बांग्लादेश के हिंदू, भारत के मुसलमान: मोहन भागवत की ‘चयनित चिंता’ का सच
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में कोलकाता में एक भाषण दिया, जिसमें उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता जताई। राजनीतिक उथल-पुथल के इस दौर में, उन्होंने बांग्लादेशी हिंदुओं से एकजुट रहने और भारत सरकार से हस्तक्षेप की अपील की।
सतही तौर पर, यह एक मानवीय और जरूरी हस्तक्षेप लगता है। किसी भी निर्दोष के साथ हिंसा, चाहे वह कहीं भी हो, निंदनीय है। लेकिन जैसे ही हम इस बयान के आसपास के राजनीतिक और नैतिक संदर्भ में जाते हैं, एक गंभीर और असहज सवाल उभरकर सामने आता है: क्या यह चिंता ‘चयनित’ है?
विदेश में आवाज, देश में चुप्पी: एक स्पष्ट विरोधाभास
भागवत का बांग्लादेश में एक हिंदू की हत्या पर बयान देना और न्याय की मांग करना निश्चित रूप से सही है। पर सवाल यह है कि 2014 के बाद से भारत में हुई सैकड़ों मोब लिंचिंग और सांप्रदायिक हत्याओं पर उनकी यही स्पष्ट, कठोर आवाज क्यों नहीं सुनाई देती?
गाय, धर्म या ‘लव जिहाद’ के नाम पर हुई इन हिंसक घटनाओं में पीड़ित ज्यादातर मुस्लिम अल्पसंख्यक रहे हैं। इनमें से कई मामलों में संगठित भीड़ शामिल थी। फिर भी, संघ के शीर्ष नेतृत्व की ओर से ऐसी कोई निरंतर और मुखर निंदा देखने को नहीं मिली, जो उनकी बांग्लादेश के प्रति ‘चिंता’ से मेल खाती हो।
हत्यारों का ‘सम्मान’ बनाम पीड़ितों का ‘इंसाफ’
मामला सिर्फ चुप्पी का नहीं, बल्कि सक्रिय विरोधाभास का है। झारखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मोब लिंचिंग के आरोपियों का खुलेआम सम्मान किया गया। उन्हें मालाएं पहनाई गईं, मंच दिए गए और राजनीतिक संरक्षण का संकेत मिला।
उत्तर प्रदेश का अखलाक मामला तो इस दोहरेपन की पराकाष्ठा है, जहां योगी आदित्यनाथ सरकार ने आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने का फैसला किया। एक तरफ विदेश में हिंदू की हत्या पर सख्त सजा की मांग, और दूसरी तरफ देश के भीतर एक मुस्लिम की हत्या के आरोपियों को राज्य का संरक्षण – यह विरोधाभास किसी नैतिक दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता।
क्या अल्पसंख्यक की परिभाषा ‘सीमा’ तय करती है?
भागवत का यह कहना कि “वे वहां अल्पसंख्यक हैं और स्थिति कठिन है,” एक और मूलभूत सवाल खड़ा करता है। क्या भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं हैं? क्या नागरिकता कानून (CAA-NRC), धर्म के आधार पर ‘डिटेंशन कैंप’ की चर्चा, और सरेआम नफरत भरे भाषणों ने यहां उनकी स्थिति कठिन नहीं बनाई है?
अगर संघ की चिंता वास्तव में अल्पसंख्यक सुरक्षा और मानवाधिकार है, तो वह चिंता सार्वभौमिक होनी चाहिए – धर्म और राष्ट्रीय सीमाओं से परे।
निष्कर्ष: राजनीति बनाम नैतिकता का द्वंद्व
मोहन भागवत ने बाबरी मस्जिद जैसे मुद्दों को ‘राजनीतिक साजिश’ बताकर धर्म को राजनीति से अलग रखने की बात की है। लेकिन क्या राम मंदिर आंदोलन, चुनावी भाषणों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, और बंगाल चुनाव में बांग्लादेश का मुद्दा उठाना भी इसी परिभाषा में आता है?
बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार की निंदा निस्संदेह जरूरी है। लेकिन नैतिकता तब खोखली हो जाती है जब वह चयनित हो। अगर संघ प्रमुख सच में मानवाधिकारों के पैरोकार हैं, तो उन्हें भारत के मुसलमानों, ईसाइयों और दलितों पर हो रहे हमलों के खिलाफ भी उतनी ही स्पष्ट आवाज उठानी चाहिए।
अन्यथा, यही धारणा और पुख्ता होगी कि यह चिंता इंसान की नहीं, बल्कि एक विशिष्ट धार्मिक पहचान की है – और यही किसी भी लोकतंत्र और समाज के सामूहिक विवेक के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
बता दें कि बांग्लादेश के मैमनसिंह ज़िले में एक हिंदू युवक दीपू चंद्र दास भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डाला जाता है, भीड़ का आरोप है कि उसने धर्म का अपमान किया था, ये 18 दिसंबर की घटना है लेकिन कल 23 दिसंबर को भागवत के बयान के बाद दिल्ली और नागपूर में विश्व हिंदू परिषद और दूसरे हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन-नारेबाज़ी और धक्का-मुक्की शुरू करदी। ये 18 दिसंबर की घटना है “तो फिर विरोध 23 दिसंबर को क्यों?”
18 दिसंबर से लेकर कल तक…दिल्ली में विश्व हिंदू परिषद और दूसरे हिंदू संगठन ख़ामोश क्यों थे? क्या दीपू चंद्र दास की हत्या पहले कम अहम थी? या फिर कल संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान के बाद अहेमियत बढ़ गयी ? लेकिन असली सवाल अब भी वहीं है… अगर मुद्दा हिंदू युवक की हत्या था…तो आवाज़ उठाने में पाँच दिन क्यों लगे? क्या इंसाफ़ की टाइमिंग बयानों से तय होती है? या फिर सियासत तय करती है कि ग़ुस्सा कब दिखाना है? आप बताइए… ये विरोध इंसाफ़ के लिए है…या बयान के बाद शुरू हुआ सियासी शोर?
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