एक ऐसा क़ानून जो आतंकियों से ज़्यादा विचारों से डरता है, उसे सुरक्षा नहीं, दमन का औज़ार कहा जाता है। 9 जुलाई 2025 को महाराष्ट्र विधानसभा में जो विधेयक पेश किया गया—“महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक, 2024”, वह लोकतंत्र की आत्मा पर एक ऐसा वार है जिसे सिर्फ शब्दों से नहीं, संवैधानिक विवेक से समझना होगा। यह कानून न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक विरोध, और विचारधारा की बहुलता के मौलिक अधिकारों को कुचलता है, बल्कि यह एक खतरनाक राजनीतिक डिज़ाइन का हिस्सा लगता है, जो संविधान को सत्ता की सहूलियत के हिसाब से तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत कर रहा है। यह विधेयक हमारे लोकतंत्र को ऐसे “सुरक्षा राज्य” (security state) में तब्दील करने की ओर ले जाता है, जहां सरकार से असहमत होना ही अपराध है। ‘वामपंथी’ = देशद्रोही? विचारधारा को अपराध घोषित करने की तैयारी! इस विधेयक का सबसे खतरनाक पहलू उसकी भाषा है — वैचारिक, पक्षपाती और अस्पष्ट। ‘वामपंथी कट्टरपंथी संगठन’ या ‘इसी तरह के संगठन’ जैसे शब्द सुनने में आम हैं, पर यह जानबूझकर रखे गए ऐसे शब्द हैं जिनका कोई कानूनी अर्थ नहीं है — लेकिन राजनीतिक दुश्मनों को कुचलने का हथियार बन सकते हैं। क्या किसानों का यूनियन, क्या आदिवासियों के अधिकार के लिए काम करने वाला एनजीओ, क्या विश्वविद्यालयों में सक्रिय छात्र संघ — सब पर यह तलवार लटक सकती है। सत्ता के हिसाब से ये सब ‘संदिग्ध’ बना दिए जाएंगे। अवैध गतिविधि’ की परिभाषा इतनी ढीली कि गांधी भी आज जीवित होते तो अपराधी कहलाते। एक इशारा, एक पोस्टर, एक नारा, एक कैम्पेन — सबको “सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा” कहकर दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है। कोई हिंसा न हो, फिर भी “आशंका” हो — तो संपत्ति जब्त, जेल में बंद, बस्तियों से बेदखल, न्यायालय का दरवाज़ा बंद — यही इस कानून का मुख्य स्वरूप है। धारा 8 कहती है कि सिर्फ किसी संगठन से “संबंध” होना ही काफ़ी है — चाहे आप उसके सदस्य हों, सिर्फ एक बैठक में गए हों, या उसका कोई पर्चा बांटा हो — सब कुछ जेल की वजह बन सकता है।
बस्तियों की घेराबंदी, संपत्तियों की जब्ती, और महिलाओं-बच्चों को “उचित समय” देने का वादा? इस कानून की धारा 9 और 10 में प्रशासन को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी जगह को “संदिग्ध” घोषित करके पूरी बस्ती खाली करा सकता है। क्या यह कानूनी उपाय है या बुलडोज़र राज का वैधानिक संस्करण? महिलाओं और बच्चों को उचित समय दिया जाएगा’ — ये वो सरकारी “विनम्रता” है, जो असल में भीतर छिपे अमानवीय रवैये को छुपाने का आवरण है।
आर्थिक ‘हत्या’ की खुली छूट — बिना अदालत, बिना जवाबदेही। आपका NGO, संगठन या आंदोलन पैसा कहां से ला रहा है — यह सरकार तय करेगी। और अगर सरकार को ‘संदेह’ हो जाए, तो बिना अदालत, आपके अकाउंट फ्रीज़, फंड जब्त, और टैक्स, मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद — किसी भी कानूनी धारा के नाम पर आप पर मुकदमा। यह सिर्फ़ आर्थिक कार्रवाई नहीं, राजनीतिक रूप से विरोध की आवाज़ों को घुटनों पर लाने की रणनीति है।
न्यायिक प्रणाली को दरकिनार करने की साजिश:- बिल कहता है कि कोई निचली अदालत इस कानून को चुनौती नहीं दे सकती। मतलब अगर एक किसान नेता, एक छात्र या एक सामाजिक कार्यकर्ता इस कानून के तहत फंस जाए, तो उसे सीधे हाईकोर्ट जाना होगा। और हम जानते हैं कि गरीब और साधारण नागरिकों के लिए यह रास्ता कितना लंबा, महंगा और असंभव होता है। सभी अपराध गैर-जमानती’ + ‘राजनीतिक अनुमति से ही केस दर्ज’ = पूरी पुलिस मशीनरी राजनीतिक नियंत्रण में:- इस कानून में केस दर्ज करने, जांच करने और आरोप तय करने के अधिकार सिर्फ़ DIG और ADGP जैसे उच्च अधिकारी को दिए गए हैं — यानी कोई भी मामला तभी चलेगा जब राजनीतिक संकेत मिलेगा। यह एक लोकतांत्रिक ढांचे को सुरक्षा तंत्र और नौकरशाही के ज़रिए केंद्रीकरण की घातक मिसाल बनाता है। सरकारी अधिकारियों को ‘अच्छी नीयत’ के नाम पर दंड से छूट?:- एक और खतरनाक प्रवृत्ति: जो भी अधिकारी इस कानून के तहत काम करेगा, उसे किसी भी कोर्ट में घसीटा नहीं जा सकेगा। अगर कोई अधिकारी झूठे केस बनाता है, उत्पीड़न करता है, जेल में डाले रखता है — तो कोई जवाबदेही नहीं। कोई दंड नहीं। कोई न्याय नहीं। यह सीधे-सीधे ‘तानाशाही के लिए लाइसेंस’ जैसा है।
सवाल यह नहीं कि ये कानून कितना खतरनाक है… सवाल यह है कि इसकी ज़रूरत ही क्या थी? UAPA, MCOCA, BNS जैसे दर्जनों कठोर कानून पहले से मौजूद हैं। तो फिर यह नया विधेयक क्यों? क्योंकि यह कानून ‘सुरक्षा’ के नाम पर असल में ‘राजनीतिक विरोध’ को ‘राज्य विरोध’ बना देना चाहता है। यह एक वैचारिक युद्ध का वैधानिक चेहरा है, जो सत्ता को सिर्फ़ सत्ता नहीं — पूरी सोच, स्मृति और सड़कों तक का नियंत्रण देना चाहता है। महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक 2024 — लोकतंत्र के ताबूत में ठोंकी गई एक और कील।
यह विधेयक: 1. संविधान विरोधी है — क्योंकि यह अनुच्छेद 14, 19 और 21 का खुला उल्लंघन करता है। 2. लोकतंत्र विरोधी है — क्योंकि यह असहमति और आलोचना को अपराध बनाता है। 3. राजनीतिक हथियार है — जिसका लक्ष्य है विरोधी दलों, एक्टिविस्टों और सामाजिक संगठनों को कुचलना। 4. गंभीर रूप से अपारदर्शी है — क्योंकि इसकी समिति ने जनता की राय को अनसुना किया, सुनवाई से इनकार किया और दिखावटी बदलाव किए। अब यह जनता को तय करना है — कि वह ‘सुरक्षा’ के नाम पर अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का गला घुटने देगी या खामोशी को तोड़ेगी। अगर आज हम नहीं बोले, तो कल बोलने की इजाज़त भी हमारे पास नहीं बचेगी।