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Home»भारत

निजी संपत्ति में धार्मिक प्रार्थना के लिए अनुमति की ज़रूरत नहीं-अदालत

adminBy adminFebruary 11, 2026 भारत No Comments3 Mins Read
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह स्पष्ट कहना कि निजी संपत्ति में धार्मिक प्रार्थना सभा के लिए किसी अनुमति की ज़रूरत नहीं, संविधान के अनुच्छेद 25 की मूल भावना को दोहराता है। अदालत ने यह याद दिलाया कि धर्म का पालन करना नागरिक का मौलिक अधिकार है, और जब तक वह निजी परिसर की सीमा में है, तब तक राज्य को उसमें दख़ल देने का कोई वैधानिक आधार नहीं है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

यह फ़ैसला ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश समेत कई भाजपाई राज्यों में धार्मिक गतिविधियों ख़ासकर अल्पसंख्यक समुदायों की प्रार्थनाओं को लेकर पुलिस हस्तक्षेप की ख़बरें लगातार सामने आ रही हैं। अदालत का यह कहना कि “क़ानून में अनुमति लेने का कोई प्रावधान ही नहीं है”, दरअसल प्रशासनिक ज़मीन पर पनप चुकी एक ग़लत परंपरा पर सीधा प्रहार है।

फ़ैसले की पृष्ठभूमि में बरेली की वह घटना भी है, जहाँ खाली पड़े निजी मकान में नमाज़ पढ़ने के आरोप में लोगों को हिरासत में लिया गया।

बरेली की घटना और दोहरा पैमाना

फ़ैसले की पृष्ठभूमि में बरेली की वह घटना भी है, जहाँ खाली पड़े निजी मकान में नमाज़ पढ़ने के आरोप में लोगों को हिरासत में लिया गया। जबकि मकान मालकिन स्वयं यह कह चुकी थीं कि उन्होंने अनुमति दी थी। यह सवाल उठना लाज़मी है कि अगर निजी संपत्ति में प्रार्थना करना ग़ैरक़ानूनी नहीं है, तो फिर हिरासत किस आधार पर? यहीं से दोहरे मापदंड की बहस शुरू होती है।

सार्वजनिक आस्था और चयनात्मक सख़्ती

भारत में यह कोई छुपी हुई सच्चाई नहीं है कि हिंदू धार्मिक गतिविधियाँ अक्सर सार्वजनिक स्थानों और यहाँ तक कि सरकारी ज़मीनों पर भी बिना रोक-टोक होती रही हैं। सड़कों पर पूजा-पाठ। चौराहों पर अस्थायी मंदिर। सरकारी ज़मीन पर धार्मिक प्रतीक और यहाँ तक कि सरकारी दफ़्तरों में देवी-देवताओं की तस्वीरें और मूर्तियाँ, इन सब पर न तो पुलिस सवाल करती है, न प्रशासन अनुमति मांगता है, और न ही कभी “क़ानून-व्यवस्था” का हवाला दिया जाता है। इसके उलट, जब बात नमाज़ या ईसाई प्रार्थना सभा की आती है वह भी निजी परिसर के भीतर तो अचानक अनुमति, दस्तावेज़ और पूछताछ ज़रूरी हो जाती है। यही वह बिंदु है जहाँ यह फ़ैसला केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और संवैधानिक चेतावनी बन जाता है।

संविधान सबके लिए, या कुछ के लिए?

हाईकोर्ट ने साफ़ कहा कि राज्य सभी नागरिकों को बिना धर्म के आधार पर भेदभाव किए समान संरक्षण देता है। यह कथन काग़ज़ पर तो मज़बूत है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे टकराती नज़र आती है। अगर संविधान का अनुच्छेद 25 सचमुच सबके लिए बराबर है, तो फिर निजी घर में नमाज़ पर सवाल क्यों? निजी हॉल में प्रार्थना सभा पर शक क्यों? और सार्वजनिक जगहों पर बहुसंख्यक धार्मिक गतिविधियों पर ख़ामोशी क्यों?

अदालत ने जो कहा, प्रशासन को उसे मानना होगा

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फ़ैसला दरअसल प्रशासन को यह याद दिलाने के लिए काफ़ी है कि आस्था अपराध नहीं है, और निजी आस्था तो बिल्कुल भी नहीं। अगर राज्य वाक़ई धर्मनिरपेक्ष है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि क़ानून सबके लिए समान हो, अनुमति का नियम चयनात्मक न हो और धार्मिक स्वतंत्रता केवल किताबों में नहीं, ज़मीन पर भी दिखे, वरना हर ऐसा फ़ैसला, चाहे वह कितना ही स्पष्ट क्यों न हो, सिर्फ़ फ़ाइलों में दर्ज होकर रह जाएगा और सड़कों पर दोहरा पैमाना चलता रहेगा।

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