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क्या क़ानून सिर्फ़ विपक्ष के लिए है और सत्ता पक्ष के लिए ‘माफी का परमिट’?

adminBy adminNovember 19, 2025 भारत No Comments5 Mins Read
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आज़म ख़ान
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यूपी की राजनीति, आज़म ख़ान और कानून के दोहरे मानदंड पर बड़ा सवाल

आज़म ख़ान: तीन दशक की सियासत और सत्ता से टक्कर की कीमत

उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज़म ख़ान कोई साधारण नाम नहीं हैं। वह तीन दशक से अधिक समय से सूबे की
सियासत के केंद्र में रहे और जितना उन्होंने सत्ता से टक्कर ली, उतना ही वे सत्ता की निगाह में खटकते भी गए।
अब एक बार फिर सिर्फ़ 55 दिन की राहत के बाद वह फिर से जेल में हैं। रामपुर की एमपी-एमएलए कोर्ट ने फर्ज़ी पैन
कार्ड प्रकरण में उन्हें और उनके बेटे अब्दुल्लाह आज़म को सात साल की सज़ा सुनाई। यह कहानी सिर्फ़ एक मामले
की नहीं है। यह कहानी उस सियासी समीकरण की है जिसमें एक तरफ़ राज्य की सत्ता है और दूसरी तरफ़ उसका
विरोध करने वाला एक ऐसा मुस्लिम नेता, जो खुलकर बोलने की कीमत कई सालों से चुका रहा है। सवाल यह है कि
क्या यूपी में क़ानून सबके लिए बराबर है?

आज़म ख़ान पर 100 से अधिक मुक़दमे दर्ज हैं, जिनमें कुछ बेहद गंभीर, तो
कुछ ऐसे कि सुनकर हैरानी होती है; जैसे ‘मुर्ग़ी चोरी’। लेकिन सवाल यह नहीं कि आज़म पर मुक़दमे क्यों हैं। सवाल
यह है कि उन्हीं कानूनों के बीच सत्ता पक्ष की कहानी क्या है?


एक कड़वा सच: क्या सत्ता में होने पर सब माफ़?

भाजपा सरकार, विशेषकर योगी आदित्यनाथ सरकार पर विपक्ष लंबे
समय से यह आरोप लगाता आया है कि वह कानून का इस्तेमाल चुनिंदा नेताओं के खिलाफ़ कर रही है, और दूसरी
तरफ़ सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों पर चल रहे गंभीर मुक़दमे वापस ले रही है। यह आरोप हवा में नहीं है, सूची मौजूद है।


योगी सरकार ने किन-किन मुक़दमों को वापस लिया?

कई भाजपा नेताओं-विधायक, सांसदों पर लगे दंगे, भड़काऊ
भाषण, बलवा, हमला, तोड़फोड़ तक के मुक़दमे वापस लिए गए। यहाँ तक कि अख़लाक़ की हत्या के आरोपीयों पर
दर्ज मुक़दमों को भी हटाने की कोशिशें जारी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं पर लगे 2007 के गोरखपुर दंगे से
जुड़े मामलों की फाइलों को वापस लेने की अनुशंसा सरकार पहले ही कर चुकी थी।

तो फिर सवाल लाजिमी है—
क्या क़ानून सिर्फ़ विपक्ष के लिए है और सत्ता पक्ष के लिए ‘माफी का परमिट’?

और दूसरी तरफ़ आज़म ख़ान पर लगातार
गिरफ्तारी, नई धाराएँ, नया मुक़दमा। सवाल यह नहीं कि आज़म ख़ान बेगुनाह हैं या गुनहगार। सवाल यह है कि क्या
उन्हें न्यायिक प्रक्रिया के नाम पर राजनीतिक प्रतिशोध का निशाना बनाया जा रहा है?

22 महीने जेल। फिर 23
महीने। फिर 55 दिन बाहर, और फिर जेल। 100+ मुक़दमे। छोटी-बड़ी हर शिकायत पर तुरंत एफआईआर। कोर्ट
परिसर से तुरंत गिरफ्तारी। क्या ये सामान्य प्रक्रिया है? या यह किसी खास राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा?

शरत
प्रधान जैसे वरिष्ठ विश्लेषक साफ़ कहते हैं “यह योगी का स्टाइल है। आज़म ख़ान मुस्लिम हैं, इसलिए उनसे विशेष
अदावत है।” वहीं भाजपा का तर्क है, “जैसी करनी वैसी भरनी।”


क्या प्रशासन संविधान पर चलेगा या ‘करनी-भरनी’ पर?

पर क्या प्रशासन और न्याय व्यवस्था ‘करनी-भरनी’ के तर्क पर चलती है, या संविधान पर?
क्या संविधान सत्ता के हिसाब से अलग-अलग चलता है?


यूपी में उभरता पैटर्न: क्या कानून चयनात्मक हो गया है?

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में जो पैटर्न दिखाई देता है, वह गंभीर सवाल खड़े करता है—

  1. क्या भाजपा नेताओं पर मुक़दमे लौटाना प्रशासनिक अधिकार है या सत्ता का दुरुपयोग?
  2. क्या विपक्ष के नेताओं, खासकर मुसलमानों पर लगातार मुक़दमे थोपना कानून का पालन है या राजनीतिक हथियार?
  3. क्या आज़म खान के खिलाफ़ चल रही कार्रवाइयाँ न्याय हैं या ‘संदेश’ कि सरकार के खिलाफ़ बोलोगे तो नतीजा यही होगा?
  4. क्या यूपी में कानून को ‘चयनात्मक’ तरीके से लागू किया जा रहा है?

आज़म ख़ान अकेले क्यों?

मायावती पर कई गंभीर आरोप लगे, आज वह बीजेपी से दूरी और नज़दीकी के बीच सुरक्षित हैं।
अखिलेश यादव बड़े विपक्षी नेता हैं, उनके मामले आगे नहीं बढ़ते।

लेकिन आज़म?
एक ऐसा नेता जिसकी पार्टी भी उसके साथ पूरी तरह नहीं खड़ी दिखती।

जैसा कि वरिष्ठ पत्रकार सैयद क़ासिम कहते हैं—
“अज़म और अन्य मुस्लिम नेताओं के साथ न बिरादरी है, न पार्टी।”

इस अकेलेपन ने उन्हें आसान निशाना बना दिया।
क्या यह न्याय है या सत्ता के सामने झुकने का संदेश?


कठोर शासन या चयनात्मक कठोरता?

योगी सरकार के आलोचक कहते हैं कि यह सिर्फ़ क़ानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि सियासी मैसेजिंग है।
एक संदेश विपक्ष को—टक्कर लोगे तो मुक़दमों में दबा दिए जाओगे।
और दूसरा संदेश समर्थकों को—देखिए, ‘कड़ा’ शासन यही है।

लेकिन लोकतंत्र में कठोरता और भेदभाव दो अलग चीज़ें हैं।
और कई बार कड़ाई के नाम पर भेदभाव छिपा दिया जाता है।


आख़िरी और सबसे बड़ा सवाल

जो आने वाले वर्षों तक यूपी की राजनीति को परेशान करेगा—

क्या वाकई आज़म ख़ान पर की जा रही कार्रवाई ‘कानून’ है या ‘सत्ता का बदला’?
क्या भाजपा के लिए सारे मामले माफ़ हैं, और विपक्ष के लिए छोटी बात भी अपराध?
क्या संविधान सत्ता के हिसाब से झुकने वाली किताब है या सबको बराबरी देने वाला सिद्धांत?

और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या कानून का यह ‘चयनात्मक उपयोग’ अपने आप में लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं?

इन सवालों का जवाब सिर्फ़ आज़म ख़ान के भविष्य को नहीं, बल्कि भारत में राजनीतिक न्याय की विश्वसनीयता को भी तय करेगा।

Also Read: शेख़ हसीना सज़ा पर बांग्लादेश की राजनीति में भूचाल और भारत की नीति में उठते गंभीर सवाल

Also Read: योगिराज में मुकदमे वापस लेने से पैदा हो रहा ‘जंगल राज’

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