकि गाड़ी का नंबर, CCTV फुटेज पुलिस के पास मौजूद हैं। इसका सीधा मतलब ये हो सकता है कि पुलिस पर राजनीतिक दबाव है या अपराधियों की पहुंच ऊँची है।कई बार स्थानीय अपराधी नेताओं के संरक्षण में होते हैं, जिससे पुलिस जानबूझकर कार्रवाई टालती रहती है।इससे बड़ा सवाल ये है कि मुसलमानों के वोटों पे अपना अधिकार ज़माने वाले स्थानीय विधायक और सांसद चुप क्यों हैं? कहां हैं वो मुस्लिम संगठनाएं और मुस्लिम नेता जो मुसलमानों को संगठित करके इन्हें वोट दिलाते हैं। क्या आज संगठित होकर पीड़ित परिवार को इंसाफ दिलाना इनकी ज़िम्मेदारी नहीं है ? पडोसी शहर औसा में रहने वाले राष्ट्रवादी कांग्रेस (अजित पवार गुट) के जिला अध्यक्ष और अल्पसंख्यांक आयोग के सदस्य अफसर शैख़ ने अल्पसंख्यांक आयोग से इंसाफ की मांग करने पर महाराष्ट्र अल्पसंख्यांक आयोग के सचिव सारंगकुमार पाटिल ने जिलाधिकारी तथा पुलिस अधीक्षक लातूर से अपराधियों के खिलाफ सख्त करवाई करके सात दिन में अहवाल भेजने का आदेश दिया है, वहीँ समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आसिम आज़मी ने भी फोन करके पुलिस अधीक्षक लातूर से अपराधियों के खिलाफ करवाई की मांग की है लेकिन लातूर के मुस्लिम नेता पुलिस अधीक्षक को निवेदन देकर अख़बारों में तस्वीरें छपवा रहे हैं. पुलिस और नेता तभी जागते हैं जब जनता एकजुट हो। समाज एकजुट हो। अगर लोग धर्म, जाति या पार्टी के नाम पर बँटकर चुप रहते हैं, तो अपराधी हमेशा जीतते हैं। अफ़सोस उन लोगों पर भी है जो वहां ठहर कर तमाशा देख रहे थे।अगर यही हालत आपके बेटे, भाई, या दोस्त के साथ हो जाए तो क्या तब भी आप खामोश रहेंगे? इंसाफ सिर्फ नाम का शब्द नहीं होता, अगर आपको लगता है कि आमिर के साथ गलत हुआ है तो अब चुप मत रहिए, आवाज़ उठाइए, सोशल मीडिया पर आंदोलन,#JusticeForAamirPathan के नाम से ट्रेंड चलाइए। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और उनके कार्यकर्ताओं से सवाल पूछिए। धरने आंदोलन कीजिए, संविधानिक तरीके से जो कर सकते हैं वो सब
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