असदुद्दीन ओवैसी का हालिया बयान — “इस देश में ‘आई लव मोदी’ कहा जा सकता है, लेकिन ‘आई लव मोहम्मद’ नहीं कहा जा सकता” — भारतीय राजनीति में नई बहस छेड़ गया है। इस बयान ने सत्ता और समाज दोनों में गहरी हलचल पैदा की।
कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने ओवैसी की निंदा करते हुए कहा कि उन्हें अपने अल्फ़ाज़ वापस लेने चाहिए और माफ़ी मांगनी चाहिए। अल्वी का तर्क यह है कि हज़रत मोहम्मद ﷺ की मोहब्बत को राजनीतिक मुक़ाबले में घसीटना गलत है। लेकिन असल सवाल यही है कि क्या वाकई ओवैसी ने किसी तरह से तौहीन की, या फिर यह बयान सच्चाई की तरफ़ इशारा था?
दरअसल, ओवैसी ने जिस मुद्दे पर ध्यान दिलाया, वह भारत की मौजूदा स्थिति का एक आईना है। यहाँ ‘आई लव मोदी’ बोलना आसान है, क्योंकि यह सत्ता की पसंद के अनुरूप है। मगर जब कोई मुसलमान अपने प्यारे नबी ﷺ के लिए वही अल्फ़ाज़ कहे, तो शक, इल्ज़ाम और कभी-कभी सज़ा तक सामने आ जाती है। यह असमानता सिर्फ़ राजनीति नहीं, बल्कि मज़हबी असहिष्णुता की ओर इशारा करती है। राशिद अल्वी की नाराज़गी समझी जा सकती है, लेकिन उनका गुस्सा गलत दिशा में है। उन्हें यह समझना चाहिए कि एक मुसलमान की पहचान का सबसे अहम पहलू ही यह है कि वह अपने नबी ﷺ से बेइंतिहा मोहब्बत रखे। इस्लाम की रूह यही सिखाती है कि इंसान अपनी जान, माल और दुनिया की हर चीज़ से बढ़कर रसूल ﷺ से मोहब्बत करे। अगर यह जज़्बा कमजोर पड़ जाए तो ईमान अधूरा रह जाता है। अल्वी की टिप्पणी से यह आभास होता है कि वे ओवैसी को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानकर बोल रहे हैं, न कि एक मज़हबी भाई के तौर पर। असली सवाल यह है कि क्या अल्वी अपनी नाराज़गी में उस हकीकत से मुँह मोड़ रहे हैं, जिस पर ओवैसी ने रोशनी डाली है?
रशीद अल्वी किस मस्लक से हैं ?
जहाँ तक अल्वी के मज़हबी मस्लक की बात है, वे एक सुन्नी मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते हैं और हमेशा से भारतीय राजनीति में सेक्युलर, कांग्रेस समर्थक चेहरे के रूप में सामने आए हैं। लेकिन सुन्नी होने का असल मतलब यह भी है कि वे नबी ﷺ से सबसे गहरी मोहब्बत के पैरोकार हों — न कि इस मोहब्बत की अहमियत को राजनीतिक बयानबाज़ी समझकर नज़रअंदाज़ करें।
इसलिए यह कहा जा सकता है कि ओवैसी का बयान असल में एक चेतावनी थी — कि अगर देश में मोहब्बत जताने का हक़ भी सत्ता की पसंद पर निर्भर कर जाए, तो लोकतंत्र और इंसाफ़ दोनों खतरे में पड़ जाएंगे। वहीं, राशिद अल्वी को चाहिए कि वे अपने दुनियावी आकाओं को खुश करने की बजाय अपने असली आक़ा ﷺ की मोहब्बत को प्राथमिकता दें। यही एक मुकम्मल मुसलमान की पहचान है।
