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ग़लत पत्रकारिता नहीं, सोची-समझी साज़िश: ज़ी न्यूज़ और न्यूज़18 पर FIR

adminBy adminJuly 7, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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मरने वाला पाकिस्तानी आतंकवादी नहीं, एक मासूम शिक्षक था।” लेकिन गोदी मीडिया के कैमरों और चीखते एंकरों ने उसे आतंकवादी बना दिया — वो भी बिना किसी सबूत, बिना किसी जांच, बिना पुलिस या सेना की पुष्टि के। अब अदालत ने आदेश दिया है कि ज़ी न्यूज़, न्यूज़18 और अन्य चैनलों के संपादकों व एंकरों पर FIR दर्ज हो। जम्मू-कश्मीर की अदालत का यह फ़ैसला सिर्फ एक व्यक्ति के इंसाफ की दिशा में नहीं, बल्कि पूरे देश की दम तोड़ती पत्रकारिता को आइना दिखाने की कोशिश है।

झूठी रिपोर्टिंग का ‘राष्ट्रवादी’ जाल:- क़ारी मोहम्मद इक़बाल — एक धार्मिक शिक्षक, एक इंसान, एक नागरिक। 7 मई को वे पाकिस्तान की गोलाबारी में मारे गए जब वो बच्चों के खाने का सामान लाने गए थे। लेकिन गोदी मीडिया ने उन्हें लश्कर का कमांडर बना दिया, पुलवामा हमले से जोड़ दिया, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की ‘सफलता’ बता दी। Zee News ने कहा — “मारा गया आतंकी” News18 ने कहा — “लश्कर का एजेंट” Republic ने तो उन्हें “Most Wanted” बना दिया। जबकि स्थानीय पुलिस, गांववाले और मदरसा – सब जानते थे कि वह निर्दोष थे।

ये पहली बार नहीं है… यही है इन चैनलों की आदत! ये वही गोदी चैनल हैं जिन्होंने… डॉ. कफील खान को ‘गैस चुराने वाला आतंकी’ बताया — लेकिन बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा: “उन्हें झूठा फंसाया गया।” जामिया और शाहीन बाग़ के छात्रों को ‘आतंकी, गद्दार और टुकड़े-टुकड़े गैंग’ बताया – कोर्ट ने सभी को क्लीन चिट दी। तबलीगी जमात पर कोरोना फैलाने का आरोप लगाया – बाद में सरकार की रिपोर्ट आई: “कोई सबूत नहीं।” उमर खालिद को ‘षड्यंत्रकारी’ बताया गया – लेकिन 3 साल बाद आज तक आरोप साबित नहीं हुआ। आसिफा बलात्कार केस में भी इन्हीं चैनलों ने पीड़िता की जाति और धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण फैलाया। कोर्ट ने क्या कहा — ये सिर्फ ‘चूक’ नहीं, सुनियोजित अपराध है! सब-जज शफीक अहमद की अदालत ने साफ़ कहा: माफ़ी से नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती। यह केवल पत्रकारिता की मामूली चूक नहीं, बल्कि समाज को नुकसान पहुंचाने वाली गैर-जिम्मेदाराना हरकत है।” कोर्ट ने धारा 353(2) (Public Mischief), 356 (Defamation), 196(1) (Communal hatred) और IT Act की धारा 66 के तहत FIR के आदेश दिए हैं। आख़िर इन चैनलों की इतनी हिम्मत कैसे होती है? सीधा जवाब है — भाजपा सरकार की खुली छूट! अरनब गोस्वामी को सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार के दिन स्पेशल बेंच बनाकर ज़मानत दी। गोडी मीडिया हमेशा अदालत से पहले हर आरोपित को मुसलमान होते ही आतंकवादी, राष्ट्रविरोधी और पाकिस्तान-परस्त घोषित कर देता है। हिन्दू आरोपी हों भड़वे दलाल ‘मानवाधिकार’, ‘गलतफहमी’, ‘युवाओं की भटकाव’ जैसे शब्दों से उसे बचाते हैं। जिससे पता चलता है कि ये पत्रकारिता नहीं दलाली और भड़वेगिरी है। सवाल सिर्फ एक आदमी की छवि का नहीं, पूरे समाज की सोच का है। जब ये भड़वे दलाल किसी मदरसे के शिक्षक को आतंकवादी बताते हैं तो समाज के हर मुसलमान को शक की नजर से देखा जाता है। जब कोई ग़रीब, दलित, आदिवासी छात्र आंदोलन करता है —तो ये भड़वे दलाल उसे ‘देशद्रोही’ बताते हैं । जब कोई सत्ता की आलोचना करता है, तो उसे “अर्बन नक्सल”, “टुकड़े-गैंग”, या “IS एजेंट” बना दिया जाता है। पत्रकारिता या प्रचार-मशीन?:- इन चैनलों की पत्रकारिता का ढांचा साफ है: मुसलमान = संदिग्ध।

सरकार = देशभक्त। विपक्ष = गद्दार। आंदोलनकारी = विदेशी फंडेड एजेंट। पूंजीपति = राष्ट्रनिर्माता। अगर अब भी चुप रहे तो अगला नंबर किसका होगा? क्या हम एक ऐसे भारत में रह रहे हैं जहां कोई भी, कभी भी, बिना सुबूत आतंकवादी करार दिया जा सकता है — सिर्फ धर्म देखकर? कोर्ट का यह आदेश एक चेतावनी है – पत्रकारिता को फिर से पत्रकारिता बनने की जरूरत है, न कि सत्ता के तलवे चाटने वाला भोंपू। गोदी मीडिया सिर्फ ‘भूल’ नहीं करता, ये एक राजनीतिक रणनीति है —जहां सच की हत्या, इंसानियत की बेइज्ज़ती और संविधान की तौहीन रोज़ाना होती है। लेकिन आज कोर्ट ने दिखाया है कि अगर न्यायपालिका जागे, तो झूठ की सबसे बड़ी फैक्ट्री पर भी ताला लग सकता है।

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