दिल्ली में 13 अक्टूबर को आयोजित भाजपा सरकार के ‘दीपावली मंगल मिलन’ कार्यक्रम ने पत्रकारिता जगत में एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। अशोका होटल में हुए इस आयोजन में मुख्यमंत्री और कैबिनेट के सभी मंत्री मौजूद थे, लेकिन उर्दू मीडिया को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया। ना किसी उर्दू अख़बार का निमंत्रण, ना किसी चैनल के पत्रकार की मौजूदगी। यह कदम एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।
🚫 भाषा नहीं, ‘पहचान’ का सवाल
दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय द्वारा जारी निमंत्रण सूची में किसी उर्दू पत्रकार का नाम नहीं था।
| तथ्य | प्रश्न | निहितार्थ |
| दिल्ली की स्थिति | उर्दू दिल्ली की दूसरी आधिकारिक भाषा है। | यह कदम उर्दू की संवैधानिक और सांस्कृतिक विरासत के खिलाफ है। |
| भाजपा की रणनीति | पहले ‘हिजाब’ और ‘हलाल’, अब ‘उर्दू’ पर निशाना। | यह एक सांस्कृतिक ध्रुवीकरण है, जिसमें हर उस चीज़ को ‘मुसलमान’ ठहराया जाता है जो साझा भारतीय संस्कृति का प्रतीक रही है। |
| सत्ता का चश्मा | सत्ता की राजनीति में भाषा को भी ‘धर्म’ का चश्मा पहनाकर देखा जा रहा है। | भाषा अब राजनीतिक पहचान का पैमाना बन चुकी है। |
🇮🇳 क्या उर्दू सिर्फ मुसलमानों की ज़बान है?
यह सवाल सबसे अहम है। उर्दू का जन्म भारत की मिट्टी से हुआ—यह न तो अरब की देन है, न ईरान की। यह दिल्ली, लखनऊ, हैदराबाद और आगरा की गलियों में पैदा हुई ज़बान है जो हिंदू और मुसलमान दोनों की बोली से गढ़ी गई।
- हिंदू लेखक: प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, राजा राममोहन राय और पंडित ब्रज नारायण चकबस्त जैसे महान लेखकों ने उर्दू में लिखा और बोला।
- भाजपा की एलर्जी: भाजपा सरकार को उर्दू से इतनी एलर्जी क्यों है? क्या इसलिए कि आज उर्दू बोलने और लिखने वालों में मुसलमान ज़्यादा हैं? यदि ऐसा है, तो क्या सरकार अब भाषा को भी जनगणना के कॉलम में बाँट देगी?
📉 सांस्कृतिक तिरस्कार की राजनीति
वरिष्ठ पत्रकार सादिक शेरवानी का कहना है कि भाजपा अब उर्दू को ‘मुसलमानों की भाषा’ बताकर अपने समर्थकों में यह धारणा मजबूत करना चाहती है कि जो उर्दू बोलेगा, वह “दूसरा” है। यह सोच भारत की बहुलतावादी आत्मा के खिलाफ है।
- सिकुड़ता दायरा: बीते वर्षों में भाजपा सरकारों के दौरान भी उर्दू का सरकारी दायरा सिकुड़ा है:
- उर्दू अख़बारों को मिलने वाले विज्ञापन घटे।
- उर्दू अकादमियों का बजट कम हुआ।
- अब दिल्ली में पत्रकारों का सीधा बहिष्कार।
- निष्कर्ष: यह महज़ प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक बहिष्कार की एक संगठित प्रक्रिया है।
⚠️ भाषा को ‘धर्म’ से जोड़ने का ख़तरा
यह घटना केवल पत्रकारों के लिए अपमान नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस आत्मा के लिए भी खतरा है जो ‘समानता और विविधता’ पर टिकी है।
- संवाद का पुल तोड़ना: जब सरकार भाषा को धर्म से जोड़ देती है, तो वह कला, साहित्य और संवाद के उस पुल को तोड़ देती है जो समाज को जोड़ता है।
- आगे का खतरा: अगर उर्दू आज ‘शक के घेरे’ में है, तो कल हिंदी या संस्कृत भी राजनीति की बिसात पर मोहरा बन सकती है।
उर्दू: नफरत नहीं, मोहब्बत की ज़बान
भाजपा का यह रुख उर्दू से नफरत नहीं, बल्कि उसकी विरासत से डर को दिखाता है—क्योंकि उर्दू वह ज़बान है जो “मज़हब” नहीं, “मोहब्बत” सिखाती है। जो “इनक़लाब ज़िंदाबाद” भी कहती है और “सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा” भी। उर्दू किसी एक समुदाय की नहीं, यह भारत की मिली-जुली तहज़ीब की साँस है।
🎙️ अंतिम शब्द
अगर भाषा की बुनियाद पर पत्रकारों को बाँटने की प्रवृत्ति जारी रही, तो यह न केवल उर्दू की आवाज़ को, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को भी कमज़ोर करेगी।
सवाल यह नहीं कि उर्दू पत्रकारों को बुलाया गया या नहीं, सवाल यह है — क्या अब “दिल्ली” में भी “दिल” के लिए जगह नहीं बची?