22 अप्रैल, 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने देश को झकझोर दिया। लेकिन इस हमले का असर सिर्फ घाटी तक सीमित नहीं रहा। इसके ठीक बाद, देशभर में मुसलमानों और कश्मीरियों के खिलाफ़ नफरत, हिंसा और प्रतिशोध की आग भड़की — जो किसी स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया से ज़्यादा, एक संगठित नफरत के अभियान का हिस्सा प्रतीत होती है।
APCR (Association for Protection of Civil Rights) और ‘द ऑब्जर्वर पोस्ट’ द्वारा प्रकाशित ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, पहलगाम हमले के बाद सिर्फ़ तीन हफ्तों के भीतर देश में 300 से ज़्यादा मुस्लिम विरोधी घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से 100 से अधिक घटनाएं सीधे इस हमले से जुड़ी मानी जा रही हैं। रिपोर्ट बताती है कि शारीरिक हमलों की वास्तविक संख्या इससे भी अधिक हो सकती है।
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में सर्वाधिक हमले दर्ज किए गए, जबकि कर्नाटक, पंजाब और चंडीगढ़ में भी बड़ी घटनाएं सामने आईं।मोहम्मद गुलफाम, जिन्होंने अपने चचेरे भाई के साथ बिरयानी की दुकान खोली थी, को हमलावरों ने गोली मार दी। उनका चचेरा भाई घायल हुआ। कर्नाटक में एक मानसिक रूप से अस्वस्थ मुस्लिम युवक, मोहम्मद अशरफ को, कथित तौर पर “पाकिस्तान समर्थक” नारे लगाने के आरोप में पीट-पीट कर मार डाला गया। जबकि वो नारा लगाए भी या नहीं, यह सवाल भी रह गया। इस हिंसा के पीछे सिर्फ़ भीड़ नहीं, बल्कि नेताओं की नफरत फैलाने वाली भाषणबाज़ी भी है: हिंदुत्ववादी नेताओं ने मुसलमानों के खिलाफ हथियार उठाने का आह्वान किया। सोशल मीडिया पर कश्मीरियों के बहिष्कार, मुस्लिम व्यापारों को बंद करवाने, और दारुल उलूम जैसे संस्थानों को खाली कराने की मांग उठी। एक नेता ने खुलेआम कश्मीर में “इज़रायल मॉडल” लागू करने की मांग की — यानी बस्तियाँ तोड़ना, बेकसूरों को बेघर करना और प्रतिशोध के नाम पर सामूहिक दंड देना।
हमले के बाद देशभर में पढ़ रहे कश्मीरी छात्रों को निशाना बनाया गया। कई छात्रों को उनके हॉस्टल और कॉलेज छोड़ने पर मजबूर किया गया, धमकियाँ दी गईं और उन पर शारीरिक हमले किए गए। दक्षिण कश्मीर में 9 घरों को बिना कानूनी प्रक्रिया के तोड़ा गया। इनमें से कुछ घरों के मालिक सालों पहले वहाँ से जा चुके थे, लेकिन उनके बुजुर्ग माता-पिता को बेघर कर दिया गया। यह कार्रवाई सीधे सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों की अवहेलना है।
India Hate Lab की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2024 के बाद से 98.5% नफरत भरे अपराध मुसलमानों के खिलाफ थे। इनमें से ज़्यादातर घटनाएं उन्हीं राज्यों में हुईं जहाँ भाजपा की सरकारें हैं। अलीगढ़ में मुस्लिम फलों की दुकानों में तोड़फोड़ की गई। मुंबई में भाजपा के कार्यकर्ताओं ने फेरीवालों पर हमला किया। गाजियाबाद में मजदूरों को काम से निकाला गया, गांवों में घुसने से रोका गया और उन पर हमला किया गया।
इस पूरे सिलसिले में एक सवाल बार-बार उठता है — सरकार और मीडिया की भूमिका क्या है? जब एक महिला के साथ दुर्व्यवहार होता है और पुलिस एफआईआर तक दर्ज नहीं करती, जब नफरत फैलाने वाले भाषण खुलेआम वायरल होते हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती — तो यह लोकतंत्र नहीं, एक बहुसंख्यकवादी शासन का संकेत है। यह स्पष्ट है कि पहलगाम हमला एक बहाना बन गया, एक पहले से मौजूद नफरत को खुलकर सामने लाने के लिए। यह ‘आतंकवाद के खिलाफ़ गुस्सा’ नहीं है, बल्कि एक धार्मिक समुदाय को सामूहिक रूप से सज़ा देने की नीति है। अगर इस पर रोक नहीं लगी, तो यह नफरत केवल अल्पसंख्यकों को ही नहीं, बल्कि भारत के संविधान, लोकतंत्र और बहुलवाद की आत्मा को भी चीर देगी।