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Home»विशेष

आरएसएस और ज़ायोनिज़्म: जुड़वां विचारधाराओं का रहस्य

adminBy adminOctober 4, 2025Updated:December 18, 2025 विशेष No Comments3 Mins Read
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image credit : deccanchronicle.com

केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने हाल ही में एक तीखा बयान देकर नई बहस छेड़ दी। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की तुलना इज़रायल में ज़ायोनिस्ट आंदोलन से करते हुए दोनों को “जुड़वां भाई” कहा। यह टिप्पणी महज़ एक राजनीतिक तंज नहीं बल्कि एक गहरी ऐतिहासिक और वैचारिक पड़ताल की ओर इशारा करती है। सवाल यह है कि विजयन की इस तुलना में कितना सच छिपा है और किन परतों को यह बयान उजागर करता है?

आरएसएस और ज़ायोनिस्ट आंदोलन: समानताओं की परतें

दोनों ही विचारधाराएँ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा पर खड़ी हैं। ज़ायोनिस्ट आंदोलन यहूदियों के लिए ‘एकमात्र यहूदी राज्य’ स्थापित करने की मांग से जन्मा। इसमें धर्म और जातीय पहचान को राज्य की नींव बनाया गया। आरएसएस हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना करता है, जहाँ भारतीय पहचान को हिंदुत्व की कसौटी से परिभाषित किया जाता है। इन दोनों आंदोलनों का साझा सूत्र है — ‘हम बनाम वे’ की मानसिकता। ज़ायोनिज़्म ने फ़िलिस्तीनियों को बाहरी और अवांछनीय बताकर हाशिए पर धकेला। आरएसएस पर भी आरोप है कि वह भारत में अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक मानने की सोच को बढ़ावा देता है।

औपनिवेशिक गठजोड़ और साज़िशें

इतिहास के पन्ने खोलने पर चौंकाने वाली समानताएँ दिखती हैं: ब्रिटिश साम्राज्य ने ज़ायोनिस्टों के साथ बैलफ़ोर डिक्लेरेशन (1917) के तहत साझेदारी की। भारत में भी औपनिवेशिक दौर में आरएसएस ने स्वतंत्रता संग्राम से दूरी बनाए रखी और अंग्रेज़ी हुकूमत से सीधे टकराव से बचा।

विजयन और वामपंथी नेताओं का आरोप यही है — ये दोनों विचारधाराएँ औपनिवेशिक शक्तियों की ‘बाँटो और राज करो’ नीति से पनपीं और आगे बढ़ीं।

गांधी और पैगंबर के ख़ून से दाग़दार इतिहास

ज़ायोनिस्ट आंदोलन ने दशकों तक फिलिस्तीन में हिंसा को हवा दी। लाखों लोग विस्थापित हुए, बस्तियाँ उजड़ीं, और आज भी ग़ज़ा इसकी सबसे भीषण तस्वीर है। आरएसएस पर महात्मा गांधी की हत्या की पृष्ठभूमि में नफ़रत फैलाने का आरोप है। सरदार पटेल ने तत्कालीन परिस्थितियों में संगठन पर प्रतिबंध लगाया था। इस नज़रिए से देखा जाए तो विजयन का ‘जुड़वां भाई’ वाला बयान एक प्रतीकात्मक चेतावनी बन जाता है।

राजनीति और वर्तमान परिदृश्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने पर स्मारक टिकट और सिक्का जारी करना सिर्फ़ औपचारिक आयोजन नहीं बल्कि एक वैचारिक वैधता का संकेत है। दूसरी ओर, वामपंथी और विपक्षी दल इसे लोकतांत्रिक भारत की आत्मा पर हमला बता रहे हैं। क्या यह संयोग है कि जिस समय पश्चिम एशिया में ज़ायोनिस्ट हिंसा और फ़िलिस्तीनी नरसंहार पर दुनिया स्तब्ध है, उसी समय भारत में आरएसएस के वैचारिक उत्सव को सरकारी मुहर दी जा रही है? या यह एक बड़े भू-राजनीतिक समीकरण की कड़ी है जहाँ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ताक़तें वैश्विक स्तर पर एक-दूसरे को मज़बूत कर रही हैं?

निचोड़

आरएसएस और ज़ायोनिस्ट आंदोलन के बीच सीधी वैचारिक समानताएँ और उनके ऐतिहासिक गठजोड़ के संकेत इस तुलना को हल्के में नहीं लिया जा सकता। पिनाराई विजयन का बयान महज़ राजनीतिक विरोध नहीं बल्कि एक गहरी वैचारिक चुनौती है — क्या भारत का भविष्य ‘बहुलता’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ पर टिका रहेगा या फिर एक ‘धार्मिक राष्ट्रवाद’ की ओर मुड़ जाएगा? यह सवाल केवल भारत का नहीं, पूरी दुनिया का है। क्योंकि जब भी ‘जुड़वां विचारधाराएँ’ जन्म लेती हैं, उनके प्रभाव से सीमाएँ टूटती हैं और इंसानियत की नींव हिल जाती है।

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