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Home»भारत

 इंसाफ़ की तलाश में पीड़ित कहाँ जाए?

adminBy adminFebruary 25, 2026 भारत No Comments4 Mins Read
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भारत की संवैधानिक व्यवस्था में सर्वोच्च न्याय की उम्मीद जिस संस्था से की जाती है, वही जब किसी याचिका पर सीधे सुनवाई से इनकार कर दे, तो बहस केवल एक मामले की नहीं रहती बल्कि वह न्याय तक पहुँच की प्रकृति पर प्रश्न बन जाती है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा के कथित नफ़रती बयानों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को पहले गौहाटी हाईकोर्ट जाने को कहा।

अदालत का तर्क था कि सीधे सर्वोच्च अदालत आना उच्च न्यायालयों की भूमिका को कमज़ोर करता है और संवैधानिक ढाँचे में तय प्रक्रिया का पालन ज़रूरी है। कानूनी दृष्टि से यह निर्णय प्रक्रिया-सम्मत माना जा सकता है। लेकिन सामाजिक दृष्टि से एक बड़ा सवाल उठ खड़ा होता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

जब न्याय का रास्ता संस्थागत हो, मगर पीड़ा तात्कालिक हो

याचिकाओं में आरोप था कि सत्ता में बैठे व्यक्ति के बयानों ने एक समुदाय के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार को बढ़ावा दिया। यदि कोई पीड़ित यह महसूस करे कि राज्य-तंत्र ही उसके ख़िलाफ़ खड़ा है, तो वह स्वाभाविक रूप से सर्वोच्च न्यायालय की शरण लेना चाहता है क्योंकि वही संविधान का अंतिम रक्षक माना जाता है। यहाँ अदालत ने कहा: पहले हाईकोर्ट जाओ। व्यवस्था कहती है: प्रक्रिया का पालन करो। लेकिन पीड़ित पूछता है: समय किसके पास है? न्याय केवल वैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि विश्वास की संरचना भी है। और विश्वास तब बनता है जब पीड़ित को लगे कि उसकी आवाज़ सुनी जा रही है।

संविधान का अधिकार बनाम न्याय तक पहुँच

अनुच्छेद 32 को डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान की “आत्मा” कहा था, क्योंकि यह नागरिक को सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। अदालत ने इस अधिकार को नकारा नहीं, बल्कि कहा कि पहले वैकल्पिक मंच उपलब्ध है। यहाँ दो दृष्टिकोण आमने-सामने हैं: संस्थागत संतुलन: हर मामला सीधे सर्वोच्च अदालत न आए।

तात्कालिक सुरक्षा: जब अधिकारों का सवाल हो, तब तुरंत सुनवाई हो। समस्या तब पैदा होती है जब अधिकार का उल्लंघन महसूस करने वाला व्यक्ति प्रक्रिया को लंबी और असुरक्षित मानता है।

न्याय की सीढ़ियाँ और असमान वास्तविकता

कागज़ पर न्याय की सीढ़ियाँ स्पष्ट हैं- निचली अदालत, हाईकोर्ट, फिर सर्वोच्च अदालत।

लेकिन ज़मीनी सच्चाई अलग है: मुक़दमे महंगे होते हैं। प्रक्रिया लंबी होती है। राज्य बनाम नागरिक की शक्ति असमान होती है। ऐसी स्थिति में सर्वोच्च अदालत केवल न्यायालय नहीं, बल्कि आशा का प्रतीक बन जाती है। इसीलिए यह प्रश्न भावनात्मक भी है और संवैधानिक भी: यदि पीड़ित को लगे कि राज्य तटस्थ नहीं है। यदि उसे लगे कि स्थानीय व्यवस्था प्रभावी नहीं है। और यदि सर्वोच्च अदालत भी प्रक्रिया का हवाला देकर सीधे हस्तक्षेप न करे तो वह न्याय की उम्मीद किससे करे?

संस्थाओं पर विश्वास बनाम संस्थाओं की जवाबदेही

अदालत ने उच्च न्यायालयों के मनोबल की बात कही, यह संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लेकिन लोकतंत्र का दूसरा सिद्धांत भी उतना ही महत्वपूर्ण है: न्याय केवल होना नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। जब समाज का एक वर्ग असुरक्षित महसूस करता है, तब न्यायिक संस्थाओं की संवेदनशीलता उतनी ही आवश्यक होती है जितनी उनकी प्रक्रियात्मक शुचिता।

असली सवाल: न्याय की अंतिम शरण कौन?

भारत का संविधान कहता है कि हर नागरिक समान है। लोकतंत्र कहता है कि हर आवाज़ सुनी जाएगी। न्यायपालिका कहती है कि हर अधिकार संरक्षित है। लेकिन जब पीड़ित पूछता है -“अगर सर्वोच्च न्यायालय भी तुरंत नहीं सुने, तो हम कहाँ जाएँ?” तो यह सवाल अदालत से अधिक व्यवस्था की विश्वसनीयता का बन जाता है। न्याय का मार्ग बंद नहीं हुआ है।

परंतु जब रास्ता लंबा, कठिन और भय से भरा लगे, तब व्यवस्था को केवल प्रक्रिया नहीं, भरोसा भी देना पड़ता है।

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