जाकिर कुरैशी की हत्या महज़ “पशु चोरी” के शक पर नहीं हुई। “उसे मियां कहा गया।” यही इस हिंसा की असली वजह है। यह धर्म के नाम पर जान लेने की मानसिकता है। 50–60 हिन्दू गुंडों की भीड़ ने उसके हाथ बांधे, पीठ और पैरों की हड्डियाँ तोड़ दीं — यह हत्या है, दुर्घटना नहीं।
न्याय कहाँ है?:- सिर्फ दो गिरफ्तारियाँ — और मुख्य आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं। यह “लॉ एंड ऑर्डर” का मसला नहीं है, यह राज्य की चुप्पी से पोषित नफरत है।
पहलगाम हमले के बाद संगठित हिंसा:- 22 अप्रैल के बाद, 300+ नफरत के मामले दर्ज, जिनमें 3 हत्याएँ, और 184 मामले सीधा इस हमले से जुड़े हैं। ये स्वत:स्फूर्त नहीं, संगठित और उकसाई गई घटनाएँ हैं।
मीडिया और सरकार की चुप्पी क्यों?:- क्या जाकिर का मारा जाना “ब्रेकिंग न्यूज़” नहीं है? क्या उसकी जान सिर्फ़ इसलिए सस्ती हो गई क्योंकि वह मुस्लिम था? प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, बीजेपी के किसी बड़े नेता का कोई बयान क्यों नहीं?
अब सवाल पूछने का वक़्त है:- अगर जाकिर की जगह किसी और धर्म का व्यक्ति होता तो क्या यही होता? “गोरक्षा” या “पशु चोरी” के नाम पर मुस्लिमों की हत्या करने वालों को राजनीतिक संरक्षण क्यों मिल रहा है? क्या हर मुसलमान अब शक की निगाह से देखा जाएगा?
मुसलमान कब तक चुप रहेंगे?:- जाकिर कुरैशी की हत्या को भुलाना नहीं है। हर बार जब एक ‘मियां’ को मारा जाएगा, मुसलमानों को बोलना होगा, लिखना होगा, चींख़ना होगा। क्योंकि अगर आज हम चुप रहे, तो कल आपकी, हमारी बारी भी आएगी।