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मुसलमानों के बाद दलित निशाने पर: भाजपा शासित राज्यों में ‘नए शिकार’ की खोज?

adminBy adminNovember 1, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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भारत में जाति और धर्म की राजनीति नई नहीं है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में जिस तरह सामाजिक अत्याचारों का चरित्र बदला है, वह बेहद चिंताजनक है। पहले मुसलमानों पर निशाना साधा गया—मॉब लिंचिंग, बुलडोज़र न्याय, और हिजाब से लेकर हलाल तक हर प्रतीक पर हमला।

और अब ऐसा लग रहा है कि भाजपा शासित राज्यों में दलित समुदाय नया निशाना बन चुका है। ताज़ा उदाहरण मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की दो वीभत्स घटनाएं हैं, जिन्होंने देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया है।


🛑 मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश: जातीय क्रूरता का वीभत्स प्रदर्शन

राज्यघटना का विवरणप्रशासनिक प्रतिक्रिया पर सवाल
मध्य प्रदेश (भिंड)25 वर्षीय दलित युवक को उसके ही नियोक्ता ने अगवा किया, पीटा, और फिर पेशाब पीने के लिए मजबूर किया।यह 2023 की सीधी घटना के बाद हो रहा है, जो प्रशासनिक संवेदना और राजनीतिक जिम्मेदारी दोनों के ह्रास को दर्शाता है।
उत्तर प्रदेश (लखनऊ)60 वर्षीय दलित रामपाल रावत को पेशाब करने के आरोप में मंदिर के पास ‘ज़मीन चाटने’ पर मजबूर किया गया।सवाल यह नहीं कि गिरफ्तारी कितनी जल्दी हुई, बल्कि यह है कि ऐसी घटनाएं हर महीने दोहराई क्यों जा रही हैं?

राजनीतिक प्रतिक्रिया और सत्ता का मौन

  • विरोध: राजनीतिक विरोधी दलों ने इस घटना को भाजपा के दलित-विरोधी चरित्र से जोड़ा। कांग्रेस ने आरोपी को आरएसएस से जुड़ा बताया, जबकि समाजवादी पार्टी ने इसे “अमानवीय” कहा।
  • सच्चाई: इन घटनाओं की जड़ें सिर्फ़ किसी संगठन या पार्टी में नहीं, बल्कि सत्ता के मौन समर्थन में छिपी हैं। जब सरकार की प्राथमिकता ‘साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण’ हो जाती है, तो जातीय अन्याय हाशिए पर चला जाता है।

📉 जातीय असमानता की राजनीति और विश्वासघात

भाजपा शासित प्रदेशों में जो पैटर्न उभर रहा है, वह बेहद स्पष्ट है: पहले मुसलमानों को ‘दुश्मन’ बनाकर पेश किया गया, अब दलितों के अपमान के मामलों में भी शासन-प्रशासन की उदासीनता दिखाई दे रही है।

  • ऐतिहासिक समर्थन: यह वही दलित समुदाय है जिसने 2014 के बाद भाजपा को ऐतिहासिक समर्थन दिया था।
  • वादा बनाम हकीकत: दलितों को “सबका साथ, सबका विकास” के वादे से जोड़ा गया था, लेकिन 10 साल बाद वही समुदाय “सबका अपमान, सबकी चुप्पी” का शिकार बन गया है।

दलित अत्याचार के पीछे की सियासत

इन घटनाओं को सिर्फ़ कानून-व्यवस्था की विफलता मानना गलत है। यह सत्ता की उस राजनीतिक संरचना का परिणाम है, जो सामाजिक वर्चस्व को बनाए रखने के लिए ‘नीचे के वर्गों को दबाने और ऊपर के वर्गों को बचाने’ का फार्मूला अपनाती है।

यह वही रवैया है जो पहले मुसलमानों के मामलों में अपनाया गया—जहाँ “भीड़” अपराध करती है और “राज्य” ख़ामोश रहता है।


🔇 समाज में डर और सत्ता में मौन

इन घटनाओं के बाद जो सबसे भयावह स्थिति पैदा हुई है, वह है—सामाजिक भय का सामान्यीकरण।

  • असुरक्षा: दलित अब सिर्फ़ आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा के स्तर पर भी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
  • असहज सवाल: लोग पूछने लगे हैं: “क्या आज के भारत में दलित होना ही अपराध है?” यह सवाल भाजपा के लिए सबसे असहज है, क्योंकि पार्टी खुद को “समावेशी राष्ट्रवाद” की प्रतीक बताती है, लेकिन ज़मीन पर “साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद और जातीय भेदभाव” का घालमेल हो रहा है।

लोकतंत्र की विफलता

राज्य सत्ता की चुप्पी इस मानसिकता को वैधता देती है कि “अगर पीड़ित कमज़ोर है—तो अत्याचारी सुरक्षित है।”

यह प्रवृत्ति सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विफलता है। क्योंकि लोकतंत्र का असली मापदंड यह नहीं है कि सत्ता कितनी ताकतवर है, बल्कि यह है कि कमज़ोर कितना सुरक्षित है।


⚠️ अंतिम टिप्पणी: मौन भी अपराध है

मध्य प्रदेश में पेशाब पिलाना और लखनऊ में ज़मीन चाटवाना—ये घटनाएं दो राज्यों की नहीं, बल्कि पूरे भारत के नैतिक पतन की कहानियाँ हैं, और यह कोई संयोग नहीं कि दोनों प्रदेश भाजपा शासित हैं।

जहाँ पहले मुसलमान “दुश्मन” बनाए गए, अब दलितों को “अधीन” बनाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

सवाल: सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि अत्याचार क्यों हो रहा है, सवाल यह है कि सत्ता इसे रोकने के बजाय देखकर क्यों मुस्कुरा रही है।

देश में जहाँ-जहाँ भाजपा की सरकारें हैं, वहाँ अब मुसलमानों के बाद दलितों पर अत्याचार की लहर साफ़ दिख रही है। यह वही लहर है जो लोकतंत्र की नींव को काटती है—क्योंकि जब समाज के सबसे वंचित और कमज़ोर तबकों की इज़्ज़त सुरक्षित नहीं, तो फिर संविधान सिर्फ़ किताब में बचा है, ज़मीन पर नहीं।

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