क्या यह सचमुच देश का सबसे बेहतरीन एयरपोर्ट है… या फिर सर्वे के पैमाने ही ज़मीनी हकीकत से कट चुके हैं? भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) ने अपने ग्राहक संतुष्टि सूचकांक में मध्य प्रदेश के खजुराहो एयरपोर्ट को देश का सर्वश्रेष्ठ एयरपोर्ट घोषित किया है। लेकिन जैसे ही यह खबर सामने आई, लोगों के मन में एक ही सवाल उठा कि जिस एयरपोर्ट से आज एक भी कमर्शियल फ्लाइट नहीं उड़ रही, वह आखिर देश का नंबर-1 एयरपोर्ट कैसे बन गया? यही सवाल अब पूरे देश में चर्चा का विषय बन चुका है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
यात्री नहीं… फिर ग्राहक संतुष्टि किसकी?
एएआई के मुताबिक यह रैंकिंग यात्रियों की प्रतिक्रिया के आधार पर तैयार की जाती है। इसमें साफ-सफाई, वाई-फाई, पार्किंग, स्टाफ का व्यवहार, भोजन, हाइजीन और अन्य सुविधाओं जैसे 33 मानकों पर अंक दिए जाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि-जब जुलाई और अगस्त में वहां से एक भी नियमित कमर्शियल उड़ान नहीं चली, तब इतने यात्री आए कहां से, जिनकी संतुष्टि मापी गई?
अगर यात्री ही नहीं हैं, तो ग्राहक संतुष्टि का आधार क्या है? क्या सर्वे का तरीका बदलने की जरूरत है? संभव है कि सर्वे अपने तय नियमों के अनुसार किया गया हो और कम संख्या में आने वाले यात्रियों ने सुविधाओं को बेहतर अंक दिए हों। लेकिन क्या केवल साफ-सफाई और खाली टर्मिनल किसी एयरपोर्ट को देश का सर्वश्रेष्ठ बना सकते हैं? क्या किसी एयरपोर्ट की असली पहचान उसकी कनेक्टिविटी, उड़ानों की संख्या, यात्रियों की सुविधा और क्षेत्र के विकास में उसकी भूमिका से नहीं होनी चाहिए? अगर किसी एयरपोर्ट से उड़ानें ही बंद हो जाएं और फिर भी वह नंबर-1 घोषित हो जाए, तो आम लोगों का सवाल उठाना स्वाभाविक है।
खाली एयरपोर्ट… लेकिन नंबर-वन का तमगा
खजुराहो एक विश्वप्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। अगर वहां नियमित उड़ानें ही नहीं होंगी, तो पर्यटन कैसे बढ़ेगा? व्यापार कैसे बढ़ेगा?स्थानीय लोगों को सुविधा कैसे मिलेगी? किसी भी एयरपोर्ट का उद्देश्य केवल चमकदार टर्मिनल बनाना नहीं होता, बल्कि लोगों को जोड़ना होता है। अगर रनवे पर विमान नहीं उतर रहे, तो केवल इमारत की खूबसूरती से जनता को क्या लाभ मिलेगा?
कागज़ी उपलब्धियां या ज़मीनी सच्चाई?
आज देश में कई ऐसे एयरपोर्ट हैं जहाँ रोज़ सैकड़ों उड़ानें संचालित होती हैं। लाखों यात्री सफर करते हैं। भीड़ होती है। दबाव होता है। ऐसे एयरपोर्ट अगर दूसरे या तीसरे स्थान पर रहें और एक ऐसा एयरपोर्ट पहले नंबर पर आ जाए जहाँ फिलहाल कोई उड़ान ही नहीं है, तो सर्वे की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यही वजह है कि एविएशन विशेषज्ञ भी अब यह चर्चा कर रहे हैं कि ग्राहक संतुष्टि के साथ-साथ उड़ानों की उपलब्धता, यात्री संख्या, समयपालन, कनेक्टिविटी और वास्तविक उपयोग जैसे मानकों को भी पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए।
सरकार और एएआई को जवाब देना चाहिए
इस पूरे विवाद के बाद कुछ सवालों का जवाब मिलना चाहिए-सर्वे किस अवधि में किया गया? उस समय एयरपोर्ट पर कितने यात्रियों से प्रतिक्रिया ली गई? जब नियमित उड़ानें बंद हैं, तब सर्वे का आधार क्या था? क्या भविष्य में रैंकिंग के मानकों में बदलाव किया जाएगा? पारदर्शिता किसी भी सरकारी सर्वे की सबसे बड़ी ताकत होती है। अगर प्रक्रिया स्पष्ट होगी, तो विवाद अपने आप खत्म हो जाएंगे।
अंतिम सवाल
देश को चमकदार रिपोर्ट चाहिए… या ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें एयरपोर्ट वास्तव में लोगों की यात्रा आसान बनाएं? नंबर-1 का तमगा तभी सार्थक है, जब वहां यात्रियों की आवाजाही हो, उड़ानें नियमित हों और जनता को वास्तविक सुविधा मिले। वरना यह सवाल बार-बार उठेगा कि क्या भारत में अब खाली एयरपोर्ट भी देश के सबसे बेहतरीन एयरपोर्ट बन सकते हैं? और अगर जवाब “हाँ” है, तो फिर रैंकिंग का असली मतलब क्या रह जाता है?
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