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Home»भारत

 किताबों पर संभावित 20 साल की रोक का अर्थ ‘कूलिंग-ऑफ’ या ‘कूलिंग-डाउन’ लोकतंत्र?

adminBy adminFebruary 27, 2026 भारत No Comments4 Mins Read
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पूर्व थलसेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा को लेकर उठे विवाद के बाद केंद्र सरकार द्वारा सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारियों—विशेषकर सैन्य नेतृत्व—के लिए किताब लिखने पर 20 वर्ष की “कूलिंग-ऑफ” अवधि लागू करने पर विचार, केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं है; यह राज्य, सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन का बड़ा सवाल बन गया है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

पृष्ठभूमि: संवेदनशील घटनाएँ, सार्वजनिक विमर्श

विवाद का केंद्र 2020 के पूर्वी लद्दाख गतिरोध- विशेषकर पैंगोंग त्सो और कैलाश रेंज से जुड़ी टिप्पणियाँ बताई जाती हैं। सरकार का तर्क सुरक्षा-संवेदनशील सूचनाओं की रक्षा और संस्थागत गोपनीयता बनाए रखना है; समर्थक कहते हैं कि उच्च पदों पर रहे व्यक्तियों के संस्मरण कभी-कभी रणनीतिक हितों को प्रभावित कर सकते हैं। यह तर्क अपने आप में असंगत नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों में भी पूर्व अधिकारियों की रचनाओं पर प्री-पब्लिकेशन रिव्यू या सीमित समय तक गोपनीयता के नियम होते हैं। लेकिन 20 साल? सुरक्षा बनाम स्वतंत्रता की रेखा कहाँ है? यहाँ असली बहस अवधि और व्यापकता को लेकर है।

आलोचनात्मक दृष्टि

यदि कोई सरकार, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार अगर सेवानिवृत्त अधिकारियों पर दो दशक की रोक लगाती है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या यह कदम सुरक्षा के नाम पर आलोचनात्मक या असुविधाजनक कथनों को टालने का तरीका तो नहीं? भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, यद्यपि “यथोचित प्रतिबंधों” के साथ।

लेकिन लोकतंत्र में प्रतिबंध का परीक्षण तीन कसौटियों पर होता है:

1. आवश्यकता: क्या बिना इतने लंबे प्रतिबंध के सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकती?

2. अनुपातिकता: क्या 20 वर्ष का समय सीमा से अधिक कठोर नहीं?

3. न्यायिक समीक्षा: क्या प्रतिबंध पारदर्शी और अपील योग्य होगा? यदि इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर नहीं मिलते, तो आशंका बढ़ती है कि नीति सुरक्षा से अधिक विमर्श को नियंत्रित करने का औज़ार बन सकती है।

संस्थागत गोपनीयता बनाम ऐतिहासिक जवाबदेही

सेना और सुरक्षा तंत्र की गोपनीयता आवश्यक है। पर उतना ही आवश्यक है कि राष्ट्र अपने इतिहास को जाने- निर्णयों, भूलों और सबक़ों सहित। दुनिया भर में कई महत्वपूर्ण सैन्य संस्मरण दशकों बाद प्रकाशित हुए और उन्होंने नीति-निर्माण को बेहतर बनाया। यदि पूर्व अधिकारी अपने अनुभव दर्ज नहीं कर पाएँगे, तो: संस्थागत स्मृति कमजोर होगी। सार्वजनिक जवाबदेही सीमित होगी। इतिहास का दस्तावेज़ीकरण अधूरा रहेगा। लोकतंत्र में राज्य केवल शक्ति का नहीं, स्मृति का भी संरक्षक होता है।

क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक है?

कानूनी दृष्टि से सरकार कह सकती है कि यह “उचित प्रतिबंध” है, राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में। पर राजनीतिक और नैतिक दृष्टि से यह धारणा बन सकती है कि असुविधाजनक कथनों को टालने के लिए समय की दीवार खड़ी की जा रही है। सार्वजनिक बहस को ठंडा करने के लिए “कूलिंग-ऑफ” का इस्तेमाल हो रहा है। यही वह बिंदु है जहाँ नीति की नियत से अधिक उसकी धारणा लोकतांत्रिक विश्वास को प्रभावित करती है।

संतुलित रास्ता क्या हो सकता है?

यदि उद्देश्य सचमुच सुरक्षा है, तो कुछ मध्यमार्गी विकल्प भी संभव हैं: प्री-पब्लिकेशन रिव्यू: संवेदनशील अंशों की पहचान और संपादन। सीमित अवधि: 3–5 वर्ष जैसी अनुपातिक समयसीमा। स्पष्ट दिशानिर्देश: क्या निषिद्ध है, क्या स्वीकार्य। स्वतंत्र अपील तंत्र: लेखक को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार।

ऐसे उपाय सुरक्षा भी बचाते हैं और अभिव्यक्ति का गला भी नहीं घोंटते।

सुरक्षा और स्वतंत्रता- दोनों की रक्षा

यदि प्रस्तावित नीति लागू होती है, तो सरकार के लिए चुनौती केवल नियम बनाना नहीं, विश्वास बनाए रखना होगी।

राष्ट्र की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, पर लोकतंत्र की आत्मा स्वतंत्र अभिव्यक्ति से ही जीवित रहती है। जब राज्य अपने पूर्व सेवकों की कलम पर लंबी रोक लगाने पर विचार करे, तो उसे यह भी दिखाना होगा कि यह कदम ज़रूरी, अनुपातिक और पारदर्शी है वरना यह सवाल बार-बार उठेगा कि क्या यह सुरक्षा की ढाल है, या असहमति से बचने की दीवार?   

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