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Home»भारत

संभल हिंसा और न्याय की कसौटी: क्या अदालतें भरोसे की डोर संभाल पाएंगी?

adminBy adminFebruary 14, 2026 भारत No Comments5 Mins Read
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संभल हिंसा के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा निचली अदालत के उस आदेश पर रोक लगाना, जिसमें 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था, केवल एक कानूनी कार्रवाई ही नहीं है बल्कि यह न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

एक ओर निचली अदालत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) ने कथित पुलिस फायरिंग में घायल युवक के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया, तो दूसरी ओर हाईकोर्ट ने उस आदेश पर स्थगन दे दिया। कानून के तहत उच्च न्यायालय को निचली अदालत के आदेशों की समीक्षा करने का पूरा अधिकार है, लेकिन जिस सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में यह मामला सामने आया है, उसने न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर बहस को तेज कर दिया है।

न्याय या सत्ता किसके साथ खड़ी है व्यवस्था?

शिकायतकर्ता यामीन का आरोप है कि उनका बेटा आलम मस्जिद के पास पापड़-बिस्कुट बेच रहा था, जब पुलिस की गोली से घायल हुआ। निचली अदालत ने प्रथम दृष्टया इसे गंभीर मानते हुए एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया। लेकिन हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट ने कानूनी सुरक्षा प्रावधानों की अनदेखी की।

यहाँ मूल प्रश्न यह है कि क्या पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पहले से ही इतनी ऊँची कानूनी दीवारें खड़ी कर दी गई हैं कि आम नागरिक के लिए न्याय पाना लगभग असंभव हो जाए? वरिष्ठ अधिवक्ता एसएफए नकवी ने अदालत में ‘पैरेंस पैट्रिए’ का सिद्धांत उठाया यानी राज्य नागरिकों का संरक्षक है। यदि राज्य अपने ही अधिकारियों की रक्षा में सक्रिय दिखे और पीड़ित नागरिक को अपने हाल पर छोड़ दे, तो यह संतुलन किस ओर झुकता दिखेगा?

निचली अदालत का आदेश और तत्काल तबादला: संयोग या संकेत?

सीजेएम विभांशु सुधीर द्वारा 9 जनवरी को आदेश पारित किया गया और एक सप्ताह के भीतर उनका तबादला कर दिया गया। तबादले को प्रशासनिक प्रक्रिया बताया जा सकता है, लेकिन समय-सीमा ने सवालों को जन्म दिया है। भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्वतंत्रता है। यदि किसी आदेश के तुरंत बाद संबंधित जज का तबादला होता है, तो आम जनता के मन में शंका पैदा होना स्वाभाविक है। भले ही यह संयोग हो, लेकिन न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए बल्कि न्याय होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।

24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा में 5 लोगों की मौत हुई। पुलिस का दावा है कि उनकी गोली से किसी की मौत नहीं हुई, जबकि पीड़ित पक्ष का आरोप

संभल हिंसा का व्यापक संदर्भ

24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा में 5 लोगों की मौत हुई। पुलिस का दावा है कि उनकी गोली से किसी की मौत नहीं हुई, जबकि पीड़ित पक्ष का आरोप है कि पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग की। यह भी ध्यान देने योग्य है कि मस्जिद- मंदिर विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों में प्रशासन की भूमिका अत्यंत संतुलित होनी चाहिए।

अगर राज्य की कार्रवाई किसी एक समुदाय के विरुद्ध पक्षपाती प्रतीत होती है, तो सामाजिक ताना-बाना और अधिक कमजोर होता है। पूर्व सीओ अनुज चौधरी पहले भी अपने बयानों को लेकर विवादों में रहे हैं, विशेषकर होली और जुमे को लेकर दिया गया बयान, जिसमें उन्होंने मुसलमानों को घर में रहने की सलाह दी थी। ऐसे अधिकारी के खिलाफ गंभीर आरोप लगें और फिर एफआईआर पर रोक लगे, तो सवाल और गहरे हो जाते हैं।

अदालतों की गिरती साख? या प्रक्रिया का हिस्सा?

यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि एक आदेश से न्यायपालिका की साख गिर जाती है। लेकिन यह भी सच है कि हाल के वर्षों में कई संवेदनशील मामलों में अदालतों के फैसलों को लेकर समाज के एक हिस्से में अविश्वास बढ़ा है। जब पीड़ित पक्ष यह महसूस करे कि न्याय पाने की राह में हर स्तर पर रुकावट है और पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती, राज्य अधिकारी बचाव में खड़े हो जाते हैं, और फिर अदालत का आदेश भी रुक जाता है तो न्याय व्यवस्था पर भरोसा डगमगाता है।

हाईकोर्ट ने अभी केवल स्थगन दिया है, अंतिम निर्णय नहीं। मेंटेनेबिलिटी पर सुनवाई बाकी है। इसलिए न्याय की प्रक्रिया पूरी होने से पहले निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। परंतु अदालतों को यह समझना होगा कि ऐसे मामलों में पारदर्शिता और संवेदनशीलता अत्यंत आवश्यक है।

असली कसौटी आगे है

यह मामला केवल एक एफआईआर का नहीं है। यह उस भरोसे की परीक्षा है, जो आम नागरिक न्यायपालिका पर करता है।

अगर अंततः निष्पक्ष जांच होती है तो चाहे पुलिस दोषी पाई जाए या निर्दोष तो अदालत की साख मजबूत होगी। लेकिन यदि प्रक्रिया ही इतनी जटिल और पक्षपाती दिखे कि पीड़ित को न्याय की उम्मीद ही खत्म हो जाए, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होती है। संभल की यह घटना केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की परीक्षा है। अदालतें यदि स्वतंत्र, पारदर्शी और निर्भीक होकर फैसला देंगी, तो न्यायपालिका पर जनता का भरोसा फिर से मजबूत होगा।

फिलहाल, सवाल हवा में हैं कि क्या न्याय व्यवस्था सत्ता से ऊपर खड़ी दिखाई देगी? या फिर यह मामला भी समय की धूल में दब जाएगा? देश की निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

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