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बुलडोज़र बाबा ने संभल की 30 साल पुराणी मस्जिद को मलबे में बदल दिया

adminBy adminOctober 17, 2025 भारत No Comments3 Mins Read
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बुलडोज़र बाबा
बुलडोज़र बाबा
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बुलडोज़र बाबा ने संभल की 30 साल पुराणी मस्जिद को मलबे में बदल दिया

1. संभल की घटना: एक अलग-थलग मामला नहीं
उत्तर प्रदेश के संभल ज़िले में 30 साल पुरानी एक मस्जिद को प्रशासन ने “अवैध निर्माण” बताकर गिरा दिया। यह घटना कोई अलग-थलग मामला नहीं, बल्कि उस लंबी श्रृंखला की कड़ी है जिसमें बीते कुछ वर्षों से बुलडोज़र सत्ता का प्रतीक बन गया है — कभी गरीबों के मकानों पर, तो कभी मुसलमानों के धार्मिक स्थलों पर।

2. कानून या सत्ता का प्रदर्शन?
अधिकारियों का कहना है कि मस्जिद सार्वजनिक पार्क की ज़मीन पर बनी थी और न्यायालय के आदेश के तहत उसे ढहाया गया। लेकिन सवाल यह है कि यदि यह निर्माण वाक़ई अवैध था, तो तीन दशक तक प्रशासन ने आंखें क्यों मूंद रखीं? और अचानक अब, जब पास में “कल्कि धाम मंदिर” परियोजना निर्माणाधीन है, तब यह कार्रवाई क्यों तेज़ हुई?

यह समय, स्थान और राजनीतिक माहौल — तीनों ही संकेत देते हैं कि कार्रवाई केवल भूमि विवाद का मसला नहीं है, बल्कि यह धर्म और सत्ता के गठजोड़ का एक स्पष्ट उदाहरण बन चुकी है।

3. बुलडोज़र का नया राजनीतिक प्रतीक
जब से भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई है, बुलडोज़र सिर्फ़ निर्माण तोड़ने का औज़ार नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रतीक बन चुका है — “कठोर शासन”, “कानून व्यवस्था” और “मुसलमान विरोधी दृढ़ता” का प्रतीक। राज्य सरकारों के अनेक उदाहरण दिखाते हैं कि बुलडोज़र ज्यादातर उन बस्तियों, घरों या मस्जिदों पर चला है जो सामाजिक रूप से कमजोर या अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े हैं।

4. धर्म के नाम पर नाइंसाफी
भारत की 75 साल की आज़ादी के इतिहास में शायद ही कभी धर्म के नाम पर इतनी खुली प्रशासनिक सख्ती देखी गई हो। मंदिर-मस्जिद विवादों को सुलझाने की बजाय, सत्ता ने उन्हें और गहराने का काम किया है।

आज हालात यह हैं कि धार्मिक पहचान ही किसी नागरिक के अधिकार और सुरक्षा का पैमाना बनती जा रही है। “कल्कि धाम” जैसे विशाल प्रोजेक्ट्स को सरकारी संरक्षण मिलता है, जबकि उनके पास मौजूद पुराने धार्मिक ढाँचे “अतिक्रमण” घोषित कर दिए जाते हैं।

5. भगवा वस्त्रों के पीछे की राजनीति
दुखद यह है कि यह सब उस दौर में हो रहा है जब कई तथाकथित साधु-संत राजनीति के खुले मंचों पर सत्ता के प्रवक्ता बन गए हैं। जिनके वचन करुणा और शांति के प्रतीक होने चाहिए, वे अब नफ़रत और विभाजन की भाषा बोल रहे हैं। धर्म का यह राजनीतिक रूप न केवल संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को चुनौती देता है, बल्कि समाज के ताने-बाने को भी खतरनाक रूप से तोड़ता है।

6. एक लोकतांत्रिक प्रश्न
संभल की यह घटना सिर्फ़ एक मस्जिद गिराए जाने की नहीं, बल्कि एक बड़े लोकतांत्रिक सवाल की है — क्या कानून सबके लिए बराबर है?

यदि सरकारें बुलडोज़र को न्याय का विकल्प बना देंगी, तो अदालतों, संविधान और नागरिक अधिकारों का क्या अर्थ रह जाएगा?

7. निष्कर्ष: सिर्फ मस्जिद नहीं, आस्था और विश्वास का सवाल
संभल की मलबे में दबी वह “छोटी मस्जिद” सिर्फ़ ईंट-पत्थर का ढाँचा नहीं थी — वह एक इतिहास, एक समुदाय की आस्था और उस देश की आत्मा की गवाही थी, जिसने हमेशा “सबका साथ, सबका विश्वास” का सपना देखा था।

लेकिन जब सत्ता उस विश्वास को ही तोड़ने लगती है, तो सवाल सिर्फ़ मुसलमानों का नहीं, बल्कि पूरे भारत के लोकतंत्र का हो जाता है।

Also read: ट्रंप के बयान से मची कूटनीतिक हलचल : क्या भारत रूस से तेल खरीदना वाकई बंद करेगा?

अल्पसंख्यक अवैध निर्माण कल्कि धाम धर्मनिरपेक्षता न्याय बुलडोजर भाजपा यूपी सरकार संभल मस्जिद
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