दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ छात्रों और युवाओं का आंदोलन भले ही सरकार के साथ बातचीत के बाद कुछ समय के लिए खत्म हो गया हो, लेकिन अब ऐसा लगता है कि इस आंदोलन की असली लड़ाई शायद अभी बाकी है। एक तरफ सरकार के साथ बातचीत के बाद आंदोलन वापस लेने वाली कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी अब आरोप लगा रही है कि समझौते की शर्तों का उल्लंघन किया जा रहा है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
दूसरी तरफ माकपा का आरोप है कि दिल्ली पुलिस छात्र नेता ओइशी घोष को गिरफ्तार करने के लिए पार्टी के मुख्यालय तक पहुंच गई। और तीसरी तरफ देश के अलग-अलग राज्यों से छात्रों और प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी, एफआईआर और पुलिस कार्रवाई की खबरें सामने आ रही हैं। अब सवाल यह है कि क्या सरकार और आंदोलनकारियों के बीच हुआ समझौता टूटने की कगार पर है? क्या आंदोलन वापस लेने के बाद भी छात्रों पर कार्रवाई जारी है? और अगर ऐसा है, तो क्या आने वाले दिनों में देश में एक बार फिर कोई बड़ा युवा आंदोलन खड़ा हो सकता है?
माकपा दफ्तर में पुलिस पहुंची, तो मचा सियासी तूफान
28 जुलाई को दिल्ली में उस समय राजनीतिक हलचल तेज हो गई जब आरोप लगा कि दिल्ली पुलिस छात्र नेता ओइशी घोष को हिरासत में लेने के लिए माकपा के केंद्रीय कार्यालय एकेजी भवन पहुंची। माकपा सांसद जॉन ब्रिटास ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि पुलिस के पास गिरफ्तारी का कोई विधिवत वारंट मौजूद नहीं था और कुछ पुलिस अधिकारी सादे कपड़ों में भी पहुंचे थे। माकपा ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया।
पार्टी के नेताओं का आरोप है कि ओइशी घोष ने छात्र आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई है और इसी वजह से उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल पुलिस से भी पूछा जाना चाहिए कि अगर पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने पहुंची थी, तो क्या उसके पास कानूनी आदेश था? अगर था, तो उसे दिखाया क्यों नहीं गया? अगर गिरफ्तारी की प्रक्रिया कानून के अनुसार थी, तो पुलिस को पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से करने में परेशानी क्यों होनी चाहिए?
और अगर पुलिस के पास पर्याप्त कानूनी आधार था, तो वह इसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं करती? दूसरी ओर पुलिस का अपना पक्ष भी सामने आना चाहिए, क्योंकि सिर्फ राजनीतिक आरोपों के आधार पर किसी कार्रवाई को गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता। लेकिन इतना जरूर है कि किसी राजनीतिक दल के कार्यालय में पुलिस की कार्रवाई सामान्य मामला नहीं होती। इसलिए इस घटना की पूरी सच्चाई सामने आना जरूरी है।
क्या यह सिर्फ गिरफ्तारी है या आंदोलन को डराने का संदेश?
माकपा नेताओं का आरोप है कि ओइशी घोष को गिरफ्तार करने की कोशिश दरअसल छात्र नेताओं को डराने का संदेश है। उनका कहना है कि सरकार यह संदेश देना चाहती है कि जो भी छात्र आंदोलन में आगे आएगा, उसके खिलाफ पुलिस कार्रवाई हो सकती है। अगर यह आरोप सही है, तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद गंभीर स्थिति होगी। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करने और शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार नागरिकों को प्राप्त है। सरकार से सवाल पूछना अपराध नहीं है।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग करना अपराध नहीं है।पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाना अपराध नहीं है। लेकिन अगर आंदोलन की आड़ में हिंसा होती है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचता है या कानून तोड़ा जाता है, तो पुलिस को कार्रवाई का अधिकार भी है। इसलिए असली सवाल यही है कि क्या पुलिस कार्रवाई कानून तोड़ने वालों के खिलाफ हो रही है या आंदोलन की आवाज उठाने वालों के खिलाफ? यही अंतर लोकतंत्र और दमन के बीच की सबसे महत्वपूर्ण रेखा है।
सीजेपी ने दी दोबारा आंदोलन की चेतावनी
सीजेपी ने साफ चेतावनी दी है कि अगर आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस नहीं ली गईं और गिरफ्तार छात्रों को रिहा नहीं किया गया, तो वह फिर से आंदोलन शुरू कर सकती है। यह बयान सरकार के लिए खतरे की घंटी हो सकता है। क्योंकि एक बार आंदोलन खत्म होने के बाद अगर सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच भरोसा कायम नहीं रहता, तो अगला आंदोलन पहले से ज्यादा बड़ा और आक्रामक हो सकता है। सीजेपी का दावा है कि उसने सरकार के आश्वासन के बाद आंदोलन स्थगित किया था।
अब संगठन का कहना है कि अगर सरकार अपने वादे से पीछे हटती है, तो यह सिर्फ एक संगठन के साथ धोखा नहीं होगा, बल्कि उन लाखों युवाओं के साथ विश्वासघात होगा जिन्होंने आंदोलन के बजाय बातचीत पर भरोसा किया। यही वह बिंदु है जहां से पूरा मामला गंभीर हो जाता है। क्योंकि आंदोलन को खत्म करना आसान है, लेकिन आंदोलनकारियों का भरोसा वापस हासिल करना मुश्किल।
बिहार, असम और पश्चिम बंगाल से आईं गिरफ्तारियों की खबरें
सीजेपी का दावा है कि बिहार, असम और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में आंदोलन से जुड़े छात्रों और युवाओं को गिरफ्तार किया गया या उनके खिलाफ मामले दर्ज किए गए। बिहार में सैकड़ों लोगों की गिरफ्तारी का दावा किया गया है। असम में तीन युवकों पर गंभीर धाराओं में मामला दर्ज होने की बात सामने आई है। पश्चिम बंगाल में प्रदर्शन के दौरान हिंसा के बाद कई लोगों को गिरफ्तार किए जाने की खबरें हैं।
इन मामलों में सरकार और पुलिस का तर्क यह हो सकता है कि कार्रवाई कानून-व्यवस्था बिगाड़ने वालों के खिलाफ की गई है। लेकिन यदि प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि शांतिपूर्ण आंदोलन करने वालों को भी निशाना बनाया जा रहा है, तो इसकी स्वतंत्र जांच करानी चाहिए। क्योंकि एक तरफ सरकार कहती है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है और दूसरी तरफ अगर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर भी मुकदमे दर्ज होते हैं, तो इससे सरकार की नीयत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पश्चिम बंगाल का मामला सबसे ज्यादा विवादित
पश्चिम बंगाल में प्रदर्शन के दौरान हिंसा के बाद गिरफ्तारियों का मामला भी विवादों में है। पुलिस का दावा है कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई और पुलिस पर हमला किया गया। वहीं कुछ संगठनों का आरोप है कि हिंसा भड़काने के लिए बाहरी या राजनीतिक तत्वों ने प्रदर्शन में घुसपैठ की। सबसे गंभीर आरोप उस कथित बयान को लेकर है जिसमें गिरफ्तार लोगों को लेकर धर्म आधारित संकेत देने का आरोप लगाया गया है।
अगर किसी कानून-व्यवस्था की घटना को धार्मिक पहचान के आधार पर देखा जाता है, तो यह बेहद खतरनाक प्रवृत्ति होगी। कानून की नजर में अपराधी की पहचान उसका धर्म नहीं, बल्कि उसका अपराध होना चाहिए। अगर किसी ने हिंसा की है, तो कार्रवाई हो। लेकिन अगर किसी को सिर्फ उसकी धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया जाता है, तो यह लोकतंत्र और कानून के शासन दोनों के लिए गंभीर खतरा है।
असम में युवाओं पर गंभीर धाराएं-क्या जरूरत से ज्यादा कार्रवाई?
असम से सामने आई खबर और भी चिंताजनक है। रिपोर्ट के मुताबिक तीन युवकों ने छात्र आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन करने के लिए एक व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया था और अनुमति के लिए पुलिस से संपर्क भी किया था। बाद में उन पर देश की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालने जैसी गंभीर धाराओं में मामला दर्ज होने का दावा किया गया।
अब सवाल उठता है कि क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित करने की कोशिश को देशद्रोह जैसी गंभीर मानसिकता से जोड़ना उचित है? अगर इन युवाओं पर वास्तव में हिंसा या अलगाववादी गतिविधियों का कोई ठोस सबूत है, तो कानून अपना काम करे। लेकिन अगर मामला सिर्फ शांतिपूर्ण प्रदर्शन का है, तो इतनी गंभीर धाराओं का इस्तेमाल सवाल जरूर खड़े करता है। कानून की धाराएं जितनी गंभीर होंगी, उतनी ही गंभीरता से उनके इस्तेमाल का औचित्य भी साबित करना होगा।
सबसे बड़ा सवाल कि क्या पुलिस अब असहमति की निगरानी करेगी? सीजेपी का आरोप है कि दिल्ली और दूसरे राज्यों में आंदोलन से जुड़े लोगों की निगरानी की जा रही है। यह दावा अगर सही है, तो लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है। किसी प्रदर्शनकारी पर नजर रखना और उसे अपराधी की तरह ट्रीट करना दो अलग-अलग बातें हैं।
पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन नागरिकों को सिर्फ इसलिए निशाना नहीं बनाया जा सकता क्योंकि उन्होंने सरकार की आलोचना की है। क्योंकि आज जिस सरकार के खिलाफ कोई प्रदर्शन कर रहा है, कल वही नागरिक किसी दूसरी सरकार के खिलाफ भी आवाज उठा सकता है। लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन नागरिकों के अधिकार स्थायी होने चाहिए।
ओइशी घोष की गिरफ्तारी से लेकर जुनैद के परिवार तक -क्या डर का माहौल बनाया जा रहा है?
गाजियाबाद में सीजेपी के वालंटियर मोहम्मद जुनैद के परिवार को हिरासत में लिए जाने की खबर भी सामने आई। बाद में बताया गया कि परिवार सुरक्षित है और हिरासत में नहीं है। अगर पुलिस किसी व्यक्ति की तलाश में उसके परिवार को हिरासत में लेती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह कानून के मुताबिक था?
किसी आरोपी के परिवार को सिर्फ रिश्तेदारी की वजह से परेशान करना कानून और न्याय की भावना के खिलाफ माना जाएगा। अगर पुलिस के पास किसी व्यक्ति के खिलाफ मामला है, तो उसे कानून के मुताबिक गिरफ्तार करे और अदालत के सामने पेश करे। लेकिन परिवार को दबाव में लेकर किसी आरोपी को पकड़ने की कोशिश लोकतंत्र में स्वीकार नहीं की जा सकती।
अब लड़ाई सिर्फ पेपर लीक की नहीं रही
यह पूरा आंदोलन जिस मुद्दे से शुरू हुआ था, वह था शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा में गड़बड़ी और पेपर लीक। लेकिन अब मामला उससे बहुत आगे निकल चुका है।अब सवाल है कि क्या छात्र आंदोलन कर सकते हैं? क्या सरकार से सवाल पूछ सकते हैं? क्या पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र जांच होगी? क्या प्रदर्शनकारियों पर दर्ज एफआईआर वापस होंगी? क्या गिरफ्तार छात्रों को रिहा किया जाएगा? क्या आंदोलनकारियों और सरकार के बीच हुआ कथित समझौता लागू होगा? और सबसे बड़ा सवाल कि क्या सरकार अपने आलोचकों को लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देगी या पुलिस और कानून का इस्तेमाल करके उन्हें चुप कराने की कोशिश होगी?
सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा-युवा अगर भरोसा खो दें
सरकार के पास अभी भी मौका है। अगर उसके पास प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई के ठोस कारण हैं, तो वह उन्हें सार्वजनिक करे। अगर पुलिस ने कानून के मुताबिक कार्रवाई की है, तो जांच में वह साबित हो जाएगा। अगर किसी अधिकारी ने नियमों का उल्लंघन किया है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन अगर सरकार हर सवाल को राजनीतिक साजिश कहकर खारिज करेगी और हर आंदोलनकारी को अपराधी समझेगी, तो इससे समस्या खत्म नहीं होगी। बल्कि युवाओं में यह भावना मजबूत होगी कि सत्ता सवाल सुनना नहीं चाहती। और इतिहास गवाह है कि जब युवा व्यवस्था पर भरोसा खो देते हैं, तो छोटे-छोटे मुद्दे भी बड़े आंदोलनों में बदल जाते हैं।
अंतिम सवाल कि क्या अब फिर सड़कों पर उतरेंगे छात्र?
फिलहाल सीजेपी ने आंदोलन वापस लिया है। लेकिन उसकी चेतावनी साफ है कि अगर एफआईआर वापस नहीं हुईं, गिरफ्तारियां बंद नहीं हुईं और आंदोलनकारियों पर कार्रवाई जारी रही, तो आंदोलन दोबारा शुरू हो सकता है। दूसरी तरफ छात्र नेता ओइशी घोष को लेकर माकपा और वामपंथी संगठनों का आरोप है कि सरकार आंदोलन की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है।
अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस पूरे मामले को राजनीतिक टकराव बनने से कैसे रोकती है। क्योंकि आज मामला एक छात्र नेता का है। कल मामला हजारों छात्रों का हो सकता है। आज एक एफआईआर है। कल सैकड़ों एफआईआर हो सकती हैं। आज एक आंदोलन की चेतावनी है। कल देशव्यापी आंदोलन की वापसी हो सकती है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि ओइशी घोष को गिरफ्तार किया जाएगा या नहीं। सवाल यह है कि क्या भारत का लोकतंत्र अपने युवाओं की आवाज सुनने के लिए तैयार है?
क्योंकि जिस दिन युवाओं को यह भरोसा हो गया कि उनकी आवाज संसद में नहीं सुनी जाएगी और सड़क पर आवाज़ उठाने पर पुलिस कार्रवाई होगी, उस दिन समस्या सिर्फ एक सरकार की नहीं रहेगी। उस दिन सवाल पूरे लोकतंत्र से पूछा जाएगा कि क्या इस देश में सरकार से सवाल पूछना अभी भी नागरिक का अधिकार है? और अगर जवाब ‘हां’ है, तो फिर सवाल पूछने वाले छात्रों को डर किस बात का?
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