“फ्री फिलिस्तीन” लिखा, और एक साल के लिए बर्बाद कर दिए गए – RGNIYD में मुस्लिम छात्रों पर राष्ट्र-विरोध के नाम पर सुनियोजित शिकंजा!तिरंगे के नीचे “फ्री फिलिस्तीन” लिखना क्या देशद्रोह है? क्या “जय भीम” बोलना अब राष्ट्र-विरोध हो गया है? क्या सिर्फ़ मुसलमान छात्र बोलें, तो हर नारा ग़लत हो जाता है? तमिलनाडु के राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान (RGNIYD) ने इन सवालों का जवाब एक शर्मनाक फ़ैसले से दिया है – तीन मुस्लिम छात्रों को सिर्फ़ इसलिए निलंबित कर दिया गया क्योंकि कथित रूप से उन्होंने “फ्री फिलिस्तीन” लिखा था। वो भी उस दिन, जब उनके फाइनल इग्ज़ाम की तैयारी पूरी थी। रात 8 बजे, छुट्टी वाले दिन – बिना कोई नोटिस, बिना किसी सुनवाई, सीधे निलंबन, और वो भी एक साल तक किसी भी सार्वजनिक परीक्षा में बैठने पर रोक। क्यों? क्योंकि तुमने सवाल उठाया। क्योंकि तुमने इंसाफ़ की बात की। क्योंकि तुम्हारा नाम असलम, सईद और नाहल है। विच-हंटिंग का नया नाम:
अनुशासनात्मक कार्रवाई “आपने ‘फ्री फिलिस्तीन’ लिखा था?” “क्या आपको पता है किसने लिखा?” “आपको अपने दोस्तों पर शक है?” ये सवाल पूछे गए RGNIYD की अनुशासन समिति में। लेकिन जवाबों की कोई ज़रूरत नहीं थी – फैसला पहले से तय था। जिन छात्रों को बुलाया गया, वे सभी मुस्लिम। बाकी जिनके कमरे की तलाशी ली गई थी, उन्हें छोड़ दिया गया। जिन छात्रों पर आरोप था, उन्होंने किसी भी सबूत की मांग की, अपना पक्ष रखने की कोशिश की – लेकिन उन्हें सुना ही नहीं गया। सिर्फ एक बेकार पेंट रोलर मिला – जो उन्होंने अपने फील्ड प्रोजेक्ट में इस्तेमाल किया था। लेकिन न साक्ष्य चले, न दलील – सिर्फ पहचान। और पहचान थी ‘मुसलमान’। इससे पहले क्या हुआ था? RGNIYD के छात्रसंघ के सदस्य रहे असलम और उनके साथी, संस्थान के असिस्टेंट रजिस्ट्रार के खिलाफ़ यौन उत्पीड़न मामले में विरोध कर रहे थे। ये वही रजिस्ट्रार है जिस पर चंडीगढ़ में बलात्कार का मुकदमा दर्ज है। छात्रों की मांग थी – जब तक जांच पूरी नहीं होती, उसे पद से हटाया जाए। बस यहीं से शुरू हुई थी शिकंजे की बुनियाद। छात्रों के मुताबिक – ये पूरी कार्रवाई एक बदले की कार्रवाई है। एक ‘टारगेटेड विच-हंट’। जहां नारे नहीं, नाम देखा गया। जहां ‘फ्री फिलिस्तीन’ से नहीं, तुम्हारे मुसलमान होने से दिक्कत है।
“फ्री फिलिस्तीन” या “जय भीम” – क्या ये नारे राष्ट्र-विरोधी हैं? इस देश की संविधान की पहली पंक्ति कहती है – “हम भारत के लोग…”इस देश का झंडा हर उस लड़ाई का साथ देता है, जो इंसाफ़ के लिए लड़ी जाए। “फ्री फिलिस्तीन” कोई आतंकवादी नारा नहीं है – यह एक मानवीय मुद्दा है। “जय भीम” कोई पार्टी का नारा नहीं है – यह समानता और संविधान की पुकार है। लेकिन आज भारत की
यूनिवर्सिटीज़ में “फ्री फिलिस्तीन” बोलना अब एक अपराध है। “जय भीम” लिखना अब राष्ट्रविरोध है। और अगर बोलने वाला मुसलमान है, तो तुम्हारे लिए संविधान भी दरवाज़ा बंद कर देता है। क्या RGNIYD में मुसलमान होना गुनाह है? क्या यह वही भारत है जहां हम “वसुधैव कुटुम्बकम्” की बात करते हैं? क्या यही नई शिक्षा नीति है जिसमें ‘सोशल जस्टिस’ को सिलेबस से हटाकर, छात्रों को सज़ा दी जाती है? इन छात्रों को इग्ज़ाम से एक दिन पहले निलंबित किया गया। हॉल टिकट ब्लॉक किए गए। मानसिक उत्पीड़न किया गया। उन्हें कोई नोटिस नहीं, कोई सुनवाई नहीं – बस एक प्रशासनिक बुलडोजर। और मीडिया? अंधा, बहरा, गूंगा। गोदी मीडिया के लिए यह मुद्दा “छोटा” है, क्योंकि इसमें न नफ़रत बेचने लायक मसाला है, न मुस्लिमों के समर्थन की इजाज़त। अब क्या? छात्रों ने अब अदालत का दरवाज़ा खटखटाने का फैसला किया है। मानवाधिकार आयोग में अपील करेंगे।
क्योंकि RGNIYD की कार्रवाई सिर्फ तीन छात्रों को निलंबित नहीं करती –यह भारत के संविधान, न्याय और शिक्षा की आत्मा को निलंबित करती है। हम सबकी ज़िम्मेदारी है पूछना –क्या एक पेंटिंग से देश की सुरक्षा खतरे में है? क्या सिर्फ मुस्लिम छात्रों पर कार्रवाई करना “अनुशासन” है या साफ़ भेदभाव? क्या छात्रों की आवाज़ को कुचलना ही अब “राष्ट्रवाद” है? अगर आज “फ्री फिलिस्तीन” लिखना अपराध है, तो कल “जय भीम”, फिर “इंकलाब”, फिर “भारत माता की जय” भी अपराध बन जाएगा –क्योंकि ये तय नहीं होगा कि तुमने क्या कहा,बल्कि ये देखा जाएगा –तुम कौन हो? अब खामोशी जुर्म है। अब सवाल करना ज़रूरी है। अब सच बोलना ही इंकलाब है। जिन्होंने फिलिस्तीन की आज़ादी की बात की, उन्हें भारत में आज़ादी से पढ़ने नहीं दिया जा रहा।