उत्तर प्रदेश की ज़मीन सैकड़ों वर्षों से हिंदू-मुस्लिम साझी विरासत की मिसाल रही है। इन्हीं मिसालों में एक अहम नाम है सैयद सालार मसूद गाज़ी मियां का, जिनकी याद में हर साल बहराइच और अन्य स्थानों पर मेले लगते रहे हैं। इन मेलों में धर्म की दीवारें ढह जाती थीं—हिंदू और मुसलमान मिलकर झूले झूलते, मिन्नतें मांगते, मिठाई बांटते और सांस्कृतिक समरसता का उत्सव मनाते। लेकिन आज यही साझा संस्कृति हिंदुत्व की राजनीति के लिए खतरा बन गई है।
गाजी मियां, यानी सैयद सालार मसूद, 11वीं शताब्दी में भारत आए एक तुर्क सेनापति माने जाते हैं। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से उनके बारे में मतभेद हैं—कुछ मुस्लिम उन्हें संत मानते हैं, तो कुछ हिंदुत्ववादी उन्हें ‘आक्रमणकारी’ करार देते हैं। लेकिन आम जनता के बीच वे एक लोकनायक की तरह पूजे जाते हैं। उनकी दरगाहों पर हिंदू और मुस्लिम दोनों जातियों के लोग श्रद्धा से जाते हैं। बहराइच में उनकी दरगाह पर लगने वाला जेठ का मेला हजारों सालों से सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल रहा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, गाज़ी मियां की शादी से पहले उनकी हत्या हो गई थी, इसलिए आज भी उनकी प्रतीकात्मक बारात निकाली जाती है जिसमें हिंदू-मुसलमान एक साथ भाग लेते हैं।
2025 में यूपी सरकार ने बहराइच, संभल और मुबारकपुर जैसे इलाकों में गाजी मियां से जुड़े मेलों पर प्रतिबंध लगा दिया। प्रशासन ने तर्क दिया कि “कानून-व्यवस्था की स्थिति और हालिया आतंकी हमलों” के कारण ऐसा किया गया, लेकिन असलियत इससे कहीं ज़्यादा गहरी और राजनीतिक है।मार्च 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गाजी मियां का परोक्ष उल्लेख करते हुए कहा कि “आक्रमणकारियों का महिमामंडन देशद्रोह की नींव को मजबूत करता है”, जिससे यह साफ़ हो गया कि यह केवल सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि विचारधारा की जंग है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पिछले कुछ वर्षों से गाजी मियां की विरासत को मिटाने की कोशिश की है। इसके लिए महाराजा सुहेलदेव की कहानी को उभार कर, एक “हिंदू वीर” बनाम “मुस्लिम आक्रमणकारी” का आख्यान रचा गया है। भाजपा द्वारा राजभर और पासी जैसे पिछड़ी जातियों को हिंदुत्व की राजनीति में लाने के लिए सुहेलदेव को नायक बनाया जा रहा है। लेकिन यह नायकत्व ऐतिहासिक तथ्यों से कम और राजनीतिक कल्पना से ज़्यादा उपजा हुआ है। जिस सुहेलदेव की ऐतिहासिकता पर खुद इतिहासकारों में मतभेद है, उसे गाजी मियां की विरासत मिटाने के लिए गढ़ा गया है। बहराइच जिले की आधिकारिक वेबसाइट, जो पहले गाजी मियां की दरगाह को “हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल” बताती थी, अब से गाजी मियां की तस्वीरें और उल्लेख हटा दिए गए हैं। यह प्रतीकात्मक नहीं, सत्ता द्वारा इतिहास मिटाने की प्रक्रिया है—जिसे अंग्रेज “historical erasure” कहते थे।
क्या साझी विरासत अब अपराध है?:-गाजी मियां का मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं था, वह एक सामाजिक ताना-बाना था जिसमें जाति और धर्म की दीवारें गिरती थीं। हिंदुत्व की राजनीति को यही सबसे बड़ा खतरा है—एकता। आज जिन मेलों पर पाबंदी लगाई जा रही है, वही कभी इस देश की रूह हुआ करते थे। सवाल यह है कि क्या आज की सरकारें देश की आत्मा को ही संदिग्ध बना रही हैं? क्या साझी विरासत को मिटाकर सत्ता सुरक्षित रह सकती है?
हिंदू-मुसलमान साथ रहना चाहते हैं – लेकिन सरकार और संगठन चाहते हैं बंटवारा:-भारत का आम नागरिक—चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान—सदियों से एक-दूसरे के साथ रहकर जीवन जीता रहा है। मोहल्लों में हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे की शादी-ब्याह, त्योहार, दुख-सुख में शामिल होते हैं। गाज़ी मियां जैसे मेलों में यही मेल-मिलाप खुलकर सामने आता है। मजहब से ज़्यादा इंसानियत की अहमियत यहाँ देखी जाती है। लेकिन यही आपसी प्रेम और सामाजिक समरसता हिंदुत्व की राजनीति के लिए सबसे बड़ा खतरा है। क्योंकि यह राजनीति डर, नफरत और “हम बनाम वे” की भावना पर टिकती है। सरकार और संघ से जुड़े संगठन लगातार इस साझा विरासत को “खतरा” घोषित करते हैं। गाजी मियां को “आक्रमणकारी” बताना, दरगाह की वेबसाइट से विवरण हटाना, और मेलों पर प्रशासनिक रोक लगाना—ये सब प्रयास उसी रणनीति का हिस्सा हैं जिससे हिंदू और मुस्लिम के बीच अविश्वास और टकराव पैदा किया जाए। आज जो मेलों को रद्द किया जा रहा है, वही कभी गंगा-जमुनी तहज़ीब की बुनियाद हुआ करते थे। सवाल यह है कि क्या सरकारें इस देश की आत्मा को ही संदिग्ध बना रही हैं? क्या सत्ता की भूख इतनी है कि वह देश के लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बना दे? गाज़ी मियां के मेले को रोकना केवल एक धार्मिक आयोजन पर पाबंदी नहीं है—यह भारत की साझी संस्कृति पर एक हमला है। यह हमें तय करना है कि हम सत्ता की नफरत की राजनीति में बंट जाएंगे या फिर अपनी विरासत की हिफाज़त करेंगे।
भारत की मिट्टी में मोहब्बत है, नफरत नहीं। लेकिन अगर मोहब्बत को ज़िंदा रखना है, तो हमें उसके दुश्मनों को पहचानना होगा—चाहे वो सत्ता में बैठे हों या सत्ता के पिछलग्गू संगठनों में।