आख़िर वो कौन सी वजहें रही हैं, जिसने राज्य में कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया? हरियाणा में किसानों
का मुद्दा हो या ‘अग्निवीर’ योजना, ऐसे कई मुद्दे थे, जिनकी वजह से बीजेपी सरकार के प्रति लोगों की
नाराज़गी बताई जा रही थी.लेकिन विधानसभा चुनावों के नतीजों ने सियासी जानकारों से लेकर
एग्ज़िट पोल तक को ग़लत साबित किया है.यही नहीं हरियाणा में अपनी सरकार की वापसी का
इंतज़ार कर रही कांग्रेस को इससे बड़ा झटका लगा है. सवाल ये है कि कांग्रेस जिसे जीती बाजी मान
रही थी, वह पलट कैसे गई? क्या केवल दल का अंतर्कलह कारण है या फिर जाटों की गोलबंदी का
प्रयास उल्टा पड़ गया? और एंटी इनकम्बेंसी का क्या हुआ? पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को
पूर्ण बहुमत नहीं मिला था.राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से 40 पर ही जीत मिली थी.परिणाम
आने के बाद दस सीट जीतने वाली जननायक जनता पार्टी (जजपा) के साथ गठबंधन कर सरकार
बचानी पड़ी थी. इस चुनाव में जजपा का सफाया हो गया है. न एक सीट आई है, न ही एक प्रतिशत
वोट. जबकि पिछले चुनाव में इस पार्टी को पंद्रह प्रतिशत से अधिक वोट आए थे.माना जा रहा है कि
जजपा के नाराज़ मतदाता कांग्रेस की तरफ़ चले गए हैं. कांग्रेस का मत प्रतिशत बढ़ा है. पिछले चुनाव
में 28.08 प्रतिशत वोट पाने वाली कांग्रेस को इस बार 39 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले हैं.जजपा का
थोड़ा वोट भाजपा के पास भी गया है जिसका वोट प्रतिशत 36.49 से बढ़कर 40 प्रतिशत के ऊपर
पहुंच गया है. बसपा और इनेलो को पिछले बार भी पांच प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले थे, इस बार भी
मिले हैं. लापता सिर्फ जजपा का वोट है जो कहा जा रहा है कि भाजपा और कांग्रेस के पास चला गया
है. साल 2014 में भाजपा ने एक दशक तक मुख्यमंत्री रहे भूपेंद्र हुड्डा को हराकर सत्ता हासिल की थी.
हुड्डा का जाट समुदाय में प्रभाव माना जाता है. यह समुदाय राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका
निभाता आया है, लेकिन भाजपा ने हरियाणा में जाट समुदाय के इतर जाकर अपनी राजनीति का
विस्तार किया.यही वजह थी कि सत्ता मिलने पर भाजपा ने किसी जाट की जगह पंजाबी खत्री मनोहर
लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया. साढ़े नौ साल बाद खट्टर को हटाया, तब भी एक ओबीसी नेता नायब
सिंह सैनी को पद सौंपा. कांग्रेस इस चुनाव में भी जाटों के समर्थन पर अधिक निर्भर थी. लेकिन
भाजपा ने जाटों से पूरी तरह किनारा नहीं किया, बल्कि जहां ज़रूरत थी वहां कांग्रेस से भी जाट
नेताओं को लाकर टिकट दिया.भाजपा ने इस चुनाव में 16 जाट उम्मीदवार मैदान में उतारे थे.कांग्रेस
ने भूपेंद्र हुड्डा को टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव प्रचार तक में खुली छूट दे रखी थी. कुल 90 सीटों में
से 70 से अधिक टिकट हुड्डा के समर्थकों को दिए गए. हुड्डा को मिली छूट को भाजपा ने जाट राजनीति
बताया और अन्य समुदायों की गोलबंदी का प्रयास किया. साथ ही, हुड्डा को मिलती अधिक तवज्जो से
कुमारी शैलजा नाराज़ हो गईं. वह चुनाव प्रचार से नदारद रहने लगीं. इस दौरान भाजपा लगातार
कहती रही कि कांग्रेस में दलित नेता का अपमान हो रहा है. बाद में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने
डैमेज कंट्रोल की कोशिश की लेकिन तब तक यमुना में बहुत पानी बह चुका था. हुड्डा को खुली छूट का
क्या फायदा हुआ, इसका अंदाजा परिणाम के आंकड़ों से लगाया जा सकता है. राजनीतिक विश्लेषक
ऐसा मान रहे हैं कि भाजपा का बनाया जाट बनाम नॉन जाट का नैरेटिव एंटी इनकम्बेंसी को भेदने में
कामयाब हुआ है. पार्टी ने उन नेताओं के टिकट काटे, जिनका फीडबैक अच्छा नहीं था. वहीं जमीनी
नेताओं को अपने पाले में रखने के लिए उनके परिवार वालों को टिकट बांटा.जाहिर है, भाजपा
जातिगत समीकरण साधने में भी कामयाब रही है.वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री मानते हैं, “इन नतीजों के
पीछे सबसे बड़ी वजह रही है बीजेपी का माइक्रो मैनेजमैंट. इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि
हरियाणा में बीजेपी ने ग़ैर जाट वोटों को बड़ी चतुराई से साधा है. इसका असर यह हुआ है कि हुड्डा के
गढ़ सोनीपत की पाँच में से चार सीटों पर कांग्रेस की हार हो गई.” हेमंत अत्री के मुताबिक़ कांग्रेस की
हवा ऐसी थी कि हर जगह उसकी जीत नज़र आ रही थी. चाहे वो हरियाणा के विशेषज्ञ हों, आम लोग
हों या एग्ज़िट पोल. लेकिन बीजेपी के माइक्रो मैनेजमैंट ने चुनाव के नतीजे बदल दिए.हरियाणा की
राजनीति पर गहरी नज़र वाले वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल के मुताबिक़ हरियाणा में क़रीब 22
फ़ीसदी जाट वोट हैं जो काफ़ी वोकल हैं यानी खुलकर अपनी बात रखते हैं.”ग़ैर जाटों को लगा कि
कांग्रेस के जीतने पर भूपिंदर सिंह हुड्डा ही हरियाणा के मुख्यमंत्री बनेंगे इसलिए उन्होंने ख़ामोशी से
बीजेपी के पक्ष में वोटिंग कर दी है.” आदेश रावल के मुताबिक़ हरियाणा में इस बार के विधानसभा
चुनावों में वोटों का बँटवारा जाट और ग़ैर जाट के आधार पर हो गया, जिसका सीधा नुक़सान कांग्रेस
को हुआ है.ग़ैर जाट और जाट वोटों के बीच समीकरण साधने में बीजेपी कई सीटों पर कामयाब रही.
राज्य की कई सीटों पर उसने क़रीबी मुक़ाबले में कांग्रेस को मात दी है.इनमें आसंध, दादरी,
यमुनानगर, सफीदों, समलखा, गोहाना, राई, फ़तेहाबाद, तोशाम, बाढड़ा, महेंद्रगढ़ और बरवाला जैसी
सीटें शामिल हैं, जहां कांग्रेस को काफ़ी क़रीबी अंतर से हार का सामना करना पड़ा है.हरियाणा में
कांग्रेस की हार के पीछे पार्टी के अंदर की गुटबाज़ी भी एक बड़ी वजह मानी जाती है. जानकार मानते
हैं कि राज्य में कांग्रेस के उम्मीदवारों को इस तरह से भी देखा जा रहा था कि कौन भूपिंदर सिंह हुड्डा
के खेमे से है और कौन कुमारी शैलजा के क़रीबी है.यही नहीं कांग्रेस के कई उम्मीदवारों को आलाकमान
यानी कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का उम्मीदवार बताया जा रहा था.हेमंत अत्री मानते हैं कि हरियाणा में
गुटबाज़ी और ग़लत तरीके से टिकट बाँटने की वजह से कांग्रेस को क़रीब 13 सीटें गंवानी पड़ी हैं. इनमें
भूपिंदर सिंह हुड्डा, कुमारी शैलजा और कांग्रेस आलाकमान की पसंद के उम्मीदवार भी शामिल हैं.इस
मामले में कांग्रेस नेता कुमारी शैलजा को लेकर भी कई तरह की चर्चा चलती रही. यहां तक कहा जाने
लगा कि कांग्रेस के कई नेताओं का ध्यान चुनावों से ज़्यादा, चुनाव जीतने के पहले ही मुख्यमंत्री की
कुर्सी पर था.
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि इन चुनावों का सबसे बड़ा सबक यही
है कि अति आत्मविश्वास कभी नहीं करना चाहिए. ज़ाहिर है, उनका निशाना कांग्रेस पर ही
था.हरियाणा में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच गठबंधन की बात चल रही थी लेकिन दोनों के
बीच सीटों की साझेदारी पर सहमति नहीं बन पाई थी.हेमंत अत्री बताते हैं, “कांग्रेस ने अपने किसी
विधायक का टिकट नहीं काटा और उसके आधे उम्मीदवारों की हार भी हो गई. उम्मीदवारों को नहीं
बदलना भी कांग्रेस के लिए बड़ा नुक़सान साबित हुआ है.” साल 2019 में हरियाणा विधानसभा चुनाव
में बीजेपी ने 90 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और उसे 40 सीटों पर जीत मिली थी. इस बार बीजेपी
ने 89 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. कांग्रेस को 2019 में 90 में 31 सीटों पर जीत मिली
थी.इस साल हुए लोकसभा चुनावों में हरियाणा में कांग्रेस को 43 फ़ीसदी वोट मिले थे जबकि बीजेपी
ने 46 फ़ीसदी वोट मिले थे. यानी दोनों प्रमुख दलों के बीच वोटों का अंतर काफ़ी कम रहा
था.लोकसभा चुनावों में बीजेपी को राज्य की क़रीब 44 विधानसभा सीटों पर सबसे ज़्यादा वोट मिले
थे जबकि कांग्रेस 42 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही थी. इस लिहाज़ से भी दोनों दलों के बीच अंतर
काफ़ी छोटा रहा था.जानकारों के मुताबिक़ लोकसभा चुनावों में दलित वोटों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस के
खाते में गया था लेकिन मौजूदा विधानसभा चुनाव में यह वोट कांग्रेस से दूर जाता दिखा है.इस साल के
लोकसभा चुनावों में मायावती की बीएसपी को हरियाणा में महज़ एक फ़ीसदी के क़रीब वोट मिले थे.
मौजूदा विधानसभा चुनाव में उसने राज्य में अपने वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी की है.यही नहीं पिछले
विधानसभा चुनावों के मुक़ाबले इस बार राज्य में आम आदमी पार्टी ने भी राज्य में अपने वोट बैंक में
क़रीब एक फ़ीसदी का इज़ाफ़ा कर लिया है.आदेश रावल बताते हैं, “इसी साल हुए लोकसभा चुनावों में
हरियाणा में दलितों ने कांग्रेस को वोट दिया था. कांग्रेस को सोचना चाहिए कि ऐसा क्या हुआ कि तीन
महीने में ही दलित वोट उससे दूर हो गए.” हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों पर ग़ौर करें तो
10 से ज़्यादा सीटों पर छोटे दल या निर्दलीय उम्मीदवार कांग्रेस की हार के पीछे बड़ी वजह रहे हैं.आम
आदमी पार्टी हरियाणा में कोई चमत्कार नहीं कर पाई है और न ही उसे किसी सीट पर जीत मिली है.
लेकिन छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच वोट बँटने का कांग्रेस को स्पष्ट नुक़सान दिखता
है.हेमंत अत्री के मुताबिक़ बीजेपी ने उन सभी सीटों पर कांग्रेस विरोधी उम्मीदवार की मदद की, जहाँ
उसकी जीत की संभावना कम थी और कांग्रेस की जीत भी सपष्ट नहीं दिख रही थी.हरियाणा
विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार के पीछे सबसे बड़ी भूमिका निर्दलीय और छोटे दलों ने निभाई
है. इनकी वजह से राज्य की क़रीब 15 सीटों पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है.
उचाना कलां:-इस सीट पर कांग्रेस के बृजेंद्र सिंह को महज़ 32 वोटों से बीजेपी से हार का सामना
करना पड़ा है. यहाँ निर्दलीय उम्मीदवारों, आम आदमी पार्टी और नोटा समेत कुल 19 उम्मीदवारों को
इससे ज़्यादा वोट मिले हैं.
असंध:-असंध सीट पर कांग्रेस को ‘इंडिया’ गठबंधन के ही सहयोगी आम आदमी पार्टी और शरद पवार
गुट के एनसीपी ने भी झटका दे दिया है. यहाँ दोनों में से किसी एक दल को मिले वोट अगर कांग्रेस को
मिल जाते तो कांग्रेस क़रीब 2 हज़ार वोट से चुनाव जीत जाती.इस सीट पर बीजेपी के योगेंद्र सिंह
राणा ने 2306 वोट से जीत हासिल की है. यहां कांग्रेस के शमशेर सिंह गोगी दूसरे नंबर पर रहे हैं.इस
सीट पर ‘आप’ को 4290 वोट मिले हैं, जबकि एनसीपी को 4218 वोट मिले हैं.
फ़तेहाबाद:-फ़तेहाबाद सीट पर बीजेपी के बलवन सिंह दौलतपुरिया को कांग्रेस के दुर्गा राम से क़रीब
2 हज़ार वोट ज़्यादा मिले हैं और कांग्रेस इस सीट पर हार गई है.इस सीट पर आप उम्मीदवार कमल
बिसला को क़रीब 3 हज़ार वोट मिले हैं, अगर केवल यही वोट कांग्रेस के ख़ाते में होता तो इस सीट पर
कांग्रेस की जीत हो जाती.इस सीट के साथ एक ख़ास बात यह है कि 4 उम्मीदवारों को जीत और हार
के अंतर से ज़्यादा वोट मिले हैं.यहाँ आईएनएलडी को क़रीब 10 हज़ार वोट मिले हैं, जबकि निर्दलीय
राजेंदर चौधरी को क़रीब 6 हज़ार वोट और जेजेपी को तीन हज़ार से ज़्यादा वोट मिले हैं.
महेंद्रगढ़:-महेंद्रगढ़ सीट पर कांग्रेस को बीजेपी के मुक़ाबले क़रीब 2600 वोट कम मिले हैं और उसे हार
का सामना करना पड़ा है.जबकि इस सीट पर निर्दलीय संदीप सिंह को 20 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले
हैं. महेंद्रगढ़ सीट पर आईएनएलडी के उम्मीदवार को भी क़रीब 4 हज़ार वोट ज़्यादा मिले हैं और इसने
कांग्रेस की हार तय कर दी.
सफीदों:-मेवात क्षेत्र की सफीदों सीट पर कांग्रेस को महज़ क़रीब 4 हज़ार वोट से हार का सामना
करना पड़ा है. इस सीट पर बीजेपी के राम कुमार गौतम ने जीत हासिल की है.यहां निर्दलीय
उम्मीदवार जसबीर देसवाल को बीस हज़ार से ज़्यादा, जबकि एक अन्य निर्दलीय बचन सिंह आर्या को
क़रीब 9 हज़ार वोट मिले हैं. यानी यहाँ निर्दलीय उम्मीदवार ने कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया.
राई:-राई सीट पर बीजेपी को कांग्रेस के मुक़ाबले क़रीब 4 हज़ार वोट ज़्यादा मिले हैं और यहाँ से
बीजेपी की कृष्णा गहलावत को जीत मिली है.इस सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार प्रतीक राजकुमार
शर्मा को 12 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले हैं. इन मतों ने कांग्रेस की हार में बड़ी भूमिका निभाई है.
दादरी:-मध्य हरियाणा की दादरी सीट पर कांग्रेस को 2 हज़ार से भी कम वोटों से हार का सामना
करना पड़ा है और यहाँ बीजेपी की जीत हुई है.इस सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार संजय छापरिया को
क़रीब 4 हज़ार वोट मिले हैं, जबकि एक अन्य निर्दलीय उम्मीदवार अजीत सिंह को भी तीन हज़ार से
ज़्यादा वोट मिले हैं.
बाढड़ा:-बाढड़ा सीट पर कांग्रेस को 7585 वोटों से हार का सामना करना पड़ा है. यहाँ भी बीजेपी की
जीत हुई है.इस सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार सोमवीर घसोला को 26 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले हैं
और उन्होंने कांग्रेस को हराने में बड़ी भूमिका निभाई है.
गोहाना:-गोहाना सीट पर भी कांग्रेस का खेल बिगाड़ने में निर्दलीय उम्मीदवार की भूमिका अहम रही
है. इस सीट को बीजेपी ने क़रीब 10 हज़ार वोट से जीता है और कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही है. जबकि
निर्दलीय हरीश चिकारा को 14 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले हैं.
तोशाम:-तोशाम सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार अनिरूद्ध चौधरी को क़रीब 14 हज़ार वोटों से हार का
सामना करना पड़ा है. इस सीट पर भी बीजेपी की जीत हुई है.यहां निर्दलीय उम्मीदवार शशि रंजन
परमार को क़रीब 16 हज़ार वोट मिले हैं और इस वोट ने कांग्रेस की हार पक्की कर दी.
सोहना:-सोहना सीट पर बीजेपी को कांग्रेस से क़रीब 12 हज़ार ज़्यादा वोट मिले हैं और यहां कांग्रेस
की हार हो गई है. कांग्रेस की इस हार में निर्दलीय जावेद अहमद को मिले क़रीब 50 हज़ार वोट की
बड़ी भूमिका है.एक अन्य निर्दलीय कल्याण सिंह को भी इस सीट पर 20 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले हैं.
जबकि बीएसपी के सुरेंद्र भड़ाना को भी 15 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले हैं जो हार और जीत के अंतर से
ज़्यादा है.
नरवाना:-नरवाना सीट पर बीजेपी को कांग्रेस के मुक़ाबले क़रीब 11 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले और
उसकी जीत हो गई.इस सीट पर आईएनएलडी की विद्या रानी को 46 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले हैं
और यह कांग्रेस के लिए हार की बड़ी वजह बनी है.
समलखा:-समलखा विधानसभा सीट पर बीजेपी को क़रीब 20 हज़ार वोट से जीत मिली है. यहां
कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही है.इस सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार रविन्दर मछरौली को 21 हज़ार से
ज़्यादा वोट मिले हैं.
यमुनानगर:-यमुनानगर सीट पर कांग्रेस का खेल बिगाड़ने में बड़ी भूमिका इंडियन नेशनल लोक दल के
दिलबाग़ सिंह की रही है. उन्हें 36 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले हैं और वो तीसरे नंबर पर रहे.इस सीट
पर कांग्रेस के उम्मीदवार रमण त्यागी को बीजेपी के घनश्याम दास से क़रीब 22 हज़ार कम वोट मिले
और उनकी हार हो गई.
रानिया:-हरियाणा की रानिया विधानसभा सीट ऐसी सीट रही है जहाँ आम आम आदमी पार्टी के वोट
मिल जाने पर ही कांग्रेस की जीत हो जाती, हालांकि यह सीट बीजेपी नहीं बल्कि आईएनएलडी के
खाते में गई है.इस सीट पर आईएनएलडी के अर्जुन चौटाला ने कांग्रेस के सर्वमित्र को क़रीब 4 हज़ार
वोटों से हरा दिया है.यहां निर्दलीय रणजीत सिंह को 36 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले हैं.जबकि आम
आदमी पार्टी के हरपिंदर सिंह को भी साढ़े चार हज़ार से ज़्यादा वोट मिले हैं.
क्यों ग़लत साबित हुए एग्ज़िट पोल?:-इन चुनावी नतीजों ने एक बार फिर एग्ज़िट पोल और उनको
करने वाली एजेंसियों की विश्वसनीयता को सवालों के घेरे में ला दिया है.हालांकि जम्मू-कश्मीर के
नतीजे एग्ज़िट पोल के इर्द-गिर्द रहे. यहां नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन को बहुमत मिला है.ऐसा
पहली बार नहीं है जब नतीजों के बाद एग्ज़िट पोल करने वालीं सर्वे एजेंसियों को आलोचनाओं का
सामना करना पड़ रहा है.कुछ महीने पहले लोकसभा चुनाव के नतीजे आए थे तब भी एग्ज़िट पोल्स को
लेकर कमोबेश ऐसी ही स्थिति थी क्योंकि नतीजे एग्ज़िट पोल से अलग थे.जम्मू-कश्मीर के पूर्व
मुख्यमंत्री और नेशनल कॉफ़्रेंस के नेता उमर अब्दुल्लाह एग्ज़िट पोल्स की विश्वसनीयता पर सवाल
उठाते रहे हैं.मतगणना वाले दिन भी उमर अब्दुल्लाह ने इस विषय को लेकर एक्स पर एक पोस्ट
लिखा है.उमर ने लिखा, ”यदि आप एग्ज़िट पोल्स के लिए भुगतान करते हैं या उन पर चर्चा करने में
समय बर्बाद करते हैं तो आप सभी चुटकुलों/मीम्स/उपहास के पात्र हैं. कुछ दिन पहले मैंने उन्हें समय
की बर्बादी कहने का एक कारण बताया था.” पिछले साल के अंत में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में
विधानसभा चुनाव हुए थे. यहां भी नतीजे एग्ज़िट पोल के मुताबिक़ नहीं आए थे.आख़िर हरियाणा
समेत दूसरे राज्यों में ऐसे अहम मौक़ों पर सर्वे करने वाली एजेंसियों से कहां चूक हुई? इस सवाल के
जवाब में सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग स्टडीज़ (सीएसडीएस)-लोकनीति के सह निदेशक प्रोफ़ेसर
संजय कुमार एग्ज़िट पोल्स की कार्य पद्धति को कठघरे में खड़ा करते हैं.संजय कुमार कहते हैं, ”जिस
तरह से धड़ल्ले से पोल्स सामने आ रहे हैं उनमें मेथोडोलॉजी को फ़ॉलो नहीं किया जा रहा है. कोई भी
पोल करने से पहले वोटरों के पास जाना होता और कुछ सवाल पूछने होते हैं. तो कम से कम सभी
एजेंसियों को ये सवाल, वोट शेयर और अन्य जानकारियां सामने रखनी चाहिए क्योंकि इसके बाद ही
हम सही आकलन कर सकते हैं.” संजय कुमार का कहना है कि मेथोडोलॉजी (कार्य पद्धति) में ज़रूर
कुछ न कुछ गड़बड़ी है तभी ये सारे एग्ज़िट पोल्स ग़लत साबित हो रहे हैं.