आरएसएस बनाम सरकारी स्कूल: प्रियांक खड़गे की मांग सही, लेकिन क्या है रास्ता? कर्नाटक मंत्री प्रियांक खड़गे ने आरएसएस को सरकारी शिक्षण संस्थानों से बाहर रखने की मांग उठाई है। यह मांग संवैधानिक तटस्थता के सिद्धांत पर खरी उतरती है, लेकिन इसका व्यावहारिक क्रियान्वयन राजनीतिक इच्छाशक्ति और एक स्पष्ट नीति के बिना नामुमकिन लगता है।
आरएसएस को सरकारी स्कूलों से बाहर रखने की मांग बिलकुल सही है लेकिन क्या ये मुम्किन है?
कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खड़गे ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पत्र लिखकर एक संवेदनशील और बहुस्तरीय मुद्दा उठाया है —उनका कहना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को राज्य के सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और मंदिरों जैसी सार्वजनिक संस्थाओं में अपने कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। खड़गे के अनुसार, आरएसएस की गतिविधियाँ “युवाओं के मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं और उन्हें एकतरफा वैचारिक दिशा में ढालने का प्रयास करती हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि अगर संघ अपने कार्यक्रम करना चाहता है, तो उसे निजी परिसरों या अपने स्वयं के संस्थानों में करना चाहिए — न कि सरकारी संसाधनों का उपयोग “सामूहिक ब्रेनवॉश” के लिए।
विवाद की जड़: एक वैचारिक टकराव
यह बयान किसी एक प्रशासनिक निर्णय का विरोध नहीं, बल्कि राज्य की वैचारिक दिशा पर टिप्पणी है। आरएसएस का शिक्षा संस्थानों में प्रवेश कोई नई बात नहीं है। कई राज्यों में — विशेषकर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र — संघ की शाखाएँ या सांस्कृतिक गतिविधियाँ सरकारी परिसरों में आयोजित होती रही हैं। प्रियांक खड़गे, जो कर्नाटक के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और मल्लिकार्जुन खड़गे के पुत्र हैं, ने यह सवाल उठाकर न केवल आरएसएस बल्कि भाजपा की राजनीतिक-सांस्कृतिक पहुँच पर भी सीधा प्रहार किया है।
खड़गे के तर्क: संविधान और लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित
खड़गे की यह मांग लोकतांत्रिक सिद्धांतों के लिहाज़ से काफी तर्कसंगत लगती है। भारत का संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि राज्य को किसी विशेष धार्मिक या वैचारिक संगठन का पक्ष नहीं लेना चाहिए। सरकारी स्कूल और कॉलेज साझा नागरिकता, समानता और तटस्थता के मूल्य पर आधारित संस्थान हैं —जहाँ किसी एक विचारधारा को विशेष स्थान देना संविधान की भावना के विपरीत है। सवाल यह भी है कि जब राज्य-स्वामित्व वाली भूमि, मंदिर या पुरातात्विक स्थल जनसंपत्ति हैं, तो वहाँ किसी एक विचारधारा को प्रचार का मंच क्यों मिले? यदि आरएसएस को यह अनुमति है, तो फिर किसी अन्य संगठन — चाहे वह वामपंथी हो या इस्लामिक या दलित आंदोलन से जुड़ा — को भी समान अवसर मिलना चाहिए। यह तर्क न्याय और समानता की दृष्टि से पूरी तरह उचित है।
व्यावहारिक चुनौती: क्या यह मांग लागू करना संभव है?
लेकिन क्या यह मांग व्यवहारिक रूप से संभव है? यही वह बिंदु है जहाँ मामला पेचीदा हो जाता है। आरएसएस भारत का कोई “पंजीकृत राजनीतिक दल” नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक संगठन के रूप में कार्य करता है। इसके कार्यकर्ता सरकारी अनुमति के बिना भी कई स्थानों पर योग, राष्ट्रगीत, या सेवा-कार्यक्रमों के नाम पर शाखाएँ चलाते हैं। व्यवहारिक रूप से सरकार को हर स्कूल या मंदिर के उपयोग की निगरानी करना प्रशासनिक रूप से अत्यंत कठिन है। इसके अलावा, संघ का नेटवर्क इतना व्यापक है कि वह स्थानीय समाज, शिक्षकों और ग्राम समितियों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज करवा लेता है। कर्नाटक जैसे बड़े राज्य में, जहाँ हजारों सरकारी स्कूल और कॉलेज हैं, वहां यह सुनिश्चित करना कि कोई “विचारधारात्मक गतिविधि” न हो, लगभग असंभव कार्य है।
कानूनी ढांचा: अनुच्छेद 28 और उसकी सीमाएं
संविधान का अनुच्छेद 28 सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा के निषेध की बात करता है। लेकिन यह “विचारधारात्मक शिक्षा” (ideological indoctrination) को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं करता। आरएसएस स्वयं को धार्मिक संस्था नहीं, बल्कि “सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी संगठन” बताता है —इसलिए कानूनी दृष्टि से उसका सरकारी स्कूलों में प्रवेश साफ़-साफ़ अवैध नहीं ठहराया जा सकता। दूसरी ओर, यदि सरकार विशेष आदेश जारी कर दे कि “कोई भी गैर-शैक्षणिक संगठन सरकारी परिसरों में राजनीतिक या विचारधारात्मक गतिविधियाँ नहीं करेगा”, तो यह एक समान नीति के रूप में लागू की जा सकती है। परन्तु ऐसा करना राजनीतिक जोखिम और विरोध का कारण बनेगा, खासकर भाजपा और संघ परिवार के बीच।
राजनीतिक पृष्ठभूमि: कांग्रेस की वैचारिक रणनीति
प्रियांक खड़गे का यह बयान कांग्रेस की उस “वैचारिक पुनर्स्थापना” की कोशिश का हिस्सा भी माना जा रहा है, जिसमें पार्टी आरएसएस के प्रभाव को “संवैधानिक राष्ट्रवाद” के विरुद्ध दिखाने की रणनीति अपनाती रही है। यह बयान आने वाले चुनावों के मद्देनज़र कर्नाटक में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है। जब उन्होंने सवाल किया — “अगर आरएसएस की विचारधारा इतनी अच्छी है, तो भाजपा नेताओं के बच्चे इसमें क्यों नहीं शामिल होते?” तो यह न सिर्फ व्यंग्य था, बल्कि उस राजनीतिक पाखंड पर भी टिप्पणी थी, जहाँ विचारधारा आम जनता के लिए प्रचारित की जाती है, पर खुद नेताओं के परिवार उससे दूर रहते हैं।
निष्कर्ष: सही मांग, मगर असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर
खड़गे की यह मांग लोकतांत्रिक दृष्टि से पूरी तरह जायज़ और तर्कपूर्ण है। सरकारी संस्थाएँ किसी भी विचारधारा की प्रयोगशाला नहीं बननी चाहिए। लेकिन व्यवहारिक दृष्टि से इसे लागू करना न तो आसान है, न त्वरित। संघ की जड़ें समाज के विभिन्न स्तरों तक फैली हैं — स्थानीय स्कूल समितियों, शिक्षकों और सांस्कृतिक मंचों तक। ऐसे में किसी एक आदेश से इसे पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। जरूरत इस बात की है कि सरकारें नीतिगत स्पष्टता अपनाएँ —या तो सभी विचारधाराओं को समान अवसर दें, या फिर किसी को नहीं। आधा-अधूरा नियंत्रण हमेशा विवाद और ध्रुवीकरण को जन्म देता है।
प्रियांक खड़गे का यह बयान भारत के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ढांचे की याद दिलाता है —कि शिक्षा का स्थान विचारधाराओं की नहीं, विवेक और वैज्ञानिक चेतना की भूमि होना चाहिए। उनकी मांग सही है, क्योंकि सरकारी संस्थानों का उपयोग किसी भी संगठन द्वारा “ब्रेनवॉश” के लिए नहीं होना चाहिए। लेकिन क्या इसे लागू किया जा सकता है? संभव तो है — पर तभी जब सरकारें संविधान के उस मूल विचार पर टिक सकें, जहाँ राज्य और विचारधारा के बीच एक स्पष्ट रेखा खींची गई हो।
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