क्या देश का ‘जन-धन’ अब केवल ‘मित्र-धन’ बन गया है?
जब एक आम नागरिक हर महीने अपनी गाढ़ी कमाई से बीमा प्रीमियम भरता है, तो उसे यकीन होता है कि वह पैसा उसके भविष्य की गारंटी बनेगा—बुढ़ापे की राहत, किसी संकट में सुरक्षा। लेकिन मोदी सरकार में यही पैसा अब कुछ खास उद्योगपतियों के फायदे का ज़रिया बन गया है।
ताज़ा मामला भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) और अडानी पोर्ट्स का है। एलआईसी ने अडानी पोर्ट्स को 15 साल की अवधि के लिए 5,000 करोड़ रुपये का कर्ज दिया है—वो भी खुले बाज़ार से बाहर, निजी तौर पर! यानी इस सौदे में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी, कोई और बोली नहीं लगी, सिर्फ अडानी और एलआईसी। सवाल ये है कि क्या एलआईसी का पैसा अडानी की मदद के लिए है? या फिर आम जनता की सुरक्षा के लिए?
राहुल गांधी ने उठाया सवाल:- कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस डील को लेकर मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने एक्स (ट्विटर) पर लिखा: “पैसा, पॉलिसी, प्रीमियम आपका। सुरक्षा, सुविधा, फायदा अडानी का!” और यह सवाल वाजिब है। क्योंकि एलआईसी जैसी सरकारी संस्था जनता के पैसे से चलती है। और जब वह अडानी जैसे एक विवादास्पद कारोबारी समूह को अकेले 5,000 करोड़ रुपये की फाइनेंसिंग करती है, तो शक की सुई सरकार की ओर मुड़ना लाज़मी है।
यह कोई पहली बार नहीं…एलआईसी का अडानी के साथ ये पहला “खास रिश्ता” नहीं है। हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद जब अडानी ग्रुप के शेयर ताश के पत्तों की तरह गिरने लगे थे, तब भी एलआईसी ने अडानी की कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई थी। क्यों? किसके कहने पर? इतना ही नहीं, मोदी राज में अंबानी-अडानी को दिए गए कर्ज और रियायतों की लंबी लिस्ट है: अडानी को फायदा पहुंचाने वाली प्रमुख घटनाएं:- 2023: हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद भी एलआईसी और SBI ने अडानी ग्रुप में निवेश बनाए रखा। 2016–2022: अडानी को कई एयरपोर्ट्स और पोर्ट्स के टेंडर “खास नियमों” में ढील देकर दिए गए। 2021: मोदी सरकार ने श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया, और बांग्लादेश में अडानी की परियोजनाओं को भारत सरकार के समर्थन से विदेशों में भी मजबूत किया।
माफ किए गए कर्ज:- RTI और संसद में रखे गए आंकड़ों के अनुसार, मोदी सरकार ने 2014 से 2019 के बीच 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक के कॉरपोरेट लोन ‘राइट-ऑफ’ किए हैं। जबकि इस देश को अनाज उगा कर देने वाले किसान कर्ज़ों के बोझ से परेशान हो कर आत्महत्याएं कर रहे हैं। क्या आप जानते हैं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार सिर्फ 2014 से 2022 तक देश के 1,12,000 से अधिक किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। यानी 8 साल में औसतन हर साल 14000 हज़ार किसानों ने कर्ज का बोझ और उसे चुकाने में असमर्थता के कारण आत्महत्याएं की हैं। 2023-24 को जोड़ा जाए तो लगभग ये आंकड़ा 140000 के ऊपर पहुंच जाएगा। मोदीजी अगर वही दस लाख करोड़ से अगर इन गरीब किसानों का क़र्ज़ माफ़ करते तो आज हमारे देश के 140000 किसानों की जान बच सकती थी। आपको ये भी बताता चलूं इन 8 सालों महाराष्ट्र में सबसे अधिक यानी लगभग 37,322 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। अरे अंधभक्तों तुम जिस मोदी की अंधभक्ति कर रहे हो वो न तुम्हारा है, न हिन्दुओं का है, न इस देश के गरीब किसानों का है, वो तो सिर्फ और सिर्फ उद्योगपतियों का दोस्त है। क्या ये 140000 किसान मुसलमान थे ? अंधभक्तों थोड़ी देर के लिए गोदी मिडिया वाला चश्मा निकालो और ईमानदारी से गौर करो इन 140000 हिन्दू किसानों की हत्या का ज़िम्मेदार कौन है ? दस सालों में कभी गौ रक्षा तो कभी जातीय हिंसा और कभी आतंकवाद के बहाने सौ- डेढ़ सौ बेकसूर मुसलमानों की लिंचिंग या हत्याओं की छूठ मिलने से तुम ये समझ रहे हो कि ये मुसलमानों के ही दुश्मन हैं और हिंदुओं के दोस्त। अंदाज़ा लगाओ अगर ये हिन्दुओं के दोस्त होते तो 140000 हिन्दू किसानों को मरने देते ? ये मत देखो कि इस रिपोर्ट को बताने वाला कौन है बल्कि ये देखो कि इस रिपोर्ट में कितनी सच्चाई है ? गोदी मीडिया तुम्हें ऐसी रिपोर्ट कभी नहीं बताएगा। फैसला आप कीजिये। चलिए आगे बढ़ते हैं वर्ना बात अधूरी रह जाएगी – 2014 से 2019 के बीच जिन 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक के कॉरपोरेट लोन ‘राइट-ऑफ’ किए गए हैं। यानी छोड़ दिए हैं इसमें अडानी और अंबानी समूह की कंपनियां भी शामिल हैं, हालांकि सरकार साफ़-साफ़ नाम बताने से बचती रही है। क्या एलआईसी अब ‘अडानी निवेश निगम’ बन गया है? पिछले हफ्ते की खबर बताती है कि अडानी पोर्ट्स को मिले 5,000 करोड़ रुपये का यह डील एलआईसी के लिए ‘लो-रिटर्न’ और ‘हाई-रिस्क’ हो सकता है, क्योंकि: डील ओपन मार्केट में नहीं हुआ। केवल एक निवेशक (एलआईसी) था। 15 साल की अवधि किसी भी फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन के लिए असामान्य और जोखिमभरा है। और सबसे ज़रूरी बात—अडानी इस पैसे का उपयोग अपने पुराने विदेशी डॉलर कर्ज को चुकाने में करेगा। यानी भारत के लोगों का पैसा, विदेशी बैंकों से लिए गए अडानी के कर्ज चुकाने के लिए लगाया जाएगा। क्या यही ‘आत्मनिर्भर भारत’ है?
मोदी सरकार के दौरान एलआईसी और सरकारी बैंकों को जिस तरह से अडानी-अंबानी की कंपनियों के लिए ‘एटीएम’ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, वो भारत के लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी है। आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अडानी को पैसा क्यों दिया गया। सवाल यह है कि जनता के भरोसे को सत्ता द्वारा उद्योगपतियों की तिजोरी में कब तक झोंका जाएगा? यह लेख एक चेतावनी है, एक दस्तावेज़ है, और सबसे ज़रूरी बात—एक सवाल है कि क्या ‘जन-धन’ अब केवल ‘मित्र-धन’ बन गया है?